Supreme Court Said Bengal voters who were removed in SIR process will not get any relief बंगाल में हटाए गए मतदाताओं को अभी वोट का अधिकार नहीं; SIR केस में सुप्रीम कोर्ट, India News in Hindi - Hindustan
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बंगाल में हटाए गए मतदाताओं को अभी वोट का अधिकार नहीं; SIR केस में सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए लोगों को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि लंबित अपीलों वाले मतदाताओं को फिलहाल मतदान का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

Mon, 13 April 2026 05:24 PMDevendra Kasyap लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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बंगाल में हटाए गए मतदाताओं को अभी वोट का अधिकार नहीं; SIR केस में सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए लोगों को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि लंबित अपीलों वाले मतदाताओं को फिलहाल मतदान का अधिकार नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने उन याचिकाकर्ताओं की मांग खारिज कर दी, जिनके नाम एसआईआर अभियान में हटाए गए थे और जिनकी अपीलें अभी अपीलीय न्यायाधिकरणों में लंबित हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि अंतरिम राहत देना असंभव है, क्योंकि इससे चुनावी प्रक्रिया प्रभावित होगी।

सुनवाई के दौरान तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद कल्याण बनर्जी ने पीठ को बताया कि कम से कम 16 लाख अपीलें दायर की गई हैं। उन्होंने आग्रह किया कि इन लोगों को आगामी दो चरणों के विधानसभा चुनाव में वोट डालने की अनुमति दी जाए। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यह बिल्कुल असंभव है। अगर हम ऐसा करते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों के मतदान अधिकार निलंबित करने पड़ेंगे। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि एसआईआर प्रक्रिया में कुल 34 लाख अपीलें लंबित हैं।

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यह आदेश 13 लोगों के एक समूह द्वारा दायर याचिका पर आया, जिसमें मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ हस्तक्षेप की मांग की गई थी। पीठ ने याचिका को 'समय से पहले' बताते हुए खारिज कर दिया और याचिकाकर्ताओं को अपीलीय न्यायाधिकरणों में ही राहत मांगने की सलाह दी। पीठ ने अपने आदेश में कहा चूंकि याचिकाकर्ता (कुरैशा यास्मीन और अन्य) पहले ही अपीलीय न्यायाधिकरणों से संपर्क कर चुके हैं, इसलिए याचिका में व्यक्त आशंकाएं समय से पहले हैं। अगर याचिका स्वीकार कर ली जाती है, तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। हालांकि, अदालत ने याचिका के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी।

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न्यायमूर्ति बागची ने चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता पर जोर देते हुए कहा कि जिस देश में आपका जन्म हुआ है, वहां वोट देने का अधिकार न केवल संवैधानिक है, बल्कि भावनात्मक भी है। यह लोकतंत्र का हिस्सा होने और सरकार चुनने से जुड़ा है। उन्होंने आगे कहा कि पूर्व न्यायाधीशों द्वारा गठित न्यायाधिकरणों पर निर्णय की समयसीमा का बोझ नहीं डाला जा सकता। यह लक्ष्य हासिल करने के लिए गलत तरीके अपनाने की बात नहीं है। साधन ही लक्ष्य को सही ठहराते हैं। हमें उचित प्रक्रिया के अधिकारों की रक्षा करनी होगी। मतदाता को दो संवैधानिक प्राधिकरणों के बीच नहीं फंसाया जाना चाहिए।

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याचिका में आरोप लगाया गया था कि चुनाव आयोग उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना मनमाने ढंग से नाम हटा रहा है और अपीलों की सुनवाई समय पर नहीं हो रही है। चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील डीएस नायडू ने बताया कि लगभग 30 से 34 लाख अपीलें अभी लंबित हैं। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि अगर बहस करने की अनुमति ही नहीं दी जाती तो अपीलों का क्या फायदा? क्या इनका फैसला तय समयसीमा में होगा या इन्हें लगातार टाला जाएगा?

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गौरतलब है कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने पहले ही पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची को फ्रीज कर दिया है। अदालत के कोई विशेष निर्देश न होने तक कोई नया नाम शामिल नहीं किया जा सकता। बांग्लादेश की सीमा से लगे जिलों में हटाए गए लगभग 27 लाख मामलों का फैसला करने के लिए 19 अपीलीय न्यायाधिकरण गठित किए गए हैं।