वोट देना और चुनाव लड़ना मौलिक अधिकार नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कह दी बड़ी बात
पिछले फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जहां वोट देने से चुनावी प्रक्रिया में भागीदारी संभव होती है, वहीं चुनाव लड़ने का अधिकार एक अलग और अतिरिक्त अधिकार है, जो योग्यता, पात्रता की शर्तों और अयोग्यता के अधीन हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार हैं। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि ये अधिकार केवल उसी हद तक मौजूद हैं, जिस हद तक कानून में इनका प्रावधान है। कोर्ट ने कहा कि चुनाव लड़ने का अधिकार एक अलग और अतिरिक्त अधिकार है। 'लाइव लॉ' के अनुसार, कोर्ट ने कहा, "यह बात पूरी तरह से तय है कि न तो वोट देने का अधिकार और न ही चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार है।"
पिछले फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जहां वोट देने से चुनावी प्रक्रिया में भागीदारी संभव होती है, वहीं चुनाव लड़ने का अधिकार एक अलग और अतिरिक्त अधिकार है, जो योग्यता, पात्रता की शर्तों और अयोग्यता के अधीन हो सकता है। यह मामला राजस्थान में 'जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघों' के चुनाव नियमों से संबंधित है। ये संघ 'राजस्थान सहकारी समितियां अधिनियम, 2001' के तहत स्थापित त्रि-स्तरीय प्रणाली के तहत काम करते हैं।
उम्मीदवारों के लिए पात्रता नियम तय करने हेतु उप-नियम बनाए गए थे। इनमें दूध की आपूर्ति के लिए न्यूनतम दिन और मात्रा, समितियों की कार्य-स्थिति और ऑडिट के मानक शामिल थे। कुछ प्राथमिक सहकारी समितियों ने राजस्थान हाई कोर्ट में इन नियमों को चुनौती दी और कहा कि ये नियम अनुचित हैं तथा कानून के दायरे से बाहर हैं।
वर्ष 2015 में, एक एकल-न्यायाधीश ने इन उप-नियमों को रद्द कर दिया, लेकिन पिछले चुनावों को वैध बने रहने दिया। वर्ष 2022 में एक खंडपीठ ने इस फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद, रजिस्ट्रार ने उप-नियमों में बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर दी। इसके परिणामस्वरूप, कई जिला दुग्ध संघों के अध्यक्षों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया; ये अध्यक्ष हाई कोर्ट के मामले में पक्षकार नहीं थे, लेकिन उनका कहना था कि वे इस फैसले से प्रभावित हुए हैं।




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