'सर्वोच्च क्रूरता'; जुड़वां शिशुओं को मां से अलग करने पर भड़का SC, क्या है मामला?
वैवाहिक विवाद के बाद एक मां को उसके 6 महीने के जुड़वां बच्चों से अलग कर देने की घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। कोर्ट की तरफ से इसे सुप्रीम क्रूरता कहा गया है। पीठ ने कहा कि कोई भी दाई या दादी शिशुओं की देखभाल उस तरह नहीं कर सकतीं जैसे एक मां कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को तलाक का एक ऐसा मामला आया, जिसे सुनकर न्यायाधीश भी भड़क गए। वैवाहिक विवाद के बाद पति द्वारा छह महीने के जुड़वां बच्चों को उनकी मां से अलग कर देने के कृत्य को पीठ ने सर्वोच्च क्रूरता करार दिया। कोर्ट ने कहा कि कोई भी दाई या दादी छह महीनों के बच्चे की देखभाल उस तरीके से नहीं कर सकती, जैसे उनकी मां कर सकती है।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी अंजारिया की पीठ ने डेढ़ साल के बच्चों को मां से अलग करने के लिए पति को फटकार लगाई और अलग रह रहे पति-पत्नी को अगली सुनवाई की तारीख पर अपने बच्चों के साथ न्यायाधीशों के समक्ष कक्ष में उपस्थित होने का आदेश दिया। पीठ ने कहा, "पति ने महज छह महीने के बच्चों को उनकी मां से अलग करके घोर क्रूरता की है। बच्चों का कल्याण सर्वोपरि है। यह न्याय का घोर अपमान है। छह महीने के छोटे बच्चों को उनकी मां से अलग नहीं किया जा सकता। यह घोर क्रूरता है।"
न्यायलय की तीखी टिप्पणी पर पति के वकील ने बचाव करते हुए दावा किया कि वह (पत्नी) स्वयं ही वैवाहिक घर छोड़कर चली गई थी और बच्चों को अपने पास रखने की उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। वकील ने कहा कि कोर्ट को बच्चों के संबंध में यथा स्थिति नहीं बदलनी चाहिए क्योंकि ऐसा करने से यह बच्चों के लिए हानिकारक साबित होगा।
इस पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर उन्हें (पत्नी को) बच्चों की कोई चिंता नहीं होती तो वह इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक लेकर नहीं आतीं। जहां तक बात बच्चों के ऊपर पड़ने वाले प्रभाव की है तो कोई भी दाई या दादी बच्चों की ऐसी देखभाल नहीं कर सकती, जैसी की एक मां कर सकती है। जस्टिस मेहता ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, "वास्तव में उसे उसके बच्चों के बिना उसके ससुराल से निकाल दिया गया था। उसके बच्चों को उससे अलग करके उसे पीटा गया और उस पर अत्यधिक क्रूरता की गई।'' महिला के वकील ने कहा कि पति शराबी था और वीडियो कॉल पर भी बच्चों को दिखाने को तैयार नहीं था।
दरअसल यह पूरा मामला वैवाहिक विवाद का है। न्यायालय यहां पति की उस याचिका की सुनवाई कर रहा था, जिसमें पत्नी द्वारा लखनऊ में दर्ज मामलों को पंजाब स्थानांतरित करने की मांग की गई थी। इस पर पति के वकील कहना था कि महिला द्वारा लखनऊ में कई मामले दर्ज कराए गए हैं, ऐसे में उन्हें स्थानांतरित करके पंजाब शिफ्ट किया जाए।
पीठ ने सुनवाई करते हुए दोनों की स्थिति और बच्चों की स्थिति पर टिप्पणी की। महिला के वकील द्वारा बताया गया कि महिला पहले शिक्षिका थी और पति एक व्यवसायी है। इस पर टिप्पणी करते हुए पति पक्ष से पूछा कि वह अपनी अलग रह रही पत्नी को कितना भरण-पोषण दे रहा है और वह कितना देने को तैयार है। अंत में पीठ ने आदेश दिया कि इसका जवाब लिखित में दाखिल करें और अगली तारीख यानी 26 फरवरी को आप दोनों बच्चों केसाथ अदालत के कक्ष में उपस्थित हों।"




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