pujari ke chakkar mein matt padiye Supreme Court gave jolt to BJP leader, refuses PIL on minimum wages for priests पुजारियों के चक्कर में मत पड़िए, आपको पता है वो कितना... BJP नेता को SC से झटका, एक नसीहत भी, India News in Hindi - Hindustan
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पुजारियों के चक्कर में मत पड़िए, आपको पता है वो कितना... BJP नेता को SC से झटका, एक नसीहत भी

PIL में केंद्र और राज्यों को सरकार नियंत्रित मंदिरों में पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक और अन्य लाभों की समीक्षा के लिए एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने के निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।

Mon, 18 May 2026 03:45 PMPramod Praveen पीटीआई, नई दिल्ली
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पुजारियों के चक्कर में मत पड़िए, आपको पता है वो कितना... BJP नेता को SC से झटका, एक नसीहत भी

सुप्रीम कोर्ट ने आज (सोमवार, 18 मई को) को भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की उस जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से मना कर दिया, जिसमें देश भर में सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों, सेवादारों और मंदिर कर्मचारियों के वेतन और सेवा शर्तों की समीक्षा करने के लिए एक ज्यूडिशियल कमीशन या एक्सपर्ट कमेटी बनाने की मांग की गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इसके साथ ही अश्विनी उपाध्याय को एक नसीहत भी दी और कहा कि वे मंदिरों के पजारियों के चक्कर में ना पड़ें।

सुनवाई के दौरान, पीठ ने PIL पर सुनवाई की अपनी अनिच्छा साफ करते हुए कहा, "मंदिरों के पुजारियों के चक्कर में मत पड़ि्ए। आपको पता है पुजारी कितना पैसा कमाते हैं? हम इस पर सुनवाई नहीं कर रहे हैं।" इसके बाद उपाध्याय ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की उस बात का ज़िक्र किया, जिसमें मंदिर के कर्मचारियों को इज्जतदार जिंदगी जीने के लिए न्यूनतम वेतन देने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि कई मंदिर तो सरकार के नियंत्रण में हैं, लेकिन मस्जिदों या चर्चों पर ऐसे रेगुलेटरी फ्रेमवर्क लागू नहीं होते।

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याचिका पर विचार नहीं कर सकते

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस याचिका पर विचार नहीं कर सकते हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि पीड़ित व्यक्ति सीधे अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। पीठ द्वारा याचिका पर विचार करने से इनकार करने के बाद उपाध्याय को याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी, साथ ही उन्हें कानून के तहत उपलब्ध उपाय अपनाने की स्वतंत्रता भी दी।

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जीवन यापन के लिए न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जाता

वकील अश्विनी दुबे के माध्यम से दायर याचिका में केंद्र और राज्यों को सरकार नियंत्रित मंदिरों में पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक और अन्य लाभों की समीक्षा के लिए एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने के निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। इस याचिका की पृष्ठभूमि कैसे तैयार हुई इसके बारे में जानकारी देते हुए उपाध्याय ने कहा कि चार अप्रैल को जब वह एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए वाराणसी गए थे, तब राज्य सरकार नियंत्रित काशी विश्वनाथ मंदिर में रुद्राभिषेक करने के बाद उन्हें पता चला कि पुजारियों और मंदिर के कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन यापन के लिए न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जाता है।

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बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन

याचिका में कहा गया, ''हाल में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों ने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया। पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों को सरकार द्वारा अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए निर्धारित न्यूनतम वेतन भी नहीं मिल रहा है। यह एक व्यवस्थित शोषण है। राज्य बंदोबस्ती विभाग के माध्यम से एक आदर्श नियोक्ता के रूप में कार्य कर रहा है, लेकिन न्यूनतम मजदूरी अधिनियम और राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों (अनुच्छेद 43) का उल्लंघन कर रहा है।''

याचिका में कहा गया है कि 2026 के मुद्रास्फीति-समायोजित जीवन यापन लागत सूचकांक के अनुरूप न्यूनतम वेतन देने से लगातार इनकार करने के कारण याचिकाकर्ता को पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों के और अधिक "हाशिए पर धकेले जाने" को रोकने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।