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मी लॉर्ड! आपने जो बोला वो आदेश में तो नहीं लिखा... भड़का SC; याचिकाकर्ताओं पर ठोका जुर्माना

अडानी पोर्ट्स के गोचर भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जजों का 'लिखित और हस्ताक्षरित आदेश' ही अंतिम होता है। ओपन कोर्ट में बोला गया मौखिक आदेश सिर्फ एक ड्राफ्ट है। जानें पूरा मामला और क्यों लगाया जुर्माना।

Thu, 14 May 2026 08:00 AMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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मी लॉर्ड! आपने जो बोला वो आदेश में तो नहीं लिखा... भड़का SC; याचिकाकर्ताओं पर ठोका जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कच्छ के बहुचर्चित गोचर (चरागाह) भूमि विवाद में एक अहम फैसला सुनाते हुए याचिकाकर्ताओं को कड़ी फटकार लगाई है। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि खुली अदालत में जजों द्वारा बोला गया मौखिक आदेश और बाद में जारी किए गए अंतिम लिखित आदेश में बड़ा अंतर है। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि यह बदलाव अडानी पोर्ट्स को फायदा पहुंचाने वाला है। अदालत ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए इसे 'कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग' और 'अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाने' का प्रयास बताया। साथ ही, याचिकाकर्ताओं पर 2,000-2,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।

क्या था याचिकाकर्ताओं का दावा?

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने 27 जनवरी को इस मामले (फकीर मोहम्मद सुलेमान समेजा बनाम अडानी पोर्ट्स) में सुनवाई की थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि खुली अदालत में आदेश लिखवाते समय जज ने विवादित जमीन पर 'यथास्थिति' बनाए रखने का निर्देश दिया था। साथ ही, गुजरात हाईकोर्ट को इस मामले से जुड़ी जनहित याचिका (PIL) पर स्वतंत्र रूप से सुनवाई जारी रखने की छूट दी थी।

लेकिन, 12 फरवरी को अपलोड किए गए अंतिम (हस्ताक्षरित) आदेश में 'यथास्थिति' का जिक्र नहीं था। इसके बजाय हाईकोर्ट की पीआईएल का पूरी तरह से निपटारा कर दिया गया और गुजरात सरकार को सभी पक्षों को सुनने के बाद नया आदेश जारी करने की अनुमति दे दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाई फटकार?

जस्टिस माहेश्वरी की अगुवाई वाली पीठ ने याचिकाकर्ताओं की इन दलीलों को नामंजूर करते हुए स्पष्ट किया कि अदालत का साइन किया हुआ आदेश ही अंतिम होता है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा: हस्ताक्षरित आदेश ही अदालत की 'अंतिम और अपरिवर्तनीय राय' है। अदालत में लिखवाए जाने के बाद कई दौर के सुधार के बाद ही इसे अंतिम रूप दिया जाता है। सुनवाई के दौरान कोर्ट मास्टर को जो आदेश लिखवाया जाता है, वह केवल एक 'रफ ड्राफ्ट' या 'ढांचा' होता है। चेंबर में साइन करने से पहले इसे सुधारा और बेहतर किया जाता है।

पीठ ने यूट्यूब वीडियो, मीडिया रिपोर्ट्स और स्टॉक एक्सचेंज डिस्क्लोजर का हवाला देने पर भी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता एक अधूरे यूट्यूब वीडियो पर भरोसा कर रहे हैं। लिखित आदेश में कोई 'बड़ा बदलाव' नहीं किया गया है, यह केवल डिक्टेशन को सुधारने की प्रक्रिया थी।

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चेंबर में क्यों सुधारे जाते हैं आदेश?

अदालत के कामकाज की 'व्यावहारिक वास्तविकताओं' का जिक्र करते हुए बेंच ने बताया कि जिस दिन इस अपील पर सुनवाई हुई थी, उस दिन उनके सामने 71 मामले लगे हुए थे। संवैधानिक अदालतों पर काम का भारी बोझ होता है। जज अदालत के समय का सही इस्तेमाल करने के लिए ओपन कोर्ट में एक छोटा ड्राफ्ट आदेश लिखवाते हैं और बाद में चेंबर में उसे बेहतर करके साइन करते हैं। इससे समय की बचत होती है और एक दिन में ज्यादा मामलों की सुनवाई की जा सकती है।

क्या है पूरा विवाद?

यह विवाद साल 2005 का है, जब कच्छ जिले के नवीनल गांव में लगभग 231 हेक्टेयर गोचर (चरागाह) जमीन मुंद्रा पोर्ट को आवंटित की गई थी, जो बाद में अडानी पोर्ट्स एंड एसईजेड लिमिटेड बन गया। ग्रामीणों ने इस आवंटन को गुजरात हाईकोर्ट में जनहित याचिका के जरिए चुनौती दी थी।

जुलाई 2024 में हाईकोर्ट की कार्यवाही के बाद, गुजरात सरकार ने अडानी पोर्ट्स से 108 हेक्टेयर से अधिक जमीन वापस लेने का आदेश दिया। इसके बाद हाईकोर्ट ने भी राज्य को जमीन वापसी की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दे दिया।

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अडानी पोर्ट्स ने इसे सुप्रीम कोर्ट में यह कहते हुए चुनौती दी कि जमीन वापस लेने का आदेश देने से पहले न तो राज्य सरकार और न ही हाईकोर्ट ने उनका पक्ष सुना।

10 जुलाई, 2024 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी। इसके बाद इस मामले की सुनवाई जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने की, जहां यह ताजा विवाद खड़ा हुआ।

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