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अंबेडकर भी देखते तो दुखी होते… पवन खेड़ा की जमानत पर SC में जोरदार बहस, असम सीएम पर निशाना

सुप्रीम कोर्ट में पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर जोरदार बहस। अभिषेक मनु सिंघवी ने असम CM को 'संवैधानिक काउबॉय' कहा, वहीं तुषार मेहता ने फर्जी दस्तावेजों का हवाला देकर हिरासत की मांग की।

Thu, 30 April 2026 01:03 PMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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अंबेडकर भी देखते तो दुखी होते… पवन खेड़ा की जमानत पर SC में जोरदार बहस, असम सीएम पर निशाना

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई शुरू हुई। यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा की पत्नी द्वारा दायर एक मानहानि मामले से संबंधित है। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष (पवन खेड़ा) और अभियोजन पक्ष (असम सरकार) के बीच जोरदार और तीखी बहस देखने को मिली।

बचाव पक्ष (अभिषेक मनु सिंघवी) की प्रमुख दलीलें

खेड़ा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा की सार्वजनिक बयानबाजी पर कड़ा प्रहार किया। 'संवैधानिक काउबॉय' का तंज: सिंघवी ने मुख्यमंत्री को "संवैधानिक काउबॉय" और "संवैधानिक रेम्बो" करार दिया। उन्होंने दलील दी कि खेड़ा की गिरफ्तारी की कोशिश असल में मुख्यमंत्री के इन्हीं बयानों की खुन्नस और गुस्से से प्रेरित है, और यह पूरा मामला भारी पक्षपात से भरा हुआ है।

अमर्यादित भाषा का जिक्र: सिंघवी ने अखबारों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि मुख्यमंत्री ने कथित तौर पर 'पेड़ा' और 'पेलूंगा' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था।

डॉ. अंबेडकर का हवाला: उन्होंने इस स्थिति को अभूतपूर्व बताते हुए कहा, 'अगर डॉ. अंबेडकर किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह 'संवैधानिक काउबॉय' की तरह बोलते देखते, तो उन्हें भी भारी ठेस पहुंचती।'

पुलिस कार्रवाई पर सवाल: सिंघवी ने अदालत को बताया कि दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में खेड़ा के आवास को 50 से 70 पुलिसकर्मियों ने इस तरह घेर लिया था मानो वे 'किसी आतंकवादी को पकड़ने गए हों।' उन्होंने सवाल उठाया कि महज एक मानहानि के मामले में इतनी भारी पुलिस फोर्स का इस्तेमाल क्या उचित है?

हिरासत की जरूरत नहीं: उन्होंने तर्क दिया कि खेड़ा एक जाने-माने सार्वजनिक व्यक्ति हैं, उनके भागने का कोई खतरा नहीं है और वे जांच में सहयोग के लिए उपलब्ध हैं। साथ ही, मामले में लगाई गई ज्यादातर धाराएं जमानती हैं, इसलिए हिरासत में लेकर पूछताछ करने की कोई जरूरत नहीं है।

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असम सरकार (तुषार मेहता) की दलीलें

असम राज्य की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने खेड़ा की जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया।

फर्जी और जाली दस्तावेज: मेहता ने अदालत को बताया कि अब तक की जांच से यह साफ हुआ है कि खेड़ा द्वारा पेश किए गए दस्तावेज (पासपोर्ट) पूरी तरह से 'फर्जी और जाली' थे। किसी भी सरकारी अथॉरिटी ने ऐसे कोई पासपोर्ट जारी नहीं किए थे।

हिरासत में पूछताछ जरूरी: मेहता ने तर्क दिया कि मामले की तह तक जाने के लिए हिरासत में पूछताछ बहुत जरूरी है। पुलिस यह पता लगाना चाहती है कि ये जाली दस्तावेज किसने बनाए, इस प्रक्रिया में किसने मदद की या क्या किसी और व्यक्ति ने उन्हें ये दस्तावेज मुहैया कराए थे।

गंभीर मामला: उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर किन्हीं दस्तावेजों पर किसी देश की आधिकारिक मुहर का इस्तेमाल हुआ है, तो यह मामला बेहद गंभीर हो जाता है और इसकी गहराई से जांच होनी चाहिए।

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असम सरकार जहां इस कथित जालसाजी के नेटवर्क का पर्दाफाश करने के लिए हिरासत में पूछताछ को अनिवार्य बता रही है, वहीं पवन खेड़ा के वकील इस मामले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन और गिरफ्तारी के अयोग्य बता रहे हैं। इन तीखे दावों और प्रति-दावों के बीच, अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि पवन खेड़ा को अग्रिम जमानत दी जाए या नहीं।