'पवन खेड़ा के साथ खड़ी है पार्टी', कांग्रेस ने किया सुप्रीम कोर्ट जाने का ऐलान: HC ने नहीं दी बेल
पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका गुवाहाटी हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। असम के सीएम की पत्नी से जुड़े इस मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिए अब कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी। पढ़ें पूरी खबर।

कांग्रेस पार्टी ने शनिवार को अपने वरिष्ठ नेता और मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा के प्रति एकजुटता जाहिर की है। दरअसल, गुवाहाटी हाईकोर्ट ने पवन खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। इसके बाद कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि वह हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी।
कांग्रेस का रुख और जयराम रमेश का बयान
कांग्रेस महासचिव (संचार प्रभारी) जयराम रमेश ने एक्स पर पोस्ट करते हुए पवन खेड़ा का मजबूती से समर्थन किया। उन्होंने लिखा- पूरी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपने मीडिया और प्रचार विभाग के अध्यक्ष पवन खेड़ा के साथ मजबूती से खड़ी है। गुवाहाटी उच्च न्यायालय के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की प्रक्रिया चल रही है। उन्होंने आगे कहा कि पार्टी को पूरा भरोसा है कि धमकी, डराने-धमकाने और उत्पीड़न की राजनीति के खिलाफ अंततः न्याय की ही जीत होगी।
क्या है पूरा मामला और आरोप?
यह विवाद पवन खेड़ा द्वारा की गई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद शुरू हुआ। खेड़ा ने आरोप लगाया था कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा की पत्नी के पास कई पासपोर्ट हैं और विदेशों में उनकी अघोषित संपत्तियां हैं। इन गंभीर आरोपों के बाद, मुख्यमंत्री की पत्नी रिनीकी भुइयां शर्मा ने गुवाहाटी क्राइम ब्रांच पुलिस स्टेशन में पवन खेड़ा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत आपराधिक मामला दर्ज कराया था।
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने जमानत याचिका क्यों खारिज की?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद पवन खेड़ा ने सोमवार को गुवाहाटी हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किया था, जिसे शुक्रवार को जस्टिस पार्थिव ज्योति सैकिया की एकल पीठ ने खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कई अहम बातें कहीं।
सिर्फ मानहानि का मामला नहीं: अदालत ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए इसे 'केवल मानहानि' का साधारण मामला नहीं माना जा सकता, जिसमें दुर्भावना या साजिश न हो।
फर्जी दस्तावेजों का शक: अदालत के अनुसार, प्रथम दृष्टया यह BNS की धारा 339 के तहत मामला बनता है, जो जाली (फर्जी) दस्तावेजों या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड रखने से संबंधित है।
हिरासत में पूछताछ जरूरी
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता (पवन खेड़ा) पुलिस जांच से बच रहे हैं। इस मामले में पुलिस द्वारा हिरासत में लेकर पूछताछ करना आवश्यक है ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनके सहयोगी कौन हैं, उनके लिए ये दस्तावेज किसने जुटाए और ये दस्तावेज कहां से और कैसे हासिल किए गए।
कानूनी दांवपेच का अब तक का घटनाक्रम
इस मामले में पवन खेड़ा ने कई अदालतों का दरवाजा खटखटाया है। हैदराबाद के निवासी होने के कारण, मामला दर्ज होने के बाद पवन खेड़ा ने सबसे पहले तेलंगाना हाईकोर्ट का रुख किया था। वहां से उन्हें सात दिन की 'ट्रांजिट अग्रिम जमानत' मिल गई थी।
इसके बाद असम पुलिस ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर अंतरिम रोक लगा दी और पवन खेड़ा को संबंधित राज्य यानी असम के गुवाहाटी हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया था। अब गुवाहाटी हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद कांग्रेस ने वापस सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर ली है।
खेड़ा के वकील ने जमानत याचिका खारिज करने वाले आदेश को वापस लेने की मांग की
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा का प्रतिनिधित्व करने वाले एक वकील ने शुक्रवार को गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से उनके मुवक्किल की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करने वाले आदेश को वापस लेने का आग्रह किया। वकील ने दावा किया कि असम के महाधिवक्ता ने इस मामले में शिकायतकर्ता एवं मुख्यमंत्री की पत्नी का प्रतिनिधित्व करते हुए भारतीय विधिज्ञ परिषद (बीसीआई) के मानदंडों का उल्लंघन किया है।
वकील रीतम सिंह ने मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार से आग्रह किया कि वह हस्तक्षेप करें ताकि महाधिवक्ता देवजीत सैकिया द्वारा कथित तौर पर तथ्यों को दबाने और हितों के टकराव के कारण होने वाले 'न्याय के गंभीर उल्लंघन' को रोका जा सके। सिंह ने दावा किया कि सैकिया ने इस 'महत्वपूर्ण और अत्यंत प्रासंगिक तथ्य' को छिपाया कि मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा और उनकी पत्नी रिंकी भुइयां शर्मा दोनों के साथ उनका 'लंबे समय से लेन-देन का संबंध' है। उन्होंने दावा किया कि यह बार बीसीआई द्वारा तैयार किए गए पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के मानकों के नियम 31, 32 और 33 का उल्लंघन करता है।
रीतम सिंह ने मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र में दावा किया कि बहस के दौरान, महाधिवक्ता ने स्वयं मुख्यमंत्री द्वारा 20 मार्च को दायर किए गए चुनावी हलफनामे को रिकॉर्ड पर प्रस्तुत किया, जो उन्होंने जलुकबाड़ी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए अपने नामांकन पत्रों के साथ दाखिल किया था। सिंह ने पत्र में दावा किया कि उसी हलफनामे में जिक्र किया गया है कि मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी द्वारा सैकिया को क्रमश: दो लाख रुपये और एक लाख रुपये का बकाया देना है।
क्या बोला था कोर्ट?
न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि जो आरोप उन्होंने लगाए हैं, वे कुछ दस्तावेजों पर आधारित हैं, जो उनके पास हैं जबकि पुलिस ने दावा किया कि उन दस्तावेजों को पहले ही फर्जी साबित किया जा चुका है। अदालत ने कहा कि मामला दर्ज होने के बाद याचिकाकर्ता ने यह कहीं नहीं कहा कि पुलिस ने झूठे या मनगढ़ंत दावे किए हैं।
न्यायाधीश ने कहा, 'महाधिवक्ता का यह दावा कि याचिकाकर्ता का मामला बीएनएस की धारा 339 (जाली दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड रखने) की श्रेणी में आता है, प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होता है।' उन्होंने कहा कि रिंकी भुइयां शर्मा असम के मुख्यमंत्री की पत्नी हैं, लेकिन स्वयं मुख्यमंत्री नहीं हैं। आदेश में कहा गया है, 'यदि खेड़ा ने ये आरोप मुख्यमंत्री के खिलाफ लगाए होते, तो यह मामला राजनीतिक बयानबाजी माना जा सकता था। लेकिन राजनीतिक लाभ लेने के लिए उन्होंने एक निर्दोष महिला को विवाद में घसीट लिया।'




साइन इन