न अजित पवार जैसा अनुभव, न शिंदे जैसी साख: फिर पहली बार MLA बने ऋतब्रत ने कैसे कर दिया TMC में खेला; पीछे कौन?
रितब्रत बनर्जी की तुलना महाराष्ट्र के एकनाथ शिंदे से की जा रही है, जिनके विद्रोह के कारण तत्कालीन शिवसेना में विभाजन हुआ था। हालांकि सच यह है कि ऋतब्रत पहली बार विधायक बने हैं और TMC में पनप रहे गुस्से को प्रकट करने में सफल रहे हैं।

TMC Crisis: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय बड़ा भूचाल आया हुआ है। विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपनी स्थापना (1998) के बाद से पहली बार इस तरह के संकट से जूझ रही है, जब पार्टी के बागी गुट ने ही खुद को असली गुट बता दिया हो और पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी द्वारा नामित नेता विपक्ष की जगह बागी गुट के नेता ने विधानसभा अध्यक्ष द्वारा खुद को नेता प्रतिपक्ष घोषित करवा लिया हो। पार्टी के कुल 80 में से 60 विधायक इस बागी गुट की तरफ हो गए हैं। इस सियासी घटनाक्रम में सबसे बड़ी और चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब उस बागी विधायक के इशारे पर हुआ जिसने पहली बार ही विधानसभा का मुंह देखा है और ममता बनर्जी की स्थापित पार्टी की नींव हिला दी है।
जी हां, विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को बुधवार को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किया है। इससे पहले तृणमूल कांग्रेस के 58 बागी विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुना और अपने इस फैसले की जानकारी विधानसभा अध्यक्ष को दी। हैरानी की बात यह है कि चुनाव में हार के कुछ ही हफ्तों के भीतर, ऋतव्रत बनर्जी ने 80 में से 60 विधायकों को अपने पाले में कर लिया है।
कैसे भड़की बगावत की आग?
इस संकट की शुरुआत तब हुई जब पार्टी ने पिछले दिनों शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता घोषित किया। तब ऋतव्रत बनर्जी और संदीपन साहा जैसे विधायकों ने आरोप लगाया कि इस चयन के लिए विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए थे। इतना ही नहीं इन दोनों विधायकों ने इसकी शिकायत विधानसभा सचिवालय में कर दी। इससे पार्टी नेतृत्व बौखला गया और पार्टी ने तुरंत उन दोनों विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते पार्टी से निष्कासित कर दिया।
निशाने पर अभिषेक बनर्जी और I-PAC
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि TMC के अंदर उपजा यह विद्रोह किसी विचारधारा या दूसरे दल में शामिल होने या उसके साथ गठबंधन करने की लड़ाई नहीं है, बल्कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ एक तरह का गुस्सा है। सूत्रों के अनुसार, कई विधायक ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के कामकाज के तरीके और राजनीतिक सलाहकार फर्म I-PAC के बढ़ते दखल से नाराज हैं। आरोप है कि अभिषेक बनर्जी के कारण पार्टी के भीतर पुराने और जमीनी नेताओं की पकड़ कम होती जा रही है।
ऋतब्रत न अजित पवार जैसे अनुभव, न शिंदे जैसी साख
राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र के एकनाथ शिंदे और अजित पवार की बगावत से की जा रही है लेकिन विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद अपने पहले प्रेस कॉन्फ्रेन्स में ऋतव्रत बनर्जी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि वह ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती नहीं दे रहे हैं और न ही नई पार्टी बना रहे हैं। उन्होंने मीडिया से दो टूक कहा, "हम टीएमसी के झंडे के नीचे ही काम करेंगे।"
दो बार राज्यसभा के सांसद रह चुके
दरअसल, शिंदे और पवार जैसे मंझे हुए राजनीतिक दिग्गजों के लिए भी, शिवसेना और NCP में फूट डालना कुछ हफ़्तों या महीनों का काम नहीं था। बल्कि इन पार्टियों में विद्रोह से पहले महीनों तक अंदर ही अंदर असंतोष सुलगता रहा था। अजित पवार लंबे राजनीतिक अनुभव और सियासी साख वाले नेता थे और पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखते थे। वहीं एकनाथ शिंदे भी लंबे अनुभव वाले और पार्टी कार्यकर्ताओं पर बड़ी पकड़ रखने वाले थे लेकिन उनसे उलट ऋतब्रत पहली बार ही विधायक बने हैं। हालांकि, इससे पहले वो दो बार राज्यसभा के सांसद रह चुके हैं। इसलिए बंगाल की राजनीतिक स्थिति महाराष्ट्र जैसी नहीं है।
टीएमसी के लिए आगे की राह मुश्किल
हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात की भी चर्चा है कि जब से ऋतब्रत बनर्जी ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से दिल्ली के बंग भवन में 22 मई को मुलाकात की है, तभी से TMC में उलटफेर के संकेत मिलने शुरू हो गए थे। इन सबके बीच, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता आरपी सिंह ने इंडिया टुडे से कहा है कि टीएमसी में यह दरार इसलिए आई है क्योंकि पार्टी में विचारधारा की कमी है और यह केवल "सत्ता के लालच" से जुड़ी हुई थी। अब गेंद ममता बनर्जी के पाले में है। उन्हें यह तय करना होगा कि वे अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी का साथ देंगी या ऋतव्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले इस बड़े बागी गुट की मांगों को मानेंगी।




साइन इन