‘जजों को भी नहीं पता कॉलेजियम की बैठक कहां होती है’, SC के जस्टिस दत्ता ने ही खड़े कर दिए सवाल
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने जजों की नियुक्ति करने वाले कॉलेजियम सिस्टम की अपारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका में नियुक्ति का आधार केवल 'जेंडर' या संख्या नहीं, बल्कि 'मेरिट' होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार को उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में जजों की नियुक्ति करने वाली कॉलेजियम प्रणाली की अपारदर्शिता पर गंभीर चिंता व्यक्त की। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका में नियुक्तियों का मुख्य आधार संख्यात्मक या लैंगिक प्रतिनिधित्व के बजाय पूरी तरह से योग्यता (मेरिट) होना चाहिए। वे महिला दिवस के अवसर पर इंडियन वुमेन इन लॉ (IWiL) द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में बोल रहे थे। यह चर्चा उच्च न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े एक सत्र का हिस्सा थी।
कॉलेजियम की कार्यप्रणाली पर सवाल
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस दत्ता ने कहा कि कॉलेजियम के कामकाज में पारदर्शिता की इतनी कमी है कि अक्सर खुद जजों को भी यह स्पष्ट नहीं होता कि कॉलेजियम कैसे काम करता है। उन्होंने आश्चर्य जताते हुए कहा- आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हमें यही नहीं पता होता कि क्या हो रहा है... यहां तक कि हमें यह भी नहीं पता होता कि कॉलेजियम की बैठक कहां हो रही है।
इसके अलावा, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि कॉलेजियम के भीतर असहमति जताने से भी अंतिम फैसले हमेशा नहीं बदलते। उन्होंने हाल ही का एक उदाहरण दिया जहां कॉलेजियम में एक महिला जज ने असहमति जताई थी, लेकिन इसके बावजूद नियुक्ति को मंजूरी दे दी गई।
संख्या नहीं, मेरिट हो प्राथमिकता
न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर बात करते हुए जस्टिस दत्ता ने सचेत किया कि इस बातचीत को केवल 'संख्या' तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा- जब हाईकोर्ट के जजों के रूप में पदोन्नति की बात आती है, तो मैं संख्या के पीछे नहीं भागूंगा। ऐसा नहीं होना चाहिए कि 50 में से 25 या 30 पद महिलाओं को ही क्यों न मिलें। यह जेंडर न्यूट्रैलिटी है। हमें मेरिट के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि बेंच में पदोन्नति के लिए मुख्य मानक क्षमता, सत्यनिष्ठा और स्वभाव होने चाहिए।
बॉम्बे हाईकोर्ट का उदाहरण और दबाव के आगे न झुकना
बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल को याद करते हुए उन्होंने बताया कि वहां नियुक्तियों के लिए कोई वस्तुनिष्ठ मानदंड नहीं थे। ऐसे में जजों को वकीलों के प्रदर्शन का आकलन स्वयं उनके सामने होने वाली जिरह के आधार पर करना पड़ता था। उन्होंने एक वाकया साझा किया जब उन्होंने महज प्रतिनिधित्व के नाम पर एक महिला वकील को पदोन्नत करने के सुझाव को खारिज कर दिया था।
उन्होंने कहा- एक जज ने मुझे फोन किया और कहा कि छह नामों की सिफारिश की जा रही है, तो उस महिला को क्यों नहीं? मैंने उस जज को 'ना' कह दिया। मैंने बताया कि वह वकील मेरे सामने पेश हुई थी और अभी उसमें परिपक्वता की कमी है, उसे परिपक्व होने के लिए कुछ और समय चाहिए।
जस्टिस दत्ता ने यह भी बेबाकी से कहा कि हाईकोर्ट कॉलेजियम के कई जजों में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के अनुरोधों को 'ना' कहने की हिम्मत नहीं होती। उन्होंने कहा- मैंने उनसे कहा कि यह मेरा फैसला है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर, जब तक मैं संतुष्ट नहीं होऊंगा, मैं सहमत नहीं होऊंगा।
कलकत्ता हाईकोर्ट की महिला जजों का जिक्र
कलकत्ता हाईकोर्ट के अपने दिनों का जिक्र करते हुए उन्होंने वर्तमान महिला जजों की तारीफ भी की। उन्होंने कहा कि जस्टिस शम्पा सरकार, जस्टिस अमृता सिन्हा और जस्टिस मौसमी भट्टाचार्य से उन्होंने (जस्टिस दत्ता ने) वकालत के दौरान जो कड़े सवाल किए थे, उससे उन्हें यकीन है कि वे महिला जज अब किसी भी वकील को आसानी से संभाल सकती हैं।




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