How much Oil have India in stock amid Iran US Crisis how crucial is Hormuz तेल को लेकर टेंशन? भारत के पास कितना बचा है स्टॉक, अभी कितने दिन चलेगा काम, India News in Hindi - Hindustan
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तेल को लेकर टेंशन? भारत के पास कितना बचा है स्टॉक, अभी कितने दिन चलेगा काम

भारत के पास अब कितने दिन का तेल बचा है? यह एक बड़ा सवाल है जो एक बार फिर से उठने लगा है। ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में ईंधन बचाने को लेकर संदेश भी दे दिया है।

Mon, 18 May 2026 09:16 PMDeepak Mishra लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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तेल को लेकर टेंशन? भारत के पास कितना बचा है स्टॉक, अभी कितने दिन चलेगा काम

भारत के पास अब कितने दिन का तेल बचा है? यह एक बड़ा सवाल है जो एक बार फिर से उठने लगा है। ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में ईंधन बचाने को लेकर संदेश भी दे दिया है। इस सारी समस्या की जड़ में है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जहां से भारत की जरूरत का 30 फीसदी कच्चा तेल आता है। भारत करीब 40 देशों से कच्चा तेल मंगाता है। साल-दर-साल इन सप्लायर्स की लिस्ट बदलती रहती है। भारत को इसकी जरूरत का 90 फीसदी तेल आयात करना पड़ता है। ऐसे में जब भी ग्लोबल चेन सप्लाई किसी मुसीबत के चलते प्रभावित होती है तो यहां पर हालत खराब होने लगती है। सरकारी अनुमान के मुताबिक भारत को हर दिन 55 लाख बैरल कच्चे तेल की जरूरत होती है।

क्या है भारत की स्थिति
इन तमाम मुश्किल हालात में भारत के पास कितना तेल बचा हुआ है और यह कितने दिन तक चल सकता है? साल 2019-20 के सरकारी अनुमान के मुताबिक भारत का रणनीतिक तेल भंडार देश में 9.5 दिनों तक कच्चे तेल की जरूरत पूरी कर सकता है। हालांकि सरकार का कहना है कि रणनीतिक तेल भंडार तो इमरजेंसी स्टॉक का महज एक हिस्सा है। तेल कंपनियां भी अलग से अपना स्टॉक बनाती हैं, जो 64.5 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है। इस तरह अगर कुल मिलाकर देखें तो भारत के पास कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स को मिलाकर कुल 74 दिनों का स्टॉक है। इन सबके बीच पीएम मोदी की यूएई यात्रा से इस तेल स्टॉक में और इजाफा होना है। प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान आईएसपीआरएल और अबु धाबी नेशनल ऑयल कंपनी के बीच समझौता हुआ है। इससे भारत का स्टॉक 30 मिलियन बैरल तक पहुंच जाएगा।

तेल की कीमतों पर असर
ईरान और अमेरिका के बीच 28 फरवरी से ही जंग जारी है। करीब तीन महीने से होर्मुज से तेल के जहाजों का आना-जाना प्रभावित है। इन सबके बीच भारत में लगातार तेल के दाम स्थिर रहे। कच्चे तेल के दाम में इजाफे के बावजूद सरकार ने जनता को काफी बचाकर रखा है। हालांकि दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। सोमवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 111 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए। वहीं, सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि मई की शुरुआत में तेल कंपनियों को प्रतिदिन 1000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। इन सबके बीच पिछले हफ्ते सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम में तीन रुपए प्रति लीटर का इजाफा किया है।

भारत कहां स्टॉक करता है तेल
भारत में कुछ जगहें हैं जहां पर कच्चा तेल स्टॉक किया जाता है। यह हैं आंध्र प्रदेश का विशाखापत्तनम, कर्नाटक का मंगलुरु, कर्नाटक का पादुर। संयुक्त रूप से इन जगहों की 5.33 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल की कुल स्टोरेज क्षमता है। विशाखापत्तनम में 1.33 मीट्रिक टन, मंगलुरु में 1.5 मीट्रिक टन और पादुर में 2.5 मीट्रिक टन कच्चा तेल भंडार किया जा सकता है। इसके अलावा कुछ जगहों पर कॉमर्शियल-कम स्ट्रेटेजिक रिजर्व बनाने की तैयारी है। इसमें ओडिशा के चांडीखोल में 4 मीट्रिक टन का रिजर्व बनाने और कर्नाटक के पादुर की क्षमता को बढ़ाकर 2.5 मीट्रिक टन करने की योजना है। इन प्रोजेक्ट्स को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर डेवलप किया जाना है। इसके अलावा, राजस्थान में 5.625 मीट्रिक टन की क्षमता वाले स्टोरोज की भी तैयारी है। वहीं, मंगलुरु और मध्य प्रदेश के बीना में जमीन के ऊपर स्टोरेज बनाने की तैयारी में है।

किस हाल में है होर्मुज
इस बीच ईरानी अधिकारियों ने सोमवार इस बात की पुष्टि की है कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य के लिए एक सुरक्षा ढांचा तैयार करने के उद्देश्य से ओमान और अन्य इच्छुक पक्षों के साथ बातचीत कर रहा है। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रमुख इब्राहिम अजीजी ने कहा कि ईरान ने इस जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों के आवागमन को नियंत्रित करने के लिए एक पेशेवर व्यवस्था तैयार की है, जिसे जल्द ही सामने लाया जाएगा।

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गौरतलब है कि इस महत्वपूर्ण जलमार्ग पर ईरान के कड़े नियंत्रण ने वैश्विक तेल बाजारों को हिलाकर रख दिया है और दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया है। इससे ईरान को अन्य देशों के साथ बातचीत में एक बड़ा फायदा मिला है, क्योंकि ईरान का मानना है कि इस मार्ग से होने वाला समुद्री आवागमन अब युद्ध से पहले जैसी स्थिति में नहीं लौटेगा।