जहरीले चावल से गोबर वार तक: बच्चों की मासूम जिद ने कैसे विजय को दिलाई बड़ी जीत; बदल दी TN की राजनीति
सबसे अहम बात यह थी कि इस तरीके ने विरोधियों को उलझन में डाल दिया। जवाब देने के लिए कोई एक तय कहानी नहीं थी, न ही टारगेट करने के लिए कोई तय इन्फ़्लुएंसर थे। जब तक DMK कोई जवाब देती, तब तक तो बातचीत का मुद्दा ही बदल चुका था।

तमिलनाडु के 2026 विधानसभा चुनावों में जो कुछ हुआ, उसने न सिर्फ राज्य के राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं, बल्कि उसने चुनाव लड़ने का तरीका ही बदल दिया है। बड़ी बात यह है कि इस कहानी में सबसे अनोखा किरदार घर-घर के बच्चे थे, न कि नेता और रणनीतिकार। दरअसल हुआ ये कि इस चुनाव में अभिनेता से नेता बने थलपति विजय और उनकी पार्टी TVK ने बच्चों के जरिए एक अभिनव प्रयोग और प्रचार किया, जिसने पारंपरिक राजनीति की धारा ही मोड़ दी।
विजय ने अपने पहले ही चुनाव में राजनीति को पूरी तरह फिल्मी अंदाज में पेश किया। उनकी रैलियां किसी फिल्म के ट्रेलर जैसी लगीं जिसमें पंच डायलॉग, इमोशनल अपील और जबरदस्त फैन एंगेजमेंट रहा लेकिन असली गेम-चेंजर बने “यूथ पुश”। बच्चों और किशोरों को कहा गया कि वे अपने माता-पिता को TVK के ‘व्हिसल’(सीटी) चिन्ह पर वोट देने के लिए मनाएँ। इसके बाद सोशल मीडिया पर रील्स और व्हाट्सऐप वीडियो की बाढ़ आ गई।
जब बच्चों ने संभाली ‘चुनावी कमान’
इन वीडियो में बच्चे अपने परिवार वालों से कहते दिखे कि अगर विजय को वोट नहीं दिया तो "चावल में ज़हर मिला देंगे!" “गोबर फेंक देंगे!” या “बात नहीं करेंगे!” हालांकि यह सब मजाकिया अंदाज़ में था, लेकिन इसका असर गहरा हुआ। ये वीडियो घर-घर तक पहुँचे और बातचीत का हिस्सा बन गए। ये वीडियो स्क्रिप्टेड थे, लेकिन रियलिस्टिक और सहज भी थी इसलिए असरदार रहे। ये हर घर में राजनीतिक चर्चा और डाइनिंग टेबल पर चर्चा का विषय बन गए।
वायरल रणनीति ने किया कमाल
TVK का ये कैंपेन पारंपरिक नहीं था। यह ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर फैलने वाला अभियान था। विजय के विशाल फैन क्लब नेटवर्क ने इसे “हाइपरलोकल डिजिटल मशीन” में बदल दिया। इसका नतीजा न सिर्फ TVK की विजय हुई बल्कि DMK की सत्ता से विदाई के रूप में देखने को मिला। पार्टी की करारी हार हुई और विपक्षी AIADMK तीसरे स्थान पर चली गई।
वीडियो और रील्स पर समर्थन और विवाद भी
जहाँ समर्थकों ने इन वीडियो को “क्यूट” बताया, वहीं आलोचकों ने कई गंभीर सवाल उठाए कि क्या बच्चों को राजनीति में इस तरह शामिल करना सही है? कुछ ने पूछा कि क्या मजाक में भी हिंसात्मक भाषा का इस्तेमाल ठीक है? क्या इससे पारिवारिक रिश्तों पर असर पड़ सकता है? कुछ वीडियो में बच्चे मज़ाक में थप्पड़ मारते या बुजुर्गों से बहस करते दिखे, जिस पर बाल अधिकार समूहों ने भी चिंता जताई। बहरहाल, विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि राजनीति के बदलते स्वरूप का संकेत है, जहाँ सोशल मीडिया, मीम्स और पारिवारिक संवाद भी चुनावी हथियार बन गए हैं।तमिलनाडु की राजनीति पहले से ही व्यक्तित्व-आधारित रही है, और अब यह “डिजिटल भक्ति” के नए रूप में सामने आ रही है।




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