भारत में संसद नहीं है सर्वोच्च; श्रीलंका में बोले पूर्व CJI गवई, आपातकाल का भी जिक्र
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई ने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र में संसद, कार्यपालिका या फिर न्यायपालिका सर्वोच्च नहीं होती है। देश में केवल संविधान ही सर्वोच्च होता है। क्योंकि इन तीनों को उसी से शक्तियां प्राप्त होती हैं।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई ने लोकतंत्र में संविधान और उसके महत्व को लेकर बात की। उन्होंने कहा कि किसी भी संवैधानिक देश में संसद, सरकार या न्याय पालिका सर्वोच्च नहीं होती है। देश के केवल और केवल संविधान ही सर्वोच्च होता है। उन्होंने 1975 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाकल का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय ने इस बात को उजागर कर दिया था कि न्यायपालिका, राज्य की शक्तियों पर रोक लगाने की बजाय उनके बचाव में खड़ी हो गई थीं। यह ऐसा समय था, जब संसद, सरकार और न्यायपालिका तीनों ही अपने संवैधानिक दायित्व निभाने में विफल हो गए थे।
कोलंबो में एक कार्यक्रम के दौरान अपनी बात को रखते हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र में संसद (विधायिका), कार्यपालिका (सरकार) और न्यायपालिका नहीं, बल्कि संविधान सर्वोच्च है। उन्होंने जोर देकर कहा कि तीनों को संविधान से अधिकार प्राप्त होता है और तीनों इससे बंधे हुए हैं। उन्होंने कहा, "संवैधानिक लोकतंत्र सत्ता के किसी एक केंद्र के इर्द-गिर्द स्थित नहीं होता। यह ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसमें कोई एक संस्था असीमित अधिकार का प्रयोग करती हो। बल्कि, यह एक सुनियोजित व्यवस्था है, जिसमें शक्ति का वितरण किया जाता है और सीमा तय की जाती है।''
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में संसद किसी भी अर्थ में सर्वोच्च नहीं है। न ही कोई अन्य संस्था सर्वोच्च है। संविधान केवल अपनी सर्वोच्चता को ही मान्यता देता है। सभी संस्थाएं अपना अधिकार इससे प्राप्त करती हैं और सभी इसकी सीमाओं से बंधी हुई हैं।''
संविधान सभा में दिये गए डॉ भीमराव आंबेडकर के भाषण का हवाला देते हुए गवई ने कहा कि प्रत्येक संस्था का अपना कार्यक्षेत्र है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक संस्था अपने कार्यक्षेत्र में सर्वोच्च है, लेकिन केवल संविधान द्वारा अनुमति प्राप्त सीमा तक ही।
पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि संसद और न्यायपालिका के बीच संबंध हमेशा टकरावपूर्ण नहीं होते। उन्होंने कहा, ''कई बार यह सहयोगात्मक होता है, जहां न्यायिक नवाचार संवैधानिक कमियों को उजागर करता है और संसद लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर उन सिद्धांतों को संस्थागत रूप देकर प्रतिक्रिया करती है।'' बता दें, भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश रह चुके जस्टिस बी आर गवई का कार्यकाल 14 मई 2025 से लेकर 23 नवंबर 2025 तक था। उन्होंने अपने कार्यकाल में काफी फैसले दिए, लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान हुए जूताकांड ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं।




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