बच्चे गुमराह हो रहे मीलॉर्ड... बिना मान्यता चल रहे धार्मिक संस्थानों पर सवाल; सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट 11 मई को उस जनहित याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें 14 साल से कम उम्र के बच्चों को शिक्षा या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों के रजिस्ट्रेशन और निगरानी की मांग की गई है।

देशभर में 14 साल से कम उम्र के बच्चों को पढ़ाने या धार्मिक शिक्षा देने वाले गैर मान्यता प्राप्त संस्थानों को लेकर विवाद अब देश की सबसे बड़ी अदालत पहुंच गया है। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रहा है। अदालत 11 मई को उस जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करेगी जिसमें मांग की गई है कि ऐसे सभी संस्थानों का रजिस्ट्रेशन, मान्यता और निगरानी अनिवार्य की जाए। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब कई इलाकों में बिना मान्यता वाले संस्थानों के संचालन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। याचिका में कहा गया है कि बच्चों की कम उम्र और समझ को देखते हुए राज्य की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
दो जजों की बेंच करेगी सुनवाई
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच इस मामले की सुनवाई कर सकती है। यह जनहित याचिका वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की तरफ से दायर की गई है, जिसे अधिवक्ता अश्वनी दुबे के जरिए सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया। याचिका में अदालत से अपील की गई है कि देशभर में बच्चों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों को कानूनी दायरे में लाया जाए।
संविधान के कई अनुच्छेदों का दिया गया हवाला
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21ए, 39(एफ), 45 और 51-ए(के) का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया है कि बच्चों को सुरक्षित और बेहतर शिक्षा देना राज्य की जिम्मेदारी है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि अदालत केंद्र और राज्यों को निर्देश दे कि वे ऐसे सभी संस्थानों को रजिस्टर करें, उनकी पहचान तय करें और समय-समय पर उनकी निगरानी करें।
अनुच्छेद 30 को लेकर भी उठाया सवाल
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 30 को लेकर भी व्याख्या मांगी गई है। इसमें कहा गया है कि अल्पसंख्यकों को दिए गए अधिकार अनुच्छेद 19(1)(जी) से अलग कोई अतिरिक्त विशेषाधिकार नहीं देते। याचिका में अदालत से यह भी घोषित करने की मांग की गई है कि अनुच्छेद 30 केवल अनुच्छेद 19(1)(जी) का विस्तार है और उससे अतिरिक्त अधिकार नहीं मिलते।
बच्चों को गुमराह किया जा सकता है: पीआईएल
याचिका में कहा गया है कि छोटे बच्चे बहुत मासूम और आसानी से प्रभावित होने वाले होते हैं। इसलिए उनकी शिक्षा और मानसिक विकास को लेकर सरकार की जिम्मेदारी ज्यादा होती है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि बिना रजिस्ट्रेशन और बिना निगरानी चलने वाले संस्थानों में बच्चों को गलत तरीके से प्रभावित या ब्रेनवॉश किया जा सकता है। इसी वजह से इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोड़ा गया है।
यूपी बॉर्डर के जिलों का भी किया जिक्र
अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में कहा कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे कई जिलों का दौरा किया, जहां बड़ी संख्या में बिना रजिस्ट्रेशन और बिना मान्यता वाले संस्थान चलते मिले। याचिका में दावा किया गया कि सीमावर्ती इलाकों में ऐसे संस्थान तेजी से बढ़ रहे हैं लेकिन उन पर कोई प्रभावी निगरानी व्यवस्था मौजूद नहीं है।




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