CPI M खो देगी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा? केरल में हार के बाद मंडराया खतरा, क्या हैं नियम?
केरल विधानसभा चुनाव पी विजयन के नेतृत्व वाले गठबंधन की करारी हार के बाद सीपीआई एम के राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे पर तलवार लटक गई है। बंगाल और त्रिपुरा में लगातार कमजोर हो रही पार्टी चुनाव आयोग द्वारा लगाई गई तीन शर्तों को पूरा करने की स्थिति में नहीं है।

केरल विधानसभा चुनाव 2026 भारत में लेफ्ट पार्टियों के लिए एक बड़ा झटका लेकर आया है। सीपीआई एम के नेतृत्व में केरल की सत्ता पर बैठे एलडीएफ गठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा है। दस वर्षों तक राज्य की सत्ता संभालने वाले एलडीएफ गठबंधन को केरल की जनता ने इस बार केवल 35 सीटों पर समेट दिया है। यह पिछले चार दशक में राज्य में उसका सबसे खराब प्रदर्शन है। सीपीआई एम की इस हार ने न केवल केरल में उसकी सत्ता को छीना है, बल्कि राष्ट्रीय पार्टी के उसके दर्जे को भी खतरे में डाल दिया है।
1977 के बाद ऐसा पहली बार हो रहा है कि देश के किसी भी राज्य में लेफ्ट पार्टियों की सरकार नहीं है। कभी पश्चिम बंगाल, केरल और पूर्वोत्तर भारत की राजनीति के केंद्र में रहने वाला वामपंथ अब हाशिए पर नजर आ रहा है। वामपंथ की इस स्थिति की शुरुआत 2011 में बंगाल में सत्ता गंवाने के साथ शुरू हुई थी। इसके बाद भाजपा ने त्रिपुरा में भी उसके गढ़ को ढ़हा दिया और अब केरल में कांग्रेस और उसके गठबंधन ने लेफ्ट का बचा हुआ आखिरी किला भी हथिया लिया है।
केरल में जनता की नाराजगी पड़ी भारी
केरल में 2016 विधानसभा चुनाव के दौरान लेफ्ट पार्टियों के गठबंधन को 140 में से 91 सीटें मिली थीं। पांच साल तक सत्ता चलाने के बाद पी विजयन की सरकार ने कोविड के दौर में हुए 2021 के विधानसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन में सुधार किया। पार्टी तब 99 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही। इस समय तक बंगाल और त्रिपुरा में सत्ता गंवा चुके वामपंथ के लिए यह एक बड़ा बूस्ट साबित हुआ।
दूसरी बार सत्ता में आने के वाले विजयन से जनता की उम्मीदें ज्यादा थीं। लेकिन कोविड के बाद के हालात और बढ़ती बेरोजगारी ने जनता के बीच में उनकी छवि को धक्का पहुंचाया। शबरीमाला मंदिर विवाद ने भी लेफ्ट नेताओं की छवि को जनता के सामने खराब कर दिया। दस साल की एंटी इंकम्बेंसी और जनता के विरोध का परिणाम यह हुआ कि विजयन को अपनी विधानसभा सीट को जीतना मुश्किल नजर आने लगा। वोटिंग के शुरुआती सात चरण में वह पीछे नजर आए। हालांकि बाद में उन्होंने अपनी सीट जीत ली, लेकिन जीत का अंतर पिछले चुनाव की तुलना में काफी कम हो गया।
लेफ्ट नेताओं से केरल की जनता की नाराजगी का असर इस कदर दिखा कि विजयन के 19 में से 13 मंत्री अपनी सीट बचाने में नाकामयाब रहे। कन्नूर और अंबालाप्पुझा जैसे वामपंथ के मजबूत गढ़ों में भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।
क्या चला जाएगा सीपीआई एम का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा?
पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा के बाद केरल ही लेफ्ट पार्टी का एक मजबूत गढ़ बना हुआ था। लेकिन अब विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद सीपीआई एम के राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे पर तलवार लटक गई है। चुनाव आयोग की 2019 की हैंडबुक के मुताबिक किसी भी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए तीन शर्तों को पूरा करना होगा।
1. चार प्रदेशों में राज्य पार्टी का दर्जा
राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए किसी भी पार्टी के सामने सबसे बड़ी शर्त यह होती है कि उसे चार प्रदेशों में राज्य पार्टी का दर्जा प्राप्त करना होता है। सीपीआईएम के प्रदर्शन की बात करें तो वह अभी केरल, त्रिपुरा और तमिलनाडु में राज्य पार्टी का दर्जा प्राप्त किए हुए है। लेकिन पश्चिम बंगाल में पार्टी के प्रदर्शन के आधार पर उसका यह दर्जा खत्म हो चुका है। ऐसे में पार्टी इस शर्त को पूरा नहीं करती है।
2. लोकसभा या विधानसभा में 6 फीसदी वोट और कम से कम 4 सीटें
सीपीआई एम पार्टी राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए इस शर्ते को पूरा करने में भी कमजोर नजर आती है। केरल में पार्टी के पास मजबूत वोटबैंक था। लेकिन विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार ने उसकी स्थिति को कमजोर कर दिया है। त्रिपुरा में भी पार्टी के पास सीमित वोट बैंक ही है। इसके बाद तमिलनाडु में पार्टी इन शर्तों को पूरा करने के लिए अपने गठबंधन पर निर्भर है। इन तीन राज्यों के अलावा पार्टी का किसी अन्य राज्य में कोई मजबूत आधार नहीं है। इसलिए पार्टी इस शर्त को भी पूरा नहीं करती है।
3. लोकसभा में 2 फीसदी सीटें
चुनाव आयोग के मुताबिक किसी भी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए लोकसभा की कम से कम दो फीसदी सीटें यानी कि 11 सीटों पर जीत हासिल करनी होगी। लेकिन राजनीतिक रूप से अपनी जड़े को खो रही सीपीआईएम के पास इतनी सीटें नहीं है। इसलिए वह इस शर्त को पूरा करने में भी असमर्थ है।
चुनाव आयोग द्वारा राष्ट्रीय पार्टी बने रहने के लिए जितनी भी शर्तें लगाई गई हैं। सीपीआई एम अभी उनमें से ज्यादातर पर कमजोर स्थिति में है। लेकिन फिर भी चुनाव आयोग एक दम से उसका राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा नहीं छीन लेगा। पिछली आंकड़ों के आधार पर उसका दर्जा बना रह सकता है। लेकिन अगर अगले चुनावों में भी पार्टी का प्रदर्शन इसी तरह से गिरता रहता है, तब यह निश्चित है कि यह लेफ्ट पार्टी भारत में अपना राष्ट्रीय स्तर का दर्जा खो दे।




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