CDS Anil Chauhan explains why former PM Nehru wanted the Panchsheel Agreement with China चीन के साथ नेहरू ने क्यों किया था पंचशील समझौता? CDS चौहान ने बताई तिब्बत वाली बात, India News in Hindi - Hindustan
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चीन के साथ नेहरू ने क्यों किया था पंचशील समझौता? CDS चौहान ने बताई तिब्बत वाली बात

भारत और चीन के रिश्तों पर बात करते हुए सीडीएस अनिल चौहान ने पूर्व पीएम नेहरू के समय में किए गए पंचशील समझौते को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पीएम उस समय पर उत्तरी सीमा का पर शांति चाहते थे, इसलिए उन्होंने इस समझौते को महत्व दिया।

Fri, 13 Feb 2026 03:59 PMUpendra Thapak लाइव हिन्दुस्तान
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चीन के साथ नेहरू ने क्यों किया था पंचशील समझौता? CDS चौहान ने बताई तिब्बत वाली बात

चीफ और डिफेंस स्टॉप जनरल अनिल चौहान ने भारत और चीन के बीच हुए पंचशील समझौते को लेकर अपनी राय रखी है। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा 1954 में किए गए इस समझौते के तहत भारत ने आधिकारिक रूप से तिब्बत को चीन के हिस्से के रूप में स्वीकार कर लिया था। सीडीएस ने कहा कि इस समझौते के बाद भारत को लगा कि उत्तरी सीमा के विवाद का निपटारा हो गया है, लेकिन चीन ने इसे केवल एक व्यापारिक समझौता माना।

देहरादून में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीडीएस अनिल चौहान ने उस समय की परिस्थितियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उस समय भी चीन का रुख यही था कि यह समझौता केवल व्यापारिक रास्तों के लिए है, इसका सीमा से कोई लेना-देना नहीं है। इसके बाद से ही एलएसी आज तक संवेदनशील बनी हुई है। गौरतलब है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और तत्तकालीन चीनी प्रीमीयर झोउ एनलाई के बीच में पंचशील समझौता हुआ था। इसके पांच सिद्धांत थे, जो शांति पूर्ण सहअस्तित्व पर आधारित थे।

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सीडीएस ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, "ब्रिटिश चले गए, उन्हें एक दिन जाना ही था। वह अपने पीछे छोड़ गए यह सीमाएं, अब भारत को तय करना था कि हमारी सीमा कहां है? नेहरू शायद जानते थे कि पूर्व में हमारे पास मैकमोहन जैसी व्यवस्था है, इसके अलावा लद्दाख के कुछ क्षेत्र पर भी हमारा दावा है, लेकिन यहां इन पहाड़ों और दर्रों के बीच में स्तिथि स्पष्ट नहीं थी, इसलिए शायद उन्होंने पंचशील सिद्धांत का रास्ता चुना।

तिब्बत हथियाने के बाद क्षेत्र में शांति चाहता था चीन

1950 के दशक का चीन आज के जितना मजबूत नहीं था। लगातार युद्धों के वजह से उसकी हालत भी कमजोर थी। हालांकि इसके बाद भी उसने तिब्बत को हथिया लिया, लेकिन इसके आगे आने की उसकी हिम्मत नहीं थी। ऐसे में वह भी शांति चाहता था। सीडीएस चौहान ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए कहा, "चीनियों के लिए भी यह समझौता महत्वपूर्ण था, क्योंकि उन्होंने हाल ही में तिब्बत को 'मुक्त' किया था। वे ल्हासा और शिनजियांग तक पहुंच चुके थे। यह क्षेत्र उनकी पहुंच से काफी दूर थे। ऐसे में यहाँ स्थिरता बनाए रखना मुश्किल था, ऐसे में वह भी यहां पर शांति चाहते थे।"

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सीडीएस चौहान ने बताया कि स्वतंत्र भारत भी चीन के रूप में एक मजबूत दोस्त को देख रहा था, और उसके साथ मजबूत संबंध चाहता था। ऐसे में यह क्षेत्र दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण बन गया। चीन ने भी इस समय पर भारत के साथ दोस्ताना संबंध बनाए रखे। भारत ने भी संयुक्त राष्ट्र में चीन की स्थायी सीट का समर्थन कर दिया। इसके बाद हिमालयी क्षेत्र, जो पहले तिब्बत के रूप में भारत और चीन के बीच बफर जोन बना हुआ था, वह अब बफर न रहकर सीमा में बदल गया था।

बकौल, सीडीएस चौहान इस समझौते के बाद भारत ने समझा कि उसने उत्तरी सीमा का विवाद औपचारिक रूप से निपटा लिया है, अब इसे केवल एक संधि के तौर पर मान्यता देना बाकी है। भारत के लिए इस सीमा की वैधता अब पंचशील समझौते के आधार पर ही थी। भारत का मानना था कि छह दर्रों, शिपकी ला, माणा, नीति, किंगरी- बिंगरी, लिपुलेख और धर्मा की पहचान कर इन्हें व्यापारिक और तीर्थ यात्रा के लिए महत्वपूर्ण बना दिया गया था। लेकिन चीन के मंसूबे कुछ और ही थे, चीन ने स्पष्ट कर दिया था कि उसके लिए यह समझौता केवल व्यापारिक स्थिति और राजमार्ग के लिए है, इसका सीमा विवाद या सीमा तय करने से कोई लेना-देना नहीं है

क्या था पंचशील समझौता?

आजाद भारत और चीन के बीच में वर्ष 1954 में पंचशील समझौता संपन्न हुआ था। इस समझौते का आधिकारिक नाम 'भारत और चीन के बीच तिब्बत क्षेत्र के साथ व्यापार और आवागमन पर समझौता' था। इस समझौते में तिब्बत क्षेत्र का नाम सामने आने पर यह स्पष्ट हो गया कि भारत ने तिब्बत के ऊपर चीन का अधिकार स्वीकार कर लिया है।

इस समझौते के मुख्य पांच सिद्धांत थे।

1. एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभता का सम्मान

2. पारस्परिक अनाक्रमण

3. पारस्परिक आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना

4.समानता और पारस्परिक लाभ

5. शांति पूर्ण सहअस्तित्व

गौरतलब है कि भारत और चीन के बीच यह समझौता 29 अप्रैल 1954 को साइन हुआ था। इसकी वैधता 8 साल के लिए रखी गई थी। 3 जून 1962 को इस समझौते के खत्म होने के कुछ समय बाद ही चीन ने भारत के ऊपर हमला कर दिया।

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