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शादी के बाद लिव-इन में रह सकते हैं पुरुष? इलाहाबाद HC के फैसलों से बढ़ा कन्फ्यूजन

इस फैसले में अदालत ने संविधान के आर्टिकल 226 के तहत हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसा कोई आदेश नहीं दिया जा सकता जो किसी अन्य के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन करे।

Sun, 29 March 2026 11:21 AMHimanshu Jha लाइव हिन्दुस्तान
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शादी के बाद लिव-इन में रह सकते हैं पुरुष? इलाहाबाद HC के फैसलों से बढ़ा कन्फ्यूजन

HC on Live-in Relationship: इलाहाबाद हाईकोर्ट में कुछ ही दिनों के अंतराल पर लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े एक ही तरह के दो मामलों में अलग-अलग फैसला सुनाया गया है। अदालत ने एक मामले में जहां विवाहित व्यक्ति के लिव-इन रिलेशन को कानूनी संरक्षण देने से इनकार कर दिया, वहीं दूसरे मामले में इसे अपराध नहीं माना। पहला मामला 20 मार्च का है, जिसमें एकल पीठ के जज जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा कि कोई भी विवाहित व्यक्ति बिना तलाक लिए किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशन में नहीं रह सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता वहां समाप्त हो जाती है, जहां दूसरे व्यक्ति के वैधानिक अधिकार शुरू होते हैं।

अदालत ने कहा कि पति या पत्नी को अपने जीवनसाथी के साथ रहने का कानूनी अधिकार है और इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर छीना नहीं जा सकता है। ऐसे मामलों में अदालत ने लिव-इन कपल को सुरक्षा देने से इनकार करते हुए कहा कि वे यदि किसी प्रकार की हिंसा या खतरे का सामना करते हैं तो पुलिस से संपर्क कर सकते हैं, लेकिन अदालत सीधे तौर पर संरक्षण का आदेश नहीं दे सकती।

इस फैसले में अदालत ने संविधान के आर्टिकल 226 के तहत हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसा कोई आदेश नहीं दिया जा सकता जो किसी अन्य के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन करे। अदालत के अनुसार, “किसी एक की स्वतंत्रता दूसरे के वैधानिक अधिकारों पर अतिक्रमण नहीं कर सकती।”

इस केस में नहीं माना अपराध

वहीं, 25 मार्च को इसी विषय पर एक अलग मामले में खंडपीठ ने बिल्कुल अलग दृष्टिकोण अपनाया। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने कहा कि यदि कोई विवाहित पुरुष किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन संबंध में रह रहा है तो यह अपने आप में कोई अपराध नहीं है। अदालत ने साफ किया कि कानून और सामाजिक नैतिकता को अलग-अलग रखना जरूरी है। उन्होंने कहा, “यदि किसी कृत्य को कानून के तहत अपराध घोषित नहीं किया गया है तो केवल सामाजिक विचारों या नैतिकता के आधार पर अदालत निर्णय नहीं ले सकती है।”

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इस मामले में महिला ने पुलिस को दिए आवेदन में कहा था कि वह बालिग है और अपनी इच्छा से उस व्यक्ति के साथ रह रही है। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके परिवार के लोग इस संबंध का विरोध कर रहे हैं और उसे जान से मारने की धमकी दे रहे हैं, जिससे ऑनर किलिंग का खतरा है।

पुराने केस का दिया हवाला

खंडपीठ ने इस पर गंभीर रुख अपनाते हुए पुलिस को जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। अदालत ने 2018 में शक्ति वाहिनी बनाम भारत सरकार में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि दो वयस्कों की सुरक्षा करना पुलिस की जिम्मेदारी है, खासकर तब जब उन्हें परिवार से खतरा हो। इसके साथ ही अदालत ने महिला के परिवार को कपल से संपर्क करने या उनके घर में प्रवेश करने से रोक दिया और शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक को उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी। साथ ही अपहरण के मामले में आरोपी बनाए गए पुरुष को भी राहत दी गई।