ममता के वारिस पर चौतरफा वार, बंगाल में आखिर क्यों निशाने पर हैं अभिषेक बनर्जी?
विधानसभा चुनाव 2026 में टीएमसी की हार के बाद पार्टी के भीतर और पूरे बंगाल में सबसे ज्यादा नाराजगी अभिषेक बनर्जी के नाम पर जताई जा रही है। ममता के भतीजे अब भ्रष्टाचार, सिंडिकेट राज, गुटबाजी और एजेंसियों की जांच के प्रमुख चेहरे बन गए हैं।

Bengal News Today: बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस (TMC ) की पहली बड़ी हार के बाद पार्टी के भीतर और बंगाल की जनता में जिस एक नाम पर सबसे ज्यादा नाराजगी जताई जा रही है, वह है अभिषेक बनर्जी। टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी की विरासत को संभालने वाले माने जा रहे उनके भतीजे अब भ्रष्टाचार, सिंडिकेट राज, गुटबाजी और केंद्रीय एजेंसियों की जांच के प्रमुख चेहरे के रूप में नजर आ रहे हैं।
2016 की घटना आज भी है याद
लगभग एक दशक पहले की घटना अभी भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। 2016 में ममता बनर्जी के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान कोलकाता की रेड रोड पर अभिषेक बनर्जी अनुपस्थित रहे। उससे पहले पूरे शहर में उनके पोस्टर लगाए गए थे, जिन्हें बाद में चुपचाप हटा दिया गया। तभी से तृणमूल कांग्रेस में 'भाईपो' की बढ़ती भूमिका पर सवाल उठने शुरू हो गए थे। वरिष्ठ नेता उन्हें 'युवराज' कहकर पुकारने लगे और उनके इर्द-गिर्द खेमेबाजी भी साफ नजर आने लगी थी।
2026 की हार ने बदला समीकरण
पार्टी के लिए यह पहली बड़ी चुनावी हार साबित हुई है और अब अभिषेक बनर्जी स्थानीय स्तर पर आक्रोश के मुख्य केंद्र बन गए हैं। उन पर भ्रष्टाचार, संगठनात्मक विघटन, गुटबाजी और संभावित पार्टी विभाजन के गंभीर आरोप लग रहे हैं। सबसे संवेदनशील मामला जाली हस्ताक्षर कांड का है। बंगाल CID ने उन्हें दो बार समन जारी किया, लेकिन स्वास्थ्य का हवाला देकर अभिषेक पेश नहीं हुए। सूत्रों के अनुसार तीसरा समन जल्द जारी होने वाला है, जिससे उनकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
दीदी की ढाल, भतीजे का बोझ
पिछले दस साल से ज्यादा समय से ममता बनर्जी तृणमूल की सबसे बड़ी वोट खींचने वाली शक्ति, संकटमोचक और राजनीतिक सुरक्षा कवच बनी हुई हैं। लेकिन बंगाल में बढ़ते भ्रष्टाचार, सिंडिकेट प्रणाली, स्थानीय दबंगई और केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाइयों को लेकर जो गुस्सा है, वह ममता की बजाय मुख्य रूप से अभिषेक बनर्जी पर उतर रहा है।
कारण बिल्कुल साफ है। जनता ममता बनर्जी को अब भी संगठन से ऊपर 'दीदी' के रूप में देखती है, जबकि अभिषेक को पूरे संगठन का चेहरा माना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में तृणमूल कांग्रेस ममता के आंदोलनकारी स्वरूप से बदलकर एक सुव्यवस्थित चुनावी मशीन में तब्दील हो गई, जिसमें अभिषेक बनर्जी की भूमिका केंद्रीय रही।
अभिषेक का उदय और बढ़ता नियंत्रण
2014 में सांसद चुने जाने के बाद अभिषेक का राजनीतिक ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ा। उन्होंने युवा तृणमूल कांग्रेस को मजबूत किया, उम्मीदवार चयन, संगठनात्मक नियुक्तियों, चुनाव प्रबंधन और रणनीति पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई। शुरुआती सफलताओं का श्रेय उन्हें दिया गया, लेकिन अब असफलताओं का जिम्मेदार भी वे ही बन गए हैं।
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और नए युवा नेतृत्व के बीच मतभेद समय-समय पर सामने आते रहे। जो नेता ममता के साथ वामपंथ विरोधी और भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन में सड़क पर उतरे थे, उन्हें अब नई पीढ़ी के नेताओं के साथ समायोजित होने में दिक्कत महसूस होती रही। चुनावी जीतों ने इन दरारों को ढक रखा था, लेकिन 2026 की हार के बाद ये दरारें फिर दिखने लगी हैं।
इन सबके बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि ममता बनर्जी की विरासत संभालने वाले अभिषेक बनर्जी इस बढ़ते आंतरिक आक्रोश और चुनौतियों से कैसे निपट पाएंगे। बंगाल की राजनीति में 'भाईपो' वाला अध्याय एक नई और नाजुक मोड़ पर पहुंच गया है।




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