होर्मुज की नाकाबंदी हटाओ, बातचीत की मेज पर लौटो; ट्रंप पर दबाव क्यों बना रहा सऊदी अरब?
रियाद अमेरिकी प्रशासन पर दबाव डाल रहा है कि होर्मुज की नाकाबंदी हटाई जाए और बातचीत की मेज पर लौटा जाए। अरब अधिकारियों ने बताया कि सऊदी अरब को डर है कि ट्रंप प्रशासन की यह कदम तेहरान में तनाव बढ़ा सकता है और अन्य महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में बाधा पैदा कर सकता है।

मिडिल ईस्ट में छह सप्ताह से जारी अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान युद्ध ने खाड़ी देशों की नींद उड़ा दी है। शायद यही कारण है कि होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की नाकाबंदी और अमेरिका की जवाबी कार्रवाई के बीच सऊदी अरब ने अमेरिकी प्रशासन को साफ चेतावनी दी है कि स्थिति और बिगड़ सकती है। रियाद अब ट्रंप सरकार से मांग कर रहा है कि नाकाबंदी हटाकर तनाव कम किया जाए, वरना ईरान लाल सागर का बाब अल-मंडेब जलमार्ग बंद कर सऊदी तेल निर्यात को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, रियाद अमेरिकी प्रशासन पर दबाव डाल रहा है कि होर्मुज की नाकाबंदी हटाई जाए और बातचीत की मेज पर लौटा जाए। अरब अधिकारियों ने बताया कि सऊदी अरब को डर है कि ट्रंप प्रशासन की यह कदम तेहरान में तनाव बढ़ा सकता है और अन्य महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में बाधा पैदा कर सकता है।
गौरतलब है कि अमेरिका ने ईरान की कमजोर अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के लिए होर्मुज जलमार्ग से ईरानी जहाजों की आवाजाही रोकने का फैसला किया है। लेकिन सऊदी अरब ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि ईरान जवाबी कार्रवाई में लाल सागर के बाब अल-मंडेब जलमार्ग को बंद कर सकता है, जो सऊदी अरब के शेष तेल निर्यात के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
खाड़ी देशों की बढ़ती चिंताएं
बता दें कि छह सप्ताह के युद्ध में तेहरान ने महत्वपूर्ण जलमार्गों को बंद करने और क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे पर हमले करने की अपनी क्षमता तथा इच्छाशक्ति, दोनों का प्रदर्शन किया है। इससे पड़ोसी देशों के जोखिम का आकलन पूरी तरह बदल गया है और खाड़ी देशों की लंबी अवधि की तेल-गैस रणनीतियां खतरे में पड़ गई हैं। कई हफ्तों की रुकावटों के बाद सऊदी अरब ने रेगिस्तान के पार पाइपलाइन के जरिए लाल सागर तक कच्चे तेल पहुंचाकर अपने निर्यात को युद्ध-पूर्व स्तर (लगभग 70 लाख बैरल प्रतिदिन) पर पहुंचाने में सफलता हासिल की है। लेकिन अगर बाब अल-मंडेब भी बंद हो गया तो यह आपूर्ति भी खतरे में पड़ जाएगी।
बाब अल-मंडेब के पास का तटीय क्षेत्र यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के नियंत्रण में है। गाजा युद्ध के दौरान हूतियों ने इस मार्ग को बुरी तरह बाधित किया था। अब ईरान हूतियों पर दबाव डाल रहा है कि वे इस जलमार्ग को फिर से बंद करें। यमन विशेषज्ञ और न्यू अमेरिका संस्थान के फेलो एडम बैरन ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से बात करते हुए बताया कि अगर ईरान बाब अल-मंडेब बंद करना चाहे तो हूती सबसे उपयुक्त सहयोगी हैं। गाजा संघर्ष में उनकी प्रतिक्रिया से उनकी क्षमता साफ दिखी है।
ईरान की बाब अल-मंडेब पर चेतावनी
ईरान की अर्धसरकारी तसनीम समाचार एजेंसी (जो इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के करीबी है) ने रिपोर्ट किया कि अमेरिकी नाकाबंदी के जवाब में तेहरान लाल सागर का प्रवेश द्वार बंद कर सकता है। ईरान के सर्वोच्च नेता के विदेश नीति सलाहकार अली अकबर वेलायती ने 5 अप्रैल को सोशल मीडिया पर लिखा कि तेहरान बाब अल-मंडेब को होर्मुज की तरह देखता है। अगर वाइट हाउस अपनी 'मूर्खतापूर्ण गलतियां' दोहराता है तो उसे जल्द एहसास होगा कि वैश्विक ऊर्जा और व्यापार का प्रवाह एक ही संकेत पर बाधित हो सकता है। सोमवार को ईरान ने अपने पड़ोसियों की समुद्री सुरक्षा को भी धमकी दी। सरकारी समाचार एजेंसी आईआरआईबी के हवाले से ईरानी सशस्त्र बलों ने कहा कि अगर फारस की खाड़ी और ओमान सागर में हमारे बंदरगाहों की सुरक्षा को खतरा है, तो वहां कोई भी बंदरगाह सुरक्षित नहीं रहेगा।
युद्ध ने ऊर्जा ढांचे की कमजोरी को किया उजागर
बता दें कि अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध ने मध्य पूर्व के ऊर्जा बुनियादी ढांचे की कमजोरी उजागर कर दी है। शांति काल में होर्मुज से वैश्विक तेल और एलएनजी का करीब 20 प्रतिशत गुजरता है। ईरान के नियंत्रण ने प्रतिदिन लगभग 1.3 करोड़ बैरल तेल निर्यात रोक दिया, जिससे तेल की वायदा कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं। दूसरी ओर अमेरिकी नाकाबंदी सोमवार से लागू हो गई है। वाइट हाउस की प्रवक्ता अन्ना केली ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ किया है कि वे ऊर्जा के निर्बाध प्रवाह के लिए होर्मुज को पूरी तरह खुला रखना चाहते हैं। प्रशासन खाड़ी सहयोगियों के साथ लगातार संपर्क में है ताकि ईरान जबरन वसूली न कर सके।
खाड़ी देशों और ईरान के बीच बढ़ता तनाव
छह सप्ताह के युद्ध ने ईरान और उसके पड़ोसियों ( सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन तथा इराक) के बीच गहरे तनाव को उजागर कर दिया है। ये सभी देश अमेरिका के करीबी सहयोगी हैं। पहले ये देश तेहरान के साथ सीधा टकराव टालते थे, क्योंकि एक अलिखित समझौता था कि युद्ध से साझा आर्थिक हितों को भारी नुकसान होगा। अब यह समझ पूरी तरह टूट चुकी है। खाड़ी देश अब चाहते हैं कि युद्ध का अंत ऐसे न हो जिसमें ईरान अपनी आर्थिक जीवनरेखा पर नियंत्रण बनाए रखे। सऊदी अरब समेत कई देश अमेरिका पर दबाव डाल रहे हैं कि बातचीत से मुद्दे का हल निकाला जाए।
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