भोजशाला की कहानी क्या है? मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर कैसे और कब बना कमाल मौला मस्जिद
Bhojshala Story: 11वीं सदी में परमार वंश के राजा भोज ने धार को अपनी राजधानी बनाया था। उसी दौर में यहां एक विशाल संस्कृत विद्यापीठ और मां सरस्वती का मंदिर स्थापित किया गया था।

Bhojshala Story: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने कहा कि यह मां सरस्वती का ही मंदिर है। हाई कोर्ट ने भोजशाला में नमाज पर रोक लगाने के आदेश दिए हैं। भोजशाला देश के सबसे चर्चित धार्मिक-ऐतिहासिक स्थलों में से एक है। काफी पुराने इस परिसर को हिंदू पक्ष मां सरस्वती का मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद कहता रहा है।
राजा भोज से जुड़ी भोजशाला की कहानी
इतिहासकारों के अनुसार, 11वीं सदी में परमार वंश के राजा भोज ने धार को अपनी राजधानी बनाया था। उसी दौर में यहां एक विशाल संस्कृत विद्यापीठ और मां सरस्वती का मंदिर स्थापित किया गया। इसे बाद में 'भोजशाला' कहा जाने लगा। माना जाता है कि यहां विद्वानों को वेद, व्याकरण, दर्शन और संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी। कई ऐतिहासिक दस्तावेजों और शिलालेखों में यहां देवी सरस्वती की पूजा और संस्कृत अध्ययन का उल्लेख मिलता है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, परिसर में आज भी संस्कृत शिलालेख, देवी-देवताओं की आकृतियां, हवन कुंड और मंदिर शैली के स्तंभ मौजूद हैं।
कैसे बना कमाल मौला मस्जिद?
इतिहासकारों के अनुसार, 1305 ईस्वी के आसपास अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में मालवा पर मुस्लिम आक्रमण हुआ। फिर 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी द्वितीय ने भोजशाला को मस्जिद में परिवर्तित करने का प्रयास किया। मंदिर के कुछ हिस्सों को तोड़कर वहां मस्जिदनुमा ढांचा तैयार किया गया। इसके बाहर एक मकबरा बनवाया गया। बाद में यह परिसर सूफी संत कमाल मौला से जुड़ गया और इसे कमाल मौला मस्जिद कहा जाने लगा। हालांकि ऐतिहासिक अभिलेखों से यह भी पता चलता है कि मौलाना की मौत दो शताब्दियों से भी अधिक समय पहले सन् 1310 ईस्वी में हो गई थी।
अंग्रेजों के दौर में बढ़ा विवाद
ब्रिटिश शासनकाल में इस स्थल को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया। 1902-03 में पहली बार 'भोजशाला' नाम आधिकारिक रूप से सामने आया। बाद में यहां पूजा और नमाज को लेकर अलग-अलग व्यवस्थाएं बनाई गईं। वर्ष 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने व्यवस्था तय की कि मंगलवार को हिंदू पूजा करेंगे और शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय नमाज पढ़ेगा। यही व्यवस्था लंबे समय तक लागू रही।
सर्वे में क्या मिला?
2024 में हाई कोर्ट के आदेश पर एएसआई ने सर्वे किया। एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में परिसर में मंदिर शैली के अवशेष, देवी-देवताओं की मूर्तियों के हिस्से, संस्कृत और प्राकृत अभिलेख तथा प्राचीन स्थापत्य सामग्री मिलने की बात कही। हिंदू पक्ष ने दावा किया कि यह सर्वे मंदिर होने के प्रमाण देता है, जबकि मुस्लिम पक्ष ने रिपोर्ट पर सवाल उठाए और कहा कि पुराने राजस्व रिकॉर्ड में यह स्थल मस्जिद के रूप में दर्ज है।
हाई कोर्ट का फैसला
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 15 मई को अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि भोजशाला का धार्मिक स्वरूप देवी वाग्देवी सरस्वती के मंदिर का है और यहां हिंदू पूजा की परंपरा कभी समाप्त नहीं हुई। अदालत ने 2003 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने केंद्र सरकार को लंदन संग्रहालय में रखी मां सरस्वती की प्रतिमा को वापस लाने की मांग पर विचार करने की भी अनुमति दी है।




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