mp high court ruling homemaker not unskilled worker accident compensation increased ‘गृहिणी कोई अकुशल श्रमिक नहीं…'; MP हाई कोर्ट ने रोड एक्सीडेंट में महिला की मौत पर मुआवजा बढ़ाया, Madhya-pradesh Hindi News - Hindustan
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‘गृहिणी कोई अकुशल श्रमिक नहीं…'; MP हाई कोर्ट ने रोड एक्सीडेंट में महिला की मौत पर मुआवजा बढ़ाया

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि घर संभालने वाली महिला कोई 'अकुशल श्रमिक' नहीं है। वो बिना कोई वेतन और छुट्टी के चौबीसों घंटे काम करती है। कोर्ट ने एक सड़क दुर्घटना मामले में महिला की मौत पर दी जाने वाली मुआवजा राशि को बढ़ाकर 5.44 लाख रुपये कर दिया है।

Tue, 31 March 2026 01:29 PMPraveen Sharma लाइव हिन्दुस्तान, जबलपुर
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‘गृहिणी कोई अकुशल श्रमिक नहीं…'; MP हाई कोर्ट ने रोड एक्सीडेंट में महिला की मौत पर मुआवजा बढ़ाया

Madhya Pradesh News : मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि घर संभालने वाली महिला कोई अकुशल श्रमिक (Unskilled Worker) नहीं है। वो बिना कोई वेतन और छुट्टी के चौबीसों घंटे काम करती है। कोर्ट ने एक सड़क दुर्घटना मामले में महिला की मौत पर दी जाने वाली मुआवजा राशि को बढ़ाकर 5.44 लाख रुपये कर दिया है।

हाईकोर्ट ने गृहिणी की आय का आकलन ‘अकुशल श्रमिक’ के बजाय 'अर्ध-कुशल श्रमिक' (Semi-skilled worker) के स्तर पर करने का निर्देश दिया है। कोर्ट के अनुसार, एक महिला घर में जो ढेरों सेवाएं देती है, वह परिवार का आधार होती है। हाईकोर्ट का यह फैसला महिलाओं के घरेलू काम के आर्थिक मूल्य को मान्यता देने वाला एक ऐतिहासिक कदम है।

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क्या था मामला?

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस हिरदेश रोड एक्सीडेंट में मारी गई एक महिला के परिवार के सदस्य द्वारा दायर की गई अपील पर सुनवाई कर रहे थे। यह मामला मुरैना के 'मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल' (MACT) के एक पुराने फैसले से जुड़ा है। ट्रिब्यूनल रोड एक्सीडेंट में जान गंवाने वाली गृहिणी के परिवार को केवल 4.28 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। ट्रिब्यूनल ने महिला की आय केवल 4,500 रुपये प्रति माह आंकी थी, क्योंकि आय का कोई पुख्ता दस्तावेजी सबूत नहीं था। ट्रिब्यूनल के इसी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि एक गृहिणी परिवार के लिए अनेक प्रकार की सेवाएं प्रदान करती है। वह बिना किसी निश्चित काम के घंटों या छुट्टी के पूरे घर-परिवार को मैनेज करती है। ऐसे काम की इकोनॉमिक वैल्यू को 'उचित मुआवजा तय करते समय अनदेखा नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने निर्देश दिया कि बढ़ी हुई रकम सर्टिफाइड ऑर्डर मिलने के तीन महीने के अंदर दी जाए।

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ट्रिब्यूनल का असेसमेंट गलत

अपीलकर्ता ने ट्रिब्यूनल के 7 फरवरी 2019 के फैसले को इस तर्क के साथ चुनौती दी थी कि मृतका की आय का आकलन कम करके किया गया था। अपीलकर्ता के वकील संजय सिंह ने यह दलील दी कि मृतक कृषि कार्यों, पशुपालन और दूध बेचने के काम में लगी हुई थी, जिससे वह हर महीने लगभग 15,000 रुपये कमाती थी। इस पहलू पर ठीक से विचार नहीं किया गया था। हालांकि, दस्तावेजी सबूतों की कमी के कारण ट्रिब्यूनल ने उसकी आय 4,500 रुपये प्रति माह तय की थी।

हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के तरीके को कानूनी से रूप गलत पाया और यह कहा कि कि इनकम के पक्के प्रूफ के न होने पर भी एक गृहणी की सेवाओं की अनुमानित कीमत का आकलन सही ढंग से किया जाना चाहिए और इसे कम से कम अंदाजों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

इनकम का फिर से आकलन

हाईकोर्ट ने गलती सुधारते हुए माना कि मृतका की आय मिनिमम वेज एक्ट के तहत कम से कम एक अर्ध-कुशल श्रमिक के लेवल पर आंकी जानी चाहिए थी, जो उस समय Rs 7,982 प्रति महीना थी। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि गृहणी अक्सर एक साथ कई आय कमाने वाले और घरेलू कामों में हिस्सा लेती हैं, जिससे फॉर्मल वेज रिकॉर्ड न होने के बावजूद उनकी भूमिका आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। हाईकोर्ट ने मुआवजे की फिर से गणना करते समय सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित स्थापित सिद्धांतों को लागू किया।

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