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दिग्विजय सिंह का बड़ा दावा, UGC के फाइनल नियमों में नहीं शामिल कीं कुछ अहम सिफारिशें

यूजीसी के नए नियमों को लेकर दिग्विजय सिंह ने दावा किया कि संसदीय समिति की कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशों को जनवरी 2026 की अंतिम गाइडलाइंस में नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने सरकार से स्पष्ट और संतुलित कदम उठाने की मांग की ताकि छात्रों को न्याय मिल सके।

Thu, 29 Jan 2026 02:32 AMKrishna Bihari Singh लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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दिग्विजय सिंह का बड़ा दावा, UGC के फाइनल नियमों में नहीं शामिल कीं कुछ अहम सिफारिशें

यूजीसी के नए दिशानिर्देशों के विरोध को लेकर गरमाए माहौल के बीच कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने बुधवार को एक बड़ा दावा किया। उन्होंने दावा किया कि संसदीय समिति ने कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें की थीं लेकिन जनवरी 2026 में जारी अंतिम नियमों में इन्हें यूजीसी की ओर से पूरी तरह शामिल नहीं किया गया। यूजीसी के नए इक्विटी नियमों पर दिग्विजय सिंह का मानना है कि उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए सख्त फैसले जरूरी हैं लेकिन संतुलित कदम भी उठाए जाने चाहिए।

रात को लिखी लंबी पोस्ट, बताई पूरी बात

कांग्रेस के कद्दावर नेता दिग्विजय सिंह ने बुधवार रात को 'एक्स' पर एक लंबी पोस्ट लिखी। इसमें उन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए दिशानिर्देशों को लेकर गंभीर चिंता जताई। दिग्विजय सिंह ने कहा कि पायल तडवी और रोहित वेमुला की माताओं की मांगों पर गौर करते हुए और सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद फरवरी 2025 में मोदी सरकार और यूजीसी ने ड्राफ्ट यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस पेश किए थे। इन्हें दिसंबर 2025 में शिक्षा पर संसदीय स्थायी समिति को भेजा गया था। इसके बाद संसदीय समिति ने इन मसौदा नियमों की समीक्षा की थी। संसदीय समिति ने यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस की समीक्षा करते हुए आखिर में अपनी ओर से एक सर्वसम्मत रिपोर्ट जारी कर दी थी।

अन्य हितधारकों का उत्पीड़न भी शामिल करने का दिया था सुझाव

दिग्विजय सिंह ने आगे कहा कि संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में नियमों को और मजबूत बनाने के लिए कई सिफारिशें की थीं। समिति ने बिल्कुल स्पष्ट सुझाव दिया था कि ड्राफ्ट नियमों में ओबीसी छात्रों के साथ ही अन्य हितधारकों के खिलाफ भी उत्पीड़न को शामिल किया जाना चाहिए। यही नहीं दिव्यांगता को भी भेदभाव का आधार के रूप में जोड़ा जाना चाहिए। संसदीय समिति का मानना था कि इक्विटी कमेटी में केवल एक महिला और एक-एक एससी एवं एसटी सदस्य का प्रावधान पर्याप्त नहीं है।

इक्विटी कमेटी पर भी दी थी स्पष्ट राय

दिग्विजय सिंह ने अपनी पोस्ट में बताया कि संसदीय समिति का मानना था कि इक्विटी कमेटी में सदस्यों को फैकल्टी और छात्रों में एससी, एसडी और ओबीसी के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण के अनुरूप बढ़ाया जाना चाहिए। इक्विटी समिति को निष्पक्ष प्रतिनिधित्व और प्रभावी निर्णय लेने को सुनिश्चित करने के लिए अपनी संरचना का आधे से अधिक हिस्सा एससी, एसडी और ओबीसी समुदायों से लेना चाहिए।

भेदभाव की व्यापक लिस्ट का दिया था सुझाव

दिग्विजय सिंह ने यह भी कहा है कि समिति का मानना था कि रेगुलेशन में भेदभावपूर्ण प्रथाओं की एक व्यापक सूची को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाना चाहिए। ड्राफ्ट रेगुलेशन में जाति-आधारित भेदभाव के मामलों का वार्षिक सार्वजनिक खुलासा होना चाहिए। फैकल्टी और प्रशासनिक कर्मचारियों के लिए अनिवार्य कार्यक्रम होने चाहिए।

बड़ा दावा, कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें नहीं मानीं

दिग्विजय सिंह ने अपनी पोस्ट में एक सनसनीखेज दावा भी किया है। उन्होंने कहा कि जनवरी 2026 में जारी अंतिम यूजीसी इक्विटी रेगुलेशंस में संसदीय समिति की कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशों को स्वीकार ही नहीं किया गया है। दिग्विजय सिंह ने आगे यूजीसी के नए दिशानिर्देशों में झूठे भेदभाव के आरोपों और मामलों पर दंड से संबंधित अलग प्रावधान को हटाए जाने को लेकर भी चिंता जताई। सनद रहे यूजीसी के फाइन दिशानिर्देशों में ऐसे ही संवेदनशील मुद्दों की अनदेखी को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों में आक्रोश है।

झूठे मामले पर दंड का प्रावधान हटाया

दिग्विजय सिंह ने दावा किया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी UGC के अंतिम रेगुलेशन ने एक अलग प्रावधान को भी हटा दिया जो भेदभाव के झूठे मामले दर्ज करने के लिए छात्रों को दंडित करता था। UGC ने इस प्रावधान को हटाने का फैसला अपनी मर्जी और संसदीय समिति की सिफारिशों से पूरी तरह आजाद होकर लिया।

दो मुद्दों पर आक्रोश, 1- झूठे केस पर प्रावधान हटाया

कांग्रेस नेता ने कहा है कि रेगुलेशन के खिलाफ सामान्य वर्ग के छात्रों की ओर से किए जा रहे विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से दो मुद्दों पर केंद्रित हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण मुद्दा ड्राफ्ट रेगुलेशन में मौजूद उस प्रावधान को हटाना है जो भेदभाव के झूठे मामले दर्ज कराने वाले छात्र को सजा देने के लिए निर्धारित था। सामान्य वर्ग के छात्रों की यही चिंता है कि इन प्रावधान के नहीं होने से जनरल कैटेगरी के छात्रों और फैकल्टी के खिलाफ जातिगत भेदभाव के झूठे मामले दर्ज हो सकते हैं। इस प्रावधान को हटाने का फैसला यूजीसी ने खुद ही लिया। इसका संसदीय समिति की रिपोर्ट से कोई लेना-देना नहीं था।

जातिगत भेदभाव पर जनरल कैटेगरी को किया बाहर

दिग्विजय सिंह ने कहा कि छात्रों की चिंता का दूसरा मुद्दा यह है कि यूजीसी के फाइन नियमों में केवल एससी, एसटी, और ओबीसी को ही ऐसी कैटेगरी के रूप में लिस्ट किया गया है जिन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है। इस प्रावधान पर जनरल कैटेगरी के छात्रों की एक चिंता है। सामान्य वर्ग के छात्रों का कहना है कि जनरल कैटेगरी को इस प्रावधान से बाहर करके यूजीसी ने रेगुलेशन में अप्रत्यक्ष रूप से उस दलील को मजबूती दी है कि जनरल कैटेगरी के छात्र ही जातिगत भेदभाव करते हैं।

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खुद ही लिए फैसले, फिर खुद सुलझाएं विवाद

दिग्विजय सिंह ने अपनी पोस्ट में दावा किया है कि सामान्य वर्ग के छात्रों को शामिल नहीं करने का फैसला भी यूजीसी ने खुद ही लिया है। यह साफ करना कि कौन से कृत्य भेदभाव माने जाएंगे न केवल छात्रों के लिए सुरक्षा को मजबूत करेगा वरन रेगुलेशन का दुरुपयोग और झूठे मामले दर्ज करने जैसी आशंकाओं को भी कम करेगा। संसदीय समिति ने यूजीसी से ऐसा ही करने को कहा था लेकिन उसने इस बात को नजरअंदाज कर दिया। अब इस पूरे प्रकरण को यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय को ही सुलझाना चाहिए।

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