खुशखबरी! लैब असिस्टेंट नियुक्ति प्रक्रिया की शर्त को हाईकोर्ट ने किया रद्द, क्या था मामला?
अदालत ने डॉ (मेजर) मीता सहाय बनाम बिहार राज्य के मामले का हवाला देते हुए कहा कि विज्ञापन की शर्तें यदि वैधानिक नियमों के विपरीत हैं, तो नियम ही प्रभावी होंगे।

झारखंड हाइकोर्ट ने लैब असिस्टेंट प्रतियोगी परीक्षा (विज्ञापन संख्या 01/2023) में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों के पक्ष में फैसला सुनाया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने विज्ञापन की उस शर्त को रद्द कर दिया है, जिसमें स्नातक स्तर पर संबंधित विषयों को दो या तीन साल तक पढ़ने की अनिवार्यता रखी गयी थी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि विज्ञापन की शर्तें वैधानिक नियमों से ऊपर नहीं हो सकतीं।
अदालत ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया झारखंड गवर्नमेंट स्कूल्स टीचर एंड नॉन-टीचिंग स्टाफ अपॉइंटमेंट एंड सर्विस कंडीशंस रूल्स, 2012 (संशोधित 2022-23) के तहत संचालित होती है। इन वैधानिक नियमों में कहीं भी संबंधित विषयों को दो या तीन साल पढ़ने की बाध्यता नहीं है। अदालत ने डॉ (मेजर) मीता सहाय बनाम बिहार राज्य के मामले का हवाला देते हुए कहा कि विज्ञापन की शर्तें यदि वैधानिक नियमों के विपरीत हैं, तो नियम ही प्रभावी होंगे।
क्या था मामला
झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) द्वारा लैब असिस्टेंट के 690 पदों के लिए निकाले गये विज्ञापन में एक अतिरिक्त शर्त जोड़ी गयी थी। इसके तहत अभ्यर्थियों के लिए यह अनिवार्य था कि उन्होंने स्नातक में भौतिकी, रसायन या जीव विज्ञान के विषयों को कम से कम दो या तीन वर्षों तक ऑनर्स या सब्सिडियरी के रूप में पढ़ा हो। चयन प्रक्रिया के दौरान जब अभ्यर्थियों को इस आधार पर अयोग्य घोषित किया गया, तो उन्होंने इसे चुनौती दी।
अंकों के बदलाव के आधार पर भेदभाव नहीं
झारखंड हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक ही संस्थान से हासिल समान डिग्री धारकों के बीच केवल अंकों के बदलाव के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने शिक्षा विभाग के उस नियम को मनमाना और अमान्य करार दिया, जिसके तहत 2007 से पहले 300 अंकों की संगीत प्रभाकर डिग्री लेने वालों को बहाली के अयोग्य मान लिया गया था।
10 सप्ताह में प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश
कोर्ट ने राज्य सरकार और जेएसएससी को निर्देश दिया है कि वे उन याचिकाकर्ताओं की उम्मीदवारी पर पुनर्विचार करें और विज्ञापन में दी गयी शर्त के बजाय 2012 के नियमों के अनुसार उनकी योग्यता की गणना करें। साथ ही पूर्व में याचिकाकर्ताओं को जारी की गयी अयोग्यता संबंधी नोटिस को भी अदालत ने रद्द कर दिया है। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को 10 सप्ताह के भीतर पूरा करने का आदेश दिया है।
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