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झारखंड में रेप मामलों की तेजी से होगी सुनवाई, 2 माह में पूरी जांच; HC के निर्देश

झारखंड हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न पीड़िताओं की सुरक्षा और पुनर्वास के लिए कड़े निर्देश दिए हैं। अब पुलिस को तुरंत 'जीरो FIR' दर्ज करनी होगी। साथ ही दो महीने में जांच पूरी करनी होगी। टू-फिंगर टेस्ट पर रोक रहेगी।

Wed, 10 June 2026 01:29 AMKrishna Bihari Singh हिन्दुस्तान टाइम्स, राज कुमार, रांची
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झारखंड में रेप मामलों की तेजी से होगी सुनवाई, 2 माह में पूरी जांच; HC के निर्देश

झारखंड हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की सुरक्षा और पुनर्वास के लिए कई सख्त निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने अधिकारियों को रेप की घटनाओं पर तुरंत जीरो एफआई दर्ज करने और दो महीने में जांच पूरी करने को कहा है। अदालत ने विवादित टू-फिंगर टेस्ट पर पूरी तरह रोक लगाते हुए पीड़िता के बच्चों के लिए 12वीं तक मुफ्त शिक्षा का प्रावधान करने को भी कहा है। अदालतों ने वन-स्टॉप सेंटरों की स्थिति सुधारने, 30 दिनों में मुआवजा देने और पीड़ितों की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखने की कड़ी हिदायत भी दी है।

झारखंड हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस एमएस सोनाक और जस्टिस राजेश शंकर की बेंच ने सोमवार को स्वतः संज्ञान लेते हुए एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए उक्त निर्देश जारी किए। अदालत ने उन अधिकारियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक और विभागीय कार्रवाई का आदेश दिया जो इन अनिवार्य नियमों को लागू करने में विफल रहे।

दर्ज करनी होगी 'जीरो FIR'

मामले से जुड़े हाई कोर्ट के एक वकील ने मंगलवार को आदेश के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि पुलिस अधिकारियों को यौन अपराध की सूचना मिलते ही तुरंत 'जीरो FIR' दर्ज करनी होगी। भले ही वारदात किसी भी इलाके या भौगोलिक अधिकार क्षेत्र में क्यों ना हुई हो।

2 महीने के भीतर पूरी करनी होगी जांच

अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में देरी से मेडिकल सबूत खोने का खतरा होता है। इससे मुकदमा कमजोर हो सकता है। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म के मामलों की प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए। पुलिस को मामले की समग्र जांच 2 महीने के भीतर पूरी करनी चाहिए। इसके साथ ही ट्रायल कोर्ट को भी कानूनी समय सीमा का सख्ती से पालन करना चाहिए। इसमें चार्जशीट के 2 महीने के भीतर बिना किसी गैरजरूरी स्थगन के केस को पूरा करना जरूरी है।

टू-फिंगर टेस्ट पर रोक

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देने हुए कहा कि स्वास्थ्य संस्थानों में अवैज्ञानिक टू-फिंगर टेस्ट या ‘पर वैजिनम एग्जामिनेशन’ पर पूरी तरह से रोक रहेगी। इसके लिए अदालत ने राज्य सरकार को सभी सरकारी और निजी अस्पतालों के लिए सर्कुलर जारी करने का निर्देश दिया। इस निर्देश का पालन नहीं करने वाले डॉक्टरों को पेशेवर कदाचार के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

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बच्चों की मुफ्त शिक्षा पर भी आदेश

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह दुष्कर्म की वारदात से पैदा बच्चों के लिए 12वीं कक्षा तक निर्बाध मुफ्त शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए जिला स्तरीय नोडल अधिकारी नियुक्त करे। यही नहीं ऐसे मेधावी छात्रों के लिए राज्य सरकार की छात्रवृत्ति का भी प्रावधान हो जो IIT, NIT, AIIMS या IIM जैसे प्रमुख केंद्रीय संस्थानों में प्रवेश पाते हैं।

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बदहाल वन-स्टॉप सेंटरों पर भी आदेश

अदालत ने कई जिलों के वन-स्टॉप सेंटरों ‘खराब’ और ‘असंतोषजनक’ इंफ्रास्ट्रक्चर पर गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी खाली प्रशासनिक पदों को भरे, परिसर में CCTV नेटवर्क लगाए, अच्छी रसोई की व्यवस्था करे और पीने के साफ पानी की व्यवस्था करे। कोर्ट ने आदेश दिया कि NALSA फ्रेमवर्क के तहत कोर्ट की ओर से दिए अंतरिम मुआवजे का भुगतान आदेश के 30 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए। अदालत ने अधिकारियों को पीड़ितों की पहचान गोपनीय रखने के बारे में भी कड़े निर्देश दिए।

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