झारखंड की स्थानीय नीति में हस्तक्षेप से हाई कोर्ट का इनकार, क्या बताई वजह
झारखंड सरकार की स्थानीय नीति में कथित विसंगतियों को दूर करने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका में हस्तक्षेप करने से हाईकोर्ट ने इनकार कर दिया है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने बुधवार को याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह राज्य सरकार का नीतिगत निर्णय है।

झारखंड सरकार की स्थानीय नीति में कथित विसंगतियों को दूर करने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका में हस्तक्षेप करने से हाईकोर्ट ने इनकार कर दिया है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने बुधवार को याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह राज्य सरकार का नीतिगत निर्णय है और इस विषय में न्यायालय कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि नीति में किसी प्रकार का संशोधन या सुधार करना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।
प्रार्थी झारखंड विस्थापित संघर्ष मोर्चा के अधिवक्ता अभिषेक कुमार ने दलील दी कि राज्य सरकार जिन लोगों की जमीन विकास कार्यों के लिए अधिग्रहित करती है, उन्हें स्थानीय नीति में समुचित स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि विस्थापित लोग अपना घर-बार छोड़कर विकास कार्यों के लिए जमीन देते हैं, लेकिन बाद में उन्हें स्थानीयता का लाभ नहीं मिल पाता।
जमीन अधिग्रहण से नुकसान
जमीन अधिग्रहण के बदले मुआवजा तो दिया जाता है, लेकिन विस्थापित होने के कारण संबंधित व्यक्ति के पास उस क्षेत्र में जमीन नहीं बचती, जिससे उन्हें स्थायी निवास प्रमाण पत्र प्राप्त करने में कठिनाई होती है। परिणामस्वरूप वे स्थानीय नीति के लाभ से वंचित रह जाते हैं।
एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाने की जांच रिपोर्ट मांगी
झारखंड हाईकोर्ट ने बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाने के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार से विस्तृत जांच रिपोर्ट तलब की है। अदालत ने इस मामले को अत्यंत संवेदनशील बताते हुए स्वास्थ्य विभाग से अब तक की कार्रवाई और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट करने का निर्देश दिया है।
इस संबंध में दीपिका हेंब्रम और अन्य ने याचिका दायर कर प्राथमिकी दर्ज करने और विशेष जांच दल गठित करने का आग्रह अदालत से किया है। सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि इस मामले में छह फरवरी को प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है। हालांकि, राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अधिवक्ता जांच की वर्तमान स्थिति की जानकारी अदालत को नहीं दे सके। इस पर जस्टिस आर मुखोपाध्याय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल प्राथमिकी दर्ज होना पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि कई छोटे बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाया जाना अत्यंत गंभीर मामला है, जिससे उनका भविष्य खतरे में पड़ गया है। इसलिए, इस आपराधिक कृत्य के जिम्मेदार लोगों को न्याय के कटघरे में लाना आवश्यक है।
कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि राज्य सरकार द्वारा दाखिल जवाब केवल प्राथमिकी दर्ज होने तक सीमित है। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि मामले की जांच की प्रगति संबंधी विस्तृत जानकारी के साथ पूरक हलफनामा दाखिल करें। अगली सुनवाई 21 अप्रैल को होगी। चाईबासा में थैलेसीमिया पीड़ित कई बच्चों को ब्लड ट्रांसफ्यूजन के दौरान कथित रूप से एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ा दिया गया था। बाद में जांच में बच्चों के एचआईवी पॉजिटिव होने की पुष्टि हुई।




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