जब शिबू सोरेन ने नरसिम्हा राव की सरकार बचाई, फिर रिश्वत कांड में मिली जेल की सजा; ऐसे हुए बरी
सदन में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका था। मगर दिशोम गुरु 'शिबू सोरेन' के झारखंड मुक्ति मोर्चा के 4 सदस्यों ने सरकार के पक्ष में मतदान करके सरकार को गिरने से बचा लिया। लेकिन, ये मामला इधर ही नहीं थमा।

साल 1993। देश में कांग्रेस की सरकार थी। इसका नेतृत्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव कर रहे थे, लेकिन सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था। सदन में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका था। मगर दिशोम गुरु 'शिबू सोरेन' के झारखंड मुक्ति मोर्चा के 4 सदस्यों ने सरकार के पक्ष में मतदान करके सरकार को गिरने से बचा लिया। लेकिन, ये मामला इधर ही नहीं थमा।
समय का चक्का घूमा तो अदालती और कानूनी लड़ाई के बाद सामने आया कि अविश्वास प्रस्ताव के विरोध में वोट डालने के लिए JMM के सदस्यों ने रिश्वत ली थी। इसी मामले में इतिहास में पहली बार किसी प्रधानमंत्री (नरसिम्हा राव) को जेल की सजा सुनाई गई। वहीं शिबू सोरेन को भी जेल की सजा सुनाई गई। हालांकि दोनों नेता बाद में बरी हो गए। आज शिबू सोरेन की जन्मजयंती पर पढ़िए उनके जीवन से जुड़ा खास किस्सा।
राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव
उस समय देश आर्थिक संकट से गुजर रहा था। 1991 में आम चुनाव हुए, तो कांग्रेस की अल्पमत की सरकार बनी। इसकी कमान प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव के हाथ में सौंपी गई। मगर उन्हें अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा। साल 1993 में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया, तो लोकसभा में कुल 528 सांसद थे। नंबर गेम को समझें, तो उस समय सरकार के पक्ष में महज 251 सांसद थे यानी बहुमत के आंकड़े (265) से 14 कम। ऐसा लग रहा था कि सरकार गिर जाएगी। लेकिन जब वोटिंग हुई और उसका नतीजा सामने आया तो सरकार के खाते में कुल 265 वोट पड़े।
शिबू सोरेन सहित JMM के 4 सांसदों ने बचाई सरकार
नरसिम्हा राव की सरकार बच गई थी। इसके पीछे झारखंड मुक्ति मोर्चा के 4 सांसदों का योगदान भी था। इनके नाम थे- शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेंद्र महतो और साइमन मरांडी। इन लोगों ने अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया था। हालांकि उन दिनों JMM राव सरकार के साथ नहीं थी। यहीं से सवाल उठने शुरू हुए कि आखिर ऐसा क्यों हुआ कि चारों सांसदों ने राव सरकार का साथ दिया। अफवाहें फैलने लगीं कि सांसदं को पैसे खिलाए गए हैं, इसलिए उन लोगों ने अपना वोट दिया। हालांकि मामला रफा-दफा हो गया।
राव सरकार पर रिश्वतखोरी का आरोप, ऐसे खुला केस
साल 1996 में राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष रवींद्र कुमार ने सीबीआई को चिट्ठी लिखी। इसमें आरोप लगाया गया कि राव सरकार को समर्थन देने के एवज में पैसे (रिश्वत) का लेन-देन हुआ है। इसमें प्रधानमंत्री रहे नरसिंह राव का नाम भी शामिल था। उस समय सीबीआई ने इस मामले में कोई रुचि नहीं दिखाई, तो रवींद्र कुमार सीधे दिल्ली हाईकोर्ट में चले गए और पीआईएल दाखिल कर दी। आरोप लगाया कि सीबीआई अपने संवैधानिक दायित्वों को नहीं निभा रही है।
रिश्वतखोरी के आरोप में शिबू सोरेन सहित 4 सांसद गिरफ्तार
दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले को देखा और सीबीआई को इसे तत्काल प्रभाव से देखने के लिए कहा- तो सीबीआई हरकत में आई और मामला हाईप्रोफाइल होता चला गया। 25 मार्च 1996 को सीबीआई ने विशेष न्यायाधीश अजित भरिहोक की अदालत में JMM के चारों सांसदों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए। कहा गया- वोट करने के बदले चारों सांसदों के खातों में पैसे डाले गए थे। इसके बाद मामला बढ़ा, तो 5 सितंबर 1996 को दिल्ली में सीबीआई ने शिबू सोरेन, सूरज मंडल, शैलेंद्र महतो और साइमन मरांडी को गिरफ्तार कर लिया।
राव सरकार पर 3.5 करोड़ की रिश्वत का आरोप
इसी समय नरसिम्हा राव और छह अन्य के खिलाफ भी आरपो पत्र दाखिल किए गए। इससे कांग्रेस में खलबली मच गई, क्योंकि आरोप पत्र में राव का नाम भी शामिल था। हालांकि चारों सांसदों को तिहाड़ जेल से जमानत पर रिहा कर दिया गया। इसी कांड में नरसिम्हा राव सहित अन्य को भी अग्रिम जमानत दे दी गई। लेकिन जांच जारी रही। सरकार की मुश्किलें इसलिए बढ़ रही थीं, क्योंकि आरोप था- राव सरकार को बचाने के लिए JMM के सांसदों को साढ़े तीन करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है।

JMM के सांसद बने सरकारी गवाह
जांच आगे बढ़ रही थी। नए नए नाम सामने आ रहे थे। तभी 17 मार्च 1997 को आरोपी शैलेंद्र महतो ( JMM सांसद) सरकारी गवाह बन गए। उन्होंने माफी मांगी और कहा मुझसे गलती हुई। अदालत में स्वीकार किया कि उन्होंने 50 लाख की रिश्वत ली थी। इससे केस को और बल मिला और कांग्रेस समेत शिबू सोरेन और अन्य नेताओं की समस्याएं और बढ़ गईं।
पूर्व प्रधानमंत्री राव को सुनाई गई जेल की सजा
समय बीता। सुनवाई आगे बढ़ी। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और उनके सहयोगी बूटा सिंह को दोषी पाया गया। 12 अक्टूबर 2000 को राव और बूटा सिंह को झारखंड मुक्ति मोरचा रिश्वत कांड में 3-3 साल की सजा सुनाई गई। देश के इतिहास में यह पहली बार था जब किसी पूर्व प्रधानमंत्री को जेल की सजा सुनाई गई हो। हालांकि ये फैसला विशेष अदालत द्वारा दिया गया था। इसलिए अभी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का रास्ता खुला था।
नरसिम्हा राव और शिबू सोरेन समेत सभी हुए बरी
राव और बूटा सिंह ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की। 15 मार्च 2002 को न्यायमूर्ति आर. एस. सोढ़ी की अदालत ने विशेष अदालत के फैसले को पलटते हुए राव और बूटा सिंह को बरी कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा- संसद के अंदर की कार्यवाही पर अदालत में मामला नहीं चल सकता। आर्टिकल 105 के संसदीय विशेषाधिकार का हवाला दिया गया। बाद में शिबू सोरेन समेत अन्य तीन सांसदों को भी बरी कर दिया गया। सरकारी गवाह बन जाने के चलते शैलेंद्र महतो पहले ही जेल से बरी हो चुके थे।




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