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झारखंड गाथा: शिबू सोरेन को क्यों कहते हैं गुरुजी? जानिए नाम के पीछे की दिलचस्प कहानी

गुरु का मतलब मार्गदर्शक या नेता होता है। शिबू सोरेन को यह उपाधि उनके द्वारा किए गए योगदानों के चलते आदिवासी समाज के लोगों ने दी थी। झारखंड गाथा की इस कड़ी में जानिए नाम के पीछे की दिलचस्प कहानी।

Tue, 21 Oct 2025 04:07 PMRatan Gupta लाइव हिन्दुस्तान, रांची
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झारखंड गाथा: शिबू सोरेन को क्यों कहते हैं गुरुजी? जानिए नाम के पीछे की दिलचस्प कहानी

झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन करने वाले और राज्य के 3 बार मुख्यमंत्री रहे शिबू सोरेन को "दिशोम गुरु" या "गुरुजी" कहा जाता है। 'दिशोम' एक संथाली शब्द है, जिसका मतलब समाज या देश होता है। गुरु का मतलब मार्गदर्शक या नेता होता है। शिबू सोरेन को यह उपाधि उनके द्वारा किए गए योगदानों के चलते आदिवासी समाज के लोगों ने दी थी। "झारखंड गाथा" की इस कड़ी में जानिए नाम के पीछे की दिलचस्प कहानी।

शिबू सोरेन ने आदिवासी समाज के लिए अहम योगदान दिए। इनमें आदिवासियों से छीनी गई जमीन वापस दिलाना, उन्हें खेती करने के तौर-तरीके से वाकिफ कराना, शराब-नशा को छोड़ने के लिए प्रेरित करना, उन्हें शिक्षित करना, कुटीर उद्दोग और महिला शिल्प केंद्र की स्थापना करने जैसे तमाम काम शामिल थे।

लेकिन, इन सब में एक योगदान बेहद अहम था, जिसके लिए शिबू सोरेन ने खूब काम किया और समाज ने उन्हें गुरुजी की उपाधि दी। वो था, आदिवासी समाज की शिक्षा और जागरूकता के लिए किया गया काम। शिबू सोरेन ने इंदिरा गांधी के 20 सूत्री कार्यक्रम की तरह अपना 19 सूत्री कार्यक्रम शुरू किया। इन कार्यक्रमों में शिक्षा पर ज्यादा जोर रहा।

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अपने 19 सूत्री कार्यक्रम के जरिए शिबू सोरेन ने आदिवासी समाज के बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के लिए "अकिल अखाड़ा" की शुरुआत की। इन अखाड़ों में रात्रि पाठशालाएं लगाई जाती थीं और सबको शिक्षित किया जाता था। क्योंकि, शिबू सोरेन का मानना था कि आदिवासी समाज के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण अशिक्षा, शराब और अंधविश्वास है।

आदिवासी समाज में शिक्षा नहीं के बराबर थी। इलाका बेहद पिछड़ा था। हर तरफ गरीबी पसरी हुई थी। मगर फिर भी शिबू सोरेन ने तय किया कि वो हर किसी को शिक्षित करेंगे। इसके लिए उन्होंने "रात्रि पाठशालाओं" का इंतजाम किया। रात में ही इन पाठशालाओं का आयोजन इसलिए होता था, क्योंकि गरीबी के चलते बच्चे भी दिन में मजदूरी और किसानी करते थे। इसके अलावा बड़े- बूढ़े भी रात्रि में चलने वाली पाठशालाओं में हिस्सा लेते थे।

शिबू सोरेन ने प्लान बनाया, एक बच्चे को शिक्षित किया जाएगा। इसके बाद वह बच्चा पांच लोगों को शिक्षित करेगा। ऐसे ही शिक्षित होने वाला हर छात्र दूसरे पांच बच्चों या बड़ों को शिक्षित करेगा। इस तरह यह अभियान चेन की तरह चलेगा और पूरे समाज को शिक्षित किया जा सकेगा।

रात में पाठशालाएं चलती थीं, बिजली के अभाव में लालटेन का बंदोबस्त किया गया। पढ़ाई लिखाई पर जोर देना, अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र से दूर रहने, शराब-नशा छोड़ने की सीख के चलते ही शिबू सोरेन को लोगों ने गुरुजी कहना शुरू कर दिया था। आज भी उनके जाने के बाद लोग उन्हें आदरपूर्वक गुरुजी या दिशोम गुरु कहकर पुकारते हैं।