1965 की वो काली रात, जब खदान में दबकर मर गए 268 मजदूर; धोरी हादसे की खौफनाक कहानी
Dhanbad Coal Disaster: साल 1965। तब का बिहार और आज का झारखंड। आज के दिन धनबाद में 'धोरी खदान हादसा' हुआ। मजदूर आम दिनों की तरह अपना काम कर रहे थे, कुछ शिफ्ट खत्म करके लौट रहे थे। तभी अचानक तेज धमाका हुआ और 168 मजदूरों की मौत हो गई।

Dhanbad Coal Disaster: साल 1965। तब का बिहार और आज का झारखंड। आज ही के दिन धनबाद में 'धोरी खदान हादसा' हुआ था। मजदूर आम दिनों की तरह अपना काम कर रहे थे, कुछ शिफ्ट खत्म करके लौट रहे थे। तभी अचानक तेज धमाका हुआ और 168 मजदूरों की मौत हो गई। आज 28 मई का दिनभारत के औद्योगिक इतिहास में एक ऐसी त्रासदी के रूप में दर्ज है, जिसे देश के सबसे भयानक खदान हादसों में गिना जाता है। 1965 की उस काली रात को खदान में क्या हुआ था, जानिए लाइव हिन्दुस्तान के साथ।
रात करीब 1 बजे हुआ जोरदार धमाका
उस रात खदान में रोज की तरह कामकाज चल रहा था। रात के करीब एक बज रहे थे। एक शिफ्ट खत्म हो चुकी थी। मजदूर बाहर निकल रहे थे। जबकि दूसरी शिफ्ट के मजदूर अंदर जाने की तैयारी में थे। तभी अचानक जोरदार धमाका हुआ। विस्फोट इतना भीषण था कि जमीन तक कांप उठी। खदान के अंदर आग, धुआं और जहरीली गैस भर गई। कई सुरंगें ध्वस्त हो गईं और मजदूर अंदर ही फंस गए।
35 टीमें तैनात, हर हाथ निराशा, 268 की मौत
हादसे के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। खदान के बाहर मजदूरों के परिजन जमा हो गए। कोई अपने बेटे को खोज रहा था, कोई पति को और कोई भाई को। लेकिन अंदर का मंजर इतना खतरनाक था कि राहत और बचाव दलों को भी नीचे उतरने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। सरकार ने मजदूरों को बचाने के लिए 35 टीमों को तैनात किया, लेकिन सफलता हाथ नहीं लग रही थी। घटना के बाद में आधिकारिक तौर पर सामने आया कि इस हादसे में 268 लोगों की मौत हो गई थी।
खदान के भीतर धमाके की क्या वजह सामने आई
सरकारी रिपोर्टों में आशंका जताई गई कि हादसा जमीन के अंदर गैस जमा होने के कारण हुआ। उस समय खदानों में सुरक्षा के आधुनिक इंतजाम बेहद सीमित थे। आपको बताते चलें कि गैस की जांच अक्सर सिर्फ सेफ्टी लैम्प के भरोसे होती थी। वहीं वेंटिलेशन यानी हवा की आवाजाही के लिए भी कोई खास इंतजाम नहीं होता था। एक्सपर्ट ने यही बताया कि खदान के भीतर ज्वलनशील गैस जमा हो गई थी, इस कारण इतना खतरनाक विस्फोट हुआ।
मौजूदा कांग्रेस सरकार पर उठे सवाल, लापरवाही आई सामने
धोरी हादसे ने भारत की खदान सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए। मौजूदा कांग्रेस सरकार और प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को विपक्षी दलों की आलोचनाओं का जमकर सामना करना पड़ा। आयोग बना, जांच हुई, तो सामने आया कि कई खदानों में सुरक्षा मानकों का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा था। मजदूर बेहद जोखिम भरे माहौल में काम करने को मजबूर थे। हादसे के बाद केंद्र सरकार ने जांच आयोग गठित किया और खदान सुरक्षा नियमों को लेकर नई बहस शुरू हुई।
निशिकांत दुबे ने कांग्रेस और नेहरू पर लगाए गंभीर आरोप
वर्तमान समय में इस मुद्दे को झारखंड के गोड्डा से लोकसभा सांसद निशिकांत दुबे ने उठाया है। उन्होंने एक्स पर इससे जुड़ी पोस्ट करते हुए लिखा- "28 मई 1965 आज ही के दिन झारखंड के धनबाद में सबसे बड़ी कोयला खदान दुर्घटना हुई। इस हादसे में 268 लोगों की मौत हुई। भारत सरकार ने रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट के जज एस के दास जी के नेतृत्व में जॉंच कमिटि बनाई। रिपोर्ट चौंकाने वाली थी। खदानों में लगातार मौतें हो रही थीं। केवल 1958- 59 में हजारों लोगों की मौत हुई, हज़ारों घायल हुए।
इस धौरी कोयला खदान में 1960 से लेकर 1965 तक 25 लोगों की मौत हुई। खदान मजदूरों ने इसकी शिकायत तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु जी से 1960 तथा 1963 में की लेकिन पैसे लेकर, राजनीतिक दबाव से यह मैनेज होता रहा। इसके पहले आसनसोल में भी एक बड़ा हादसा 1958 में हुआ, जिसमें 160 जान गई। भ्रष्टाचारी कॉंग्रेस ने केवल लूटने का काम किया
जानिए खदान को लेकर क्या सिफारिशें की गईं थीं
अब हम एक बार फिर उसी खदान हादसे पर आते हैं। हादसे की जांच रिपोर्ट में खदानों के अंदर गैस मॉनिटरिंग, वेंटिलेशन और फायर सेफ्टी को लेकर कई सिफारिशें की गईं। रिपोर्टों में कहा गया कि हर खदान में आधुनिक गैस डिटेक्टर लगाए जाएं, नियमित जांच हो और आग या विस्फोट जैसी स्थिति से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाए। धोरी कोलियरी हादसा सिर्फ एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं था, बल्कि उन मजदूरों की दर्दनाक कहानी थी, जो रोजी-रोटी कमाने के लिए धरती के सैकड़ों फीट नीचे उतरते थे। उस हादसे ने सैकड़ों बच्चों को अनाथ और महिलाओं को विधवा बना दिया।




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