इतना खास क्यों ईरान का छोटू सा द्वीप खार्ग? अब तक US-इजरायल ने क्यों नहीं बोला हमला; सता रहा कैसा डर
चर्चा इस बात की भी हो रही है कि अगर अमेरिका ने खार्ग पर एक बार कब्जा कर लिया तो उसका अगला प्लान ईरान की न्यूक्लियर फैसिलिटीज को बंद करने और होर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण पाने की होगी, जो पूरे इलाके की आर्थिक रीढ़ है लेकिन एक डर भी है।

पश्चिम एशियाई देश ईरान पर अमेरिका और इजरायल के ताबड़तोड़ हमले जारी हैं। पिछले कुछ दिनों में ईरान के कई अहम ठिकानों पर इजरायली सेना ने विध्वंसक हमले किए हैं। इनमें परमाणु केंद्रों, तेल फैक्टरियां, सैन्य अड्डे और रिहायशी इलाके भी शामिल हैं लेकिन फारस की खाड़ी में स्थित ईरान का एक ऐसा छोटा सा द्वीप है, जो अब तक इजरायल और अमेरिका के हमलों से बचा हुआ है। दरअसल, अमेरिका और इजरायल ने एक खास रणनीति और प्लान के तहत ही इस छोटे से द्वीप पर हमले नहीं किए हैं।
ईरान का यह छोटा सा द्वीप खार्ग (Kharg Island) है, जो अपनी भौगोलिक स्थिति से कहीं अधिक अपने आर्थिक और रणनीतिक महत्व के कारण खास है। इसे अक्सर ईरान की 'इकोनॉमिक लाइफलाइन' (आर्थिक जीवन रेखा) कहा जाता है। खार्ग द्वीप ईरान के कुल कच्चे तेल के निर्यात का लगभग 90% हिस्सा संभालता है। यह ईरान के तेल निर्यात के लिए एक लाइफलाइन है, जो प्रतिदिन 70 लाख बैरल तेल लोड करने की क्षमता के साथ देश की अर्थव्यवस्था का 40% बजट सुनिश्चित करता है।
खार्ग द्वीप के खास होने के मुख्य कारण
यह फारस की खाड़ी के उत्तरी हिस्से में स्थित है और मुख्य भूमि से लगभग 25-30 किलो मीटर दूर एक कोरल द्वीप है। इसकी गहरी गोदी (deep-water docks) विशाल तेल टैंकरों (VLCCs) को खड़ा करने और लोड करने की सुविधा प्रदान करती हैं। इस द्वीप की बुनियादी संरचना प्रतिदिन लगभग 70 लाख बैरल तेल लोड करने की क्षमता रखती है। यहाँ लगभग 2.8 करोड़ बैरल तेल जमा करने की विशाल भंडारण क्षमता भी है।
ईरान की अर्थव्यवस्था का आधार
1960 के दशक में इसे अमेरिकी तेल कंपनी अमोको ने बनाया था। तब से ही यह द्वीप ईरान के प्रमुख तेल निर्यात टर्मिनल के रूप में काम कर रहा है। इसकी लोकेशन तेल सुपरटैंकरों के लिए सबसे आसान और सुलभ है, जिससे यह ईरान की तेल निर्यात क्षमता का मुख्य आधार बन गया है। यह द्वीप ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि इसके बिना ईरान की अर्थव्यवस्था पाषाण युग में जा सकती है। यह न केवल सरकारी खजाने में पैसा लाता है, बल्कि आईआरजीसी (IRGC) की सैलरी भी इसी के तेल राजस्व से आती है।

अमेरिका-इजरायल के लिए रेड लाइन
यह द्वीप ईरान-इजरायल/अमेरिका संघर्ष में एक बड़ी 'रेड लाइन' है। इस पर हमले का अर्थ वैश्विक तेल आपूर्ति में भारी व्यवधान पैदा करना हो सकता है और इससे तीसरे विश्व युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। एक्सियोस की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी अधिकारी खार्ग आइलैंड पर कब्जा करने का प्लान बना रहे हैं। अगर अमेरिकी अधिकारी इस प्लान पर आगे बढ़ते हैं तो ईरान युद्ध के अगले फेज़ में यह आइलैंड सीधे US मिलिट्री कंट्रोल मे आ सकता है।
पूरे मिडिल-ईस्ट में अपने हमले तेज हो सकते हैं
चर्चा इस बात की भी हो रही है कि अगर अमेरिका ने खार्ग पर एक बार कब्जा कर लिया तो उसका अगला प्लान ईरान की न्यूक्लियर फैसिलिटीज को बंद करने और होर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण पाने की होगी, जो पूरे इलाके की आर्थिक रीढ़ है। यानी एक तरह से अमेरिका खार्ग द्वीप के सहारे तेल के खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी बनना चाह रहा है लेकिन राह में कई रोड़े हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अगर अमेरिका ने रेड लाइन पार कर खार्ग पर कब्जा करने की कोशिश की तो ईरान और भड़क सकता है और वह पूरे मिडिल-ईस्ट में अपने हमले तेज कर सकता है। दूसरी तरफ तेल के खेल में अमेरिका किंग न बन पाए, उसे रोकने के लिए रूस और चीन भी जंग में कूद सकता है, जो विश्व युद्ध-तीन जैसे हालात पैदा कर सकते हैं।
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