ईरान के ‘शाहेद’ ने मचाई खलबली, अमेरिका-इजरायल परेशान; क्या भारत के पास भी है ऐसा ड्रोन?
Shahed Drone: अब युद्ध में एक कम लागत वाले ड्रोन बेहद असरदार साबित हो रहे हैं। इनकी कीमत बेहद कम होती है लेकिन इन्हें रोकने के लिए बेहद महंगे मिसाइलों और एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल करना पड़ता है।

ईरान पर हालिया हमला करते समय अमेरिका और इजरायल ने संभवतः युद्ध के इतने लंबे खिंच जाने की उम्मीद नहीं की होगी। अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद से ईरान इजरायल सहित आस-पास के खाड़ी देशों पर लगातार मिसाइलें बरसा रहा है। ईरान ने इन देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डों के साथ साथ प्रमुख तेल ठिकानों को भी निशाना बनाया है, जिससे पूरे पश्चिम एशिया में हाहाकार मचा हुआ है। इन हमलों में ईरान का साथ दे रहा है उसका सबसे सस्ता और भरोसेमंद साथी, शाहेद ड्रोन। ईरान ने इन ड्रोंस की मदद से अमेरिका और इजरायल की नाक में दम कर दिया है। ऐसे में इस सुसाइडल ड्रोन की चारों तरफ चर्चा हो रही है।
ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमले अमेरिका और उसके सहयोगी खाड़ी देशों-के सामने गंभीर सैन्य चुनौती बन गए हैं। विश्लेषकों का कहना है कि अगर हमले लंबे समय तक जारी रहे तो पश्चिमी देशों की वायु रक्षा प्रणालियों के भंडार तेजी से खत्म हो सकते हैं, जबकि ईरान के पास अब भी बड़ी संख्या में ड्रोन और मिसाइल मौजूद हैं। खबरों से संकेत मिलता है कि इजरायल और अमेरिका को उम्मीद थी कि ईरान खुद पर हमलों से जल्दी झुक जाएगा, तो यह आकलन गलत साबित होता दिख रहा है।
ड्रोन ने दी ईरान को ताकत
मौजूदा संघर्ष में कम लागत वाले ड्रोन ने तेहरान को बड़ी रणनीतिक बढ़त दी है। ईरान का शाहेद-136 ड्रोन इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है। अपनी खूबियों की वजह से ड्रोन युद्ध में बेहद असरदार साबित हो रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी कम लगात है। इनकी कीमत बेहद कम होती है लेकिन इन्हें रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाले मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम बेहद महंगे होते हैं। उदाहरण के लिए Shahed-136 ड्रोन की कीमत 20 हजार से 50 हजार डॉलर के बीच होती है, जबकि अमेरिका और इजरायल इन्हें रोकने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च करते हैं। एक पैट्रियट मिसाइल की कीमत करीब 40 लाख डॉलर होती है और कुछ इंटरसेप्टर की कीमत 1.2 करोड़ डॉलर तक हो सकती है। यही वजह है कि आधुनिक युद्ध में कम लागत वाले ड्रोन और इंटरसेप्टर बेहद अहम हो गए हैं।
वहींं इन ड्रोन की डिजाइन सरल है, इनकी रेंज करीब 2500 किलोमीटर तक बताई जाती है और इनमें 40 से 50 किलोग्राम का वारहेड लगाया जा सकता है। इसी वजह से इन्हें युद्ध में गेम चेंजर माना जाता है। इसकेआलावा झुंड में छोड़े जाने पर यह दुश्मन को कन्फ्यूज कर देते हैं और इन्हें इंटरसेप्ट करना और मुश्किल हो जाता है। अनुमान है कि ईरान के पास ऐसे लगभग 80,000 ड्रोन हो सकते हैं।
कई देश हुए प्रभावित
कई देश ‘शाहेद’ की डिजाइन से प्रेरित होकर अपने स्वदेशी ड्रोन बना रहे हैं। अमेरिका का LUCAS ड्रोन भी शाहेद के डिजाइन से मिलता-जुलता है। वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध में रूस ने भी Geran-2 नाम के एक ऐसे ही ड्रोन का इस्तेमाल किया और यूक्रेन के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। अब भारत भी अपनी मारक क्षमता बढ़ाने के लिए लंबी दूरी के स्वदेशी स्ट्राइक ड्रोन पर तेजी से काम कर रहा है।
भारत का शेषनाग जल्द होगा तैयार
इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में इस तरह के 2 कम लागत वाली, लंबी दूरी के स्ट्राइक ड्रोन प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। इनमें पहला शेषनाग-150 है, जिसे बेंगलुरु की स्टार्टअप कंपनी न्यू स्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी (NRT) विकसित कर रही है। Sheshnag-150 एक लंबी दूरी का स्वॉर्मिंग अटैक ड्रोन है। इसका वजन करीब 150 किलोग्राम है और इसकी रेंज 1000 से 1200 किलोमीटर तक बताई जाती है। यह 25 से 40 किलोग्राम तक का पेलोड ले जा सकता है और पांच घंटे से ज्यादा उड़ान भर सकता है। Sheshnag-150 की खासियत इसकी AI आधारित स्वॉर्म टेक्नोलॉजी है। इसमें कई ड्रोन एक साथ मिलकर स्वचालित तरीके से दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम से बचते हुए लक्ष्य पर हमला कर सकते हैं। Sheshnag-150 की पहली उड़ान फरवरी 2025 में हुई थी और पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के बाद इस प्रोजेक्ट को और तेजी से आगे बढ़ाया गया।
दूसरा प्रोजेक्ट KAL है, जिसे नोएडा की कंपनी IG Defence बना रही है। ये दोनों प्रोजेक्ट भारतीय सेना को कम लागत में सटीक हमले करने की क्षमता दे सकते हैं। इसे दुश्मन के इलाके में गहराई तक जाकर हमला करने के लिए डिजाइन किया जा रहा है। इसकी रेंज करीब 1000 किलोमीटर तक हो सकती है और यह तीन से पांच घंटे तक उड़ान भर सकता है। यह दुश्मन के इलाके में जाकर लक्ष्य खोज सकता है, अपना रास्ता बदल सकता है और फिर हाई एक्सप्लोसिव पेलोड के साथ हमला कर सकता है।
कई स्वदेशी ड्रोन सेना में शामिल
इससे पहले भी भारत की सेना में कई स्वदेशी ड्रोन शामिल किए जा चुके हैं। Medium Altitude Long Endurance (MALE) और High Altitude Long Endurance (HALE) जैसे बड़े ड्रोन अभी परीक्षण या विकास के चरण में हैं। इसके अलावा भारतीय प्राइवेट कंपनियों और DRDO ने कई छोटे टैक्टिकल, सर्विलांस, स्वॉर्म और कॉम्बैट ड्रोन विकसित किए हैं। इनका इस्तेमाल अभ्यास और वास्तविक ऑपरेशन दोनों में किया जा चुका है।
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