Who is Ayatollah Alireza Arafi Iran new interim Supreme Leader after Khamenei death कौन हैं अयातुल्लाह अलीरेजा अराफी? खामेनेई की मौत के बाद बने ईरान के नए आंतरिम सुप्रीम लीडर, International Hindi News - Hindustan
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कौन हैं अयातुल्लाह अलीरेजा अराफी? खामेनेई की मौत के बाद बने ईरान के नए आंतरिम सुप्रीम लीडर

इजरायल द्वारा किए गए हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मृत्यु हो गई है। खामेनेई के करीबी माने जाने वाले अयातुल्ला अलीरेजा अराफी को ईरान की इंटरिम लीडरशिप काउंसिल में फकीह सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया।

Sun, 1 March 2026 06:36 PMUpendra Thapak लाइव हिन्दुस्तान
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कौन हैं अयातुल्लाह अलीरेजा अराफी? खामेनेई की मौत के बाद बने ईरान के नए आंतरिम सुप्रीम लीडर

इजरायल और अमेरिका के हमलों में ईरान के सुप्रील लीडर खामेनेई की मौत हो गई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल अब ईरान के सबसे ताकतवर पद को लेकर खड़ा हो गया था। अब कुछ हद तक इसका जवाब मिल गया है। खामेनेई के करीबी माने जाने वाले अयातुल्ला अलीरेजा अराफी को ईरान की अंतरिम नेतृत्व परिषद (इंटरिम लीडरशिप काउंसिल) में फकीह (धार्मिक विधिवेत्ता) सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया। यह परिषद तब तक सर्वोच्च नेता की जिम्मेदारियां निभाएगी, जब तक कि एक्सपर्ट्स की असेंबली स्थायी उत्तराधिकारी का चुनाव नहीं कर लेती।

ईरान की एक्सपेडिएंशी डिसर्नमेंट काउंसिल के प्रवक्ता मोहसिन देहनवी ने एक्स पर किए एक पोस्ट में कहा कि अलीरेजा को फकीही के पद के लिए चुना गया है। अब अराफी ईरान के राष्ट्रपति पजशिकयान, मुख्य न्यायाधीश मोहसिन इजेई के साथ मिलकर मुख्य मुद्दों पर अंतिम फैसला लेंगे। यह अधिकार पहले केवल सुप्रीम लीडर के पास होता था। तकनीकी रूप से अराफी तीन सदस्यों में से एक हैं, लेकिन चूंकि ईरान में अब तक सर्वोच्च नेता केवल धर्मगुरु (क्लेरिक) ही रहे हैं, इसलिए एक वरिष्ठ धर्मगुरु होने के नाते वे प्रभावी रूप से सबसे वरिष्ठ माने जा रहे हैं।

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कौन हैं अयातुल्लाह अलीरेजा अराफी?

अयातुल्लाह अलीरेजा अराफी का जन्म ईरान के यज्द राज्य में 1959 में हआ था। 1969 में मात्र 11 साल की उम्र में इस्लामिक अध्ययन के लिए वह कोम चले गए। मिडल-ईस्ट इंस्टीट्यूट के मुताबिक 1979 की इस्लामी क्रांति के समय वे केवल 21 वर्ष के थे और पहली पीढ़ी के क्रांतिकारियों में उनकी कोई बड़ी भूमिका नहीं थी। 1980 के दशक में भी वे अन्य युवा मौलवियों की तरह ही रहे और विशेष रूप से अलग पहचान नहीं बना पाए।

लेकिन 1989 में खामेनेई के सुप्रीम लीडर बनने के बाद अराफी का नाम प्रमुखता के साथ ईरान के राष्ट्रीय पटल पर आने लगा। 1992 में, मात्र 33 वर्ष की आयु में, उन्हें अपने गृहनगर मेयबोद में जुमे की नमाज़ का इमाम नियुक्त किया गया, जो कि इतनी कम उम्र में एक महत्वपूर्ण पद था और खामेनेई के भरोसे का संकेत माना गया।

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सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक खामेनेई द्वारा अराफी को संवेदनशील और रणनीतिक पदों पर नियुक्त करना उनके प्रशासनिक कौशल पर “गहरे विश्वास” को दर्शाता है। हालांकि, वे लंबे समय तक सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े किसी बड़े राजनीतिक चेहरे के रूप में नहीं जाने जाते थे। परंपरागत इस्लामिक ढांचे से जुड़े होने के बाद भी अराफी को आधुनिक सोच वाला माना जाता है। वह अरबी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में निपुण हैं। इतना ही नहीं वह एआई के भी समर्थक रहे हैं।

2022 के महसा अमीनी हत्या की हत्या के बाद अराफी को अंतर्राष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ा था। एक सभा को संबोधित करते हुए अराफी ने कहा था कि “जो लोग उलेमाओं की पगड़ियों पर हमला करेंगे, उन्हें पता होना चाहिए कि वही पगड़ी उनका कफन बन जाएगी।” इन टिप्पणियों के बाद कनाडा ने उन पर प्रतिबंध लगाए, यह कहते हुए कि वे नागरिक अशांति पर कार्रवाई में शामिल थे।

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