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मिसाइलें खत्म, ड्रोन्स पर टिका ईरान युद्ध! चीन खेल रहा डबल गेम, रूस के हथियारों से पलटेगी बाजी?

ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद तेहरान के हथियार तेजी से खत्म हो रहे हैं। चीन ने सीधी सैन्य मदद से किनारा कर लिया है, जिसके बाद ईरान अब उन्नत हथियारों के लिए रूस की ओर देख रहा है। इस भू-राजनीतिक बदलाव की पूरी इनसाइड स्टोरी पढ़ें।

Tue, 3 March 2026 10:41 AMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, तेहरान
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मिसाइलें खत्म, ड्रोन्स पर टिका ईरान युद्ध! चीन खेल रहा डबल गेम, रूस के हथियारों से पलटेगी बाजी?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान पर किए गए हमले के बाद ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई की मौत हो गई है। इसके बाद से मिडिल-ईस्ट में भीषण जंग छिड़ गई है। इस युद्ध में ईरान अपने हथियारों के मिसाइल भंडार का तेजी से इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में आशंका है कि अगर ईरान के हथियार तेजी से खत्म हो गए तो उसकी मदद कौन करेगा? फिलहाल ऐसे कोई संकेत नहीं हैं कि चीन उसकी रक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए आगे आएगा।

हथियारों की आपूर्ति पर चीन का रुख

अफवाहें बनाम हकीकत: हाल के महीनों में ऐसी खबरें आई थीं कि चीन ईरान को वायु रक्षा प्रणाली और मिसाइल ईंधन की सामग्री भेज रहा है। हालांकि, चीन के विदेश मंत्रालय ने उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है जिनमें कहा गया था कि बीजिंग ईरान को सुपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइलें देने वाला है।

युद्ध के मैदान में कोई सबूत नहीं: थाई-कंबोडिया या भारत-पाकिस्तान के हालिया संघर्षों के विपरीत, इस युद्ध में अब तक चीनी हथियारों के इस्तेमाल का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला है।

केवल कूटनीतिक समर्थन: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपना समर्थन केवल अमेरिका की निंदा करने तक सीमित रखा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि चीन अपनी समुद्री कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 13% हिस्सा ईरान से आयात करता है।

'दोहरे उपयोग' वाली तकनीक का खेल

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन सीधे तौर पर ईरान को हथियार नहीं बेच रहा है, लेकिन वह एक अलग रणनीति अपना रहा है।

दोहरे उपयोग की तकनीक: 'एस. राजरत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज' के रिसर्च फेलो यांग जी के अनुसार, चीन ईरान का प्रमुख हथियार आपूर्तिकर्ता तो नहीं है, लेकिन वह उसे 'दोहरे उपयोग' वाली तकनीक जरूर मुहैया कराता है जिसका उपयोग नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।

चीन की सीमाएं: चीन पर अमेरिकी प्रतिबंधों का डर है और साथ ही वह सुन्नी खाड़ी देशों तथा इजराइल के साथ अपने संबंधों को भी खराब नहीं करना चाहता।

पेंटागन की चेतावनी: अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने पिछले साल अपनी रिपोर्ट में बताया था कि चीनी कंपनियां ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रमों के लिए पुर्जे बेच रही हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ और प्रतिबंध

हथियारों की बिक्री पर रोक: 'स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट' के अनुसार, चीन ने 2005 के बाद आधिकारिक तौर पर ईरान को हथियार बेचना बंद कर दिया था।

UN का प्रतिबंध: 2005 में जब अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने पाया कि ईरान परमाणु अप्रसार संधि का पालन नहीं कर रहा है, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (जिसमें चीन भी शामिल था) ने सर्वसम्मति से ईरान पर हथियार निर्यात और आयात का प्रतिबंध लगा दिया था।

ड्रोन युद्ध और प्रतिबंधों से बचने की कोशिश

ईरान इस युद्ध में मुख्य रूप से Shahed-136 अटैक ड्रोन (जो कि एक साधारण क्रूज मिसाइल की तरह काम करते हैं) का इस्तेमाल कर रहा है। इन ड्रोन्स ने अमेरिकी ठिकानों, तेल के बुनियादी ढांचे और नागरिक इमारतों को निशाना बनाया है। यह युद्ध अब इस बात पर निर्भर हो गया है कि किसके हथियार पहले खत्म होते हैं।

चीनी कंपनियों की भूमिका: पिछले आठ सालों में, हांगकांग और चीन की 100 से अधिक संस्थाओं को अमेरिकी ब्लैकलिस्ट में डाला गया है क्योंकि वे निर्यात प्रतिबंधों से बचने में ईरान की मदद कर रही थीं।

मार्च 2025 में, मोहम्मद रजा रजाबी (जिसे डॉ. एलेक्स जू भी कहा जाता है) पर आरोप लगा था कि उसने 'सिल्क रोड ट्रेडिंग कंपनी लिमिटेड' के जरिए ईरान के ड्रोन कार्यक्रम के लिए अमेरिकी पुर्जों की अवैध रूप से तस्करी की थी।

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चीन की हिचकिचाहट और रूस का मजबूत विकल्प

रूस और चीन की साझेदारी (नो-लिमिट्स पार्टनरशिप) के विपरीत, चीन के लिए ईरान उतना महत्वपूर्ण रक्षा या व्यापारिक भागीदार नहीं है। बीजिंग ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं से भी सतर्क रहता है। इसलिए, हथियारों की कमी होने पर ईरान के लिए रूस एक अधिक संभावित और मददगार साथी साबित हो सकता है।

रूस-ईरान सैन्य गठजोड़: यूक्रेन युद्ध के दौरान ईरान ने रूस को अपने Shahed-136 कामिकेज ड्रोन दिए थे, जिन्हें अब रूस में 'Geran-2' के नाम से बनाया जा रहा है।

गुप्त समझौते: 'फाइनेंशियल टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने रूस के साथ हजारों उन्नत कंधे से दागी जाने वाली मिसाइलें हासिल करने के लिए एक गुप्त समझौता किया है। 'कार्नेगी पॉलिटिका' की एक रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि ईरान को रूसी हथियारों की आपूर्ति न केवल जारी रहेगी, बल्कि मौका मिलने पर इसमें काफी वृद्धि भी हो सकती है।

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