अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के लिए कौन-कौन आ रहा पाकिस्तान? 'रेड जोन' में बदला इस्लामाबाद
इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक शांति वार्ता शुरू होने जा रही है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में हो रही इस बैठक से क्या मध्य-पूर्व का युद्ध रुकेगा? जानें लेबनान विवाद, होर्मुज संकट और इस अहम कूटनीतिक बैठक की पूरी डिटेल।
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद आज एक बेहद महत्वपूर्ण कूटनीतिक बैठक की मेजबानी करने जा रही है। पूरी दुनिया की नजरें इस बैठक पर टिकी हैं क्योंकि यह वार्ता अमेरिका और ईरान के बीच हो रही है, जो वर्तमान में एक विनाशकारी युद्ध का केंद्र बने हुए हैं। इस वार्ता को लेकर इस्लामाबाद में सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी कर दी गई है और पूरे शहर में एक तरह की बेचैनी और प्रत्याशा का माहौल है। ऐसे में सावल उठ रहा है कि आखिर इस तनावपूर्ण माहौल में कौन-कौन इस बैठक में हिस्सा लेगा? आइए समझते हैं।
ठीक छह सप्ताह पहले, अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले किए थे। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी, जिसके बाद कई देशों में युद्ध भड़क उठा। इस युद्ध के कारण अब तक हजारों लोग मारे जा चुके हैं। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को प्रभावी रूप से बंद कर दिया है, जहां से दुनिया का 20% तेल और गैस गुजरता है। इससे वैश्विक बाजारों में तेल/गैस की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई हैं।
फिर हुआ युद्धविराम
पाकिस्तान की मध्यस्थता के बाद हाल ही में अमेरिका और ईरान दो सप्ताह के युद्धविराम पर सहमत हुए हैं। हालांकि, लेबनान पर इजरायल की लगातार बमबारी और युद्धविराम की शर्तों को लेकर दोनों देशों की अलग-अलग व्याख्याओं के कारण यह समझौता पहले से ही खतरे में है।
इस्लामाबाद के सेरेना होटल में होगी वार्ता
बातचीत औपचारिक रूप से शनिवार सुबह शुरू होगी। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, यह वार्ता 15 दिनों तक चल सकती है। इस्लामाबाद के 'रेड जोन' में स्थित सेरेना होटल को इस वार्ता के लिए चुना गया है। बुधवार शाम से ही होटल को खाली करा लिया गया है। शहर में सुरक्षा व्यवस्था बेहद सख्त है। रेड जोन को सील कर दिया गया है और 9 और 10 अप्रैल को राजधानी में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है (केवल आपातकालीन सेवाएं चालू रहेंगी)।
प्रतिनिधिमंडल: कौन-कौन होगा शामिल?
यह एक अप्रत्यक्ष वार्ता होगी। अमेरिकी और ईरानी दल अलग-अलग कमरों में बैठेंगे और पाकिस्तानी अधिकारी उनके बीच संदेश लेकर जाएंगे।
अमेरिका: अमेरिकी दल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस करेंगे। उनके साथ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शीर्ष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर भी होंगे। सेंट्रल कमांड (CENTCOM) कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर भी पाकिस्तान आ सकते हैं।
क्या ईरान होगा शामिल? ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व संसद के स्पीकर मोहम्मद बघेर गालिबाफ (जो पूर्व IRGC कमांडर भी हैं) और विदेश मंत्री अब्बास अरागची करेंगे। हालांकि यहां एक पेंच है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के किसी प्रतिनिधि के आने की पुष्टि नहीं हुई है। इसके अलावा, लेबनाने के मुद्दे पर ईरान ने वातचीत से हटने का भी ऐलान किया है। ईरान को मनाने की कोशिश जारी है। ऐसा माना जा रहा है कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल गुरुवार रात या शुक्रवार को इस्लामाबाद पहुंच चुका है।
पाकिस्तान (मध्यस्थ): प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ औपचारिक रूप से मेजबानी करेंगे। उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार वास्तविक भी बातचीत में शामिल होंगे। सेना प्रमुख असीम मुनीर की भूमिका अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन यह पाकिस्तान है और सबको पता है कि वहां सेना की इजाजत के बिना कोई कुछ नहीं कर सकता।
मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की भूमिका क्यों?
पाकिस्तान की सीमा ईरान से लगती है (900 किमी) और ईरान के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया मुस्लिम आबादी पाकिस्तान में है। मध्य पूर्व के अन्य देशों के विपरीत, पाकिस्तान में कोई अमेरिकी सैन्य अड्डा नहीं है, जिससे ईरान की नजर में उसकी विश्वसनीयता बढ़ती है। वहीं, पाकिस्तान 2004 से अमेरिका का प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी भी है।
जेडी वेंस का दौरा ऐतिहासिक है
पिछले 15 वर्षों में किसी अमेरिकी उपराष्ट्रपति का यह पहला पाकिस्तान दौरा है। पिछली बार 2011 में जो बाइडेन गए थे। यह इसलिए भी अहम है क्योंकि वर्तमान में पाकिस्तान में कोई पूर्णकालिक अमेरिकी राजदूत नियुक्त नहीं है।
वार्ता में मुख्य बाधाएं और विवाद
दोनों पक्ष बहुत अलग-अलग मांगों के साथ वार्ता में आ रहे हैं।
ईरान की 10-सूत्रीय योजना: ईरान चाहता है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उसकी निगरानी हो, मध्य पूर्व से अमेरिकी लड़ाकू बल वापस जाएं और सैन्य अभियान रोके जाएं।
अमेरिका की मांग: वाइट हाउस का दावा है कि ईरान अपना समृद्ध यूरेनियम सौंपने को तैयार है और इसे अमेरिका अपनी 'गैर-परक्राम्य' मांग बता रहा है। हालांकि, ईरान ने आधिकारिक तौर पर इसे स्वीकार नहीं किया है।
लेबनान का मुद्दा (सबसे बड़ी बाधा)
इजरायल द्वारा लेबनान पर तीव्र बमबारी की जा रही है। ईरान का कहना है कि अगर इजरायली हमले जारी रहे तो वह युद्धविराम तोड़ देगा, क्योंकि उनके अनुसार लेबनान भी इस युद्धविराम का हिस्सा है। वहीं, अमेरिका का स्पष्ट कहना है कि युद्धविराम की शर्तें लेबनान पर लागू नहीं होती हैं।
विशेषज्ञों का क्या कहना है?
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे की भारी कमी है। दोनों देश खुद को विजेता दिखाने के लिए बड़ी-बड़ी मांगें कर रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, बातचीत में इजरायल का शामिल न होना एक बड़ी तकनीकी खामी है। चूंकि इजरायल इस युद्ध का एक मुख्य हिस्सा है, इसलिए उसकी सहमति के बिना कोई भी स्थायी शांति समझौता मुश्किल है।
क्या उम्मीद की जा सकती है? अल्पावधि में किसी पूर्ण और अंतिम समझौते की संभावना कम है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह बातचीत बिना टूटे चलती रही और अमेरिका इस दौरान इजरायल को लेबनान पर हमले करने से रोक पाया, तो यह अपने आप में एक बड़ी कूटनीतिक जीत होगी।
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