युद्ध के बीच अच्छी खबर! ट्रंप बोले- 2-3 सप्ताह में छोड़ दूंगा, ईरान के भी बदले तेवर
28 फरवरी से शुरू हुए इस संघर्ष ने पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया है। लगातार हो रहे हमलों और जवाबी कार्रवाइयों के कारण दोनों पक्षों के बीच तनाव चरम पर है, लेकिन अब कूटनीतिक प्रयास भी समानांतर रूप से तेज हो रहे हैं।

Iran War Updates: ईरान और अमेरिका के बीच जारी युद्ध के बीच अब कूटनीतिक समाधान की उम्मीदें तेज होती नजर आ रही हैं। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने संकेत दिया है कि उनका देश मौजूदा संघर्ष को समाप्त करने के लिए तैयार है, बशर्ते उसे भविष्य में हमलों से बचाव के ठोस आश्वासन मिलें। रिपोर्ट के अनुसार, पेजेशकियान ने यूरोपियन काउंसिल के अध्यक्ष अंटोनियो कोस्टा के साथ टेलीफोन पर बातचीत के दौरान यह बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्थिति को सामान्य करने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका तत्काल हमलों को रोकना है। ईरान ने इस संघर्ष को अमेरिका-इजरायल की आक्रामकता करार देते हुए कहा है कि बिना सुरक्षा गारंटी के शांति संभव नहीं होगी।
दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी संकेत दिया है कि अमेरिका जल्द ही ईरान में अपने सैन्य अभियान को समाप्त कर सकता है। वाइट हाउस में एक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी बल बहुत जल्द ईरान से बाहर निकल जाएंगे और उन्होंने इसके लिए दो से तीन सप्ताह की समय सीमा का संकेत दिया। उन्होंने यह भी कहा कि जैसे ही अमेरिका ईरान से बाहर निकलेगा वैश्विक ईंधन कीमतों में गिरावट आ सकती है।
बातचीत के जरिए समाधान की कोशिश
हालांकि, अमेरिका की ओर से सख्त रुख भी जारी है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने चेतावनी दी है कि आने वाले कुछ दिन इस युद्ध के लिए निर्णायक साबित होंगे। उन्होंने कहा कि यदि ईरान समझौता नहीं करता है तो संघर्ष और तेज हो सकता है।
हेगसेथ ने कहा कि अमेरिका लगातार बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसके पास सैन्य विकल्प भी मौजूद हैं। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका के पास विकल्प बढ़ रहे हैं, जबकि ईरान के विकल्प सीमित होते जा रहे हैं।
ईरानई
गौरतलब है कि 28 फरवरी से शुरू हुए इस संघर्ष ने पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया है। लगातार हो रहे हमलों और जवाबी कार्रवाइयों के कारण दोनों पक्षों के बीच तनाव चरम पर है, लेकिन अब कूटनीतिक प्रयास भी समानांतर रूप से तेज हो रहे हैं। ऐसे में यदि दोनों पक्ष बातचीत के जरिए किसी समझौते पर पहुंचते हैं तो न केवल क्षेत्र में शांति बहाल हो सकती है बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा दबाव भी कम हो सकता है। हालांकि, सुरक्षा गारंटी, विश्वास की कमी और राजनीतिक शर्तें इस प्रक्रिया को जटिल बना रही हैं।
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