डील से डिप्लोमेसी तक; ट्रंप का नूर-ए-नजर बनने को पाकिस्तान ने ऐसे चली चाल
Explainer: अमेरिका और ईरान में मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान अचानक नहीं उभरा है। बल्कि इसके लिए वह काफी अरसे से तैयारी कर रहा था। ट्रंप का नूर-ए-नजर बनने के लिए पाकिस्तान ने कई महीन चालें चली हैं।

Explainer: अमेरिका और ईरान में मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान अचानक नहीं उभरा है। बल्कि इसके लिए वह काफी अरसे से तैयारी कर रहा था। ट्रंप का नूर-ए-नजर बनने के लिए पाकिस्तान ने कई महीन चालें चली हैं। इसके लिए उसने डील से डिप्लोमेसी तक का चालाकी भरा रास्ता तय गया है। इसके तहत पाकिस्तान ने कई परत वाली रणनीति बनाई, इसमें बिजनेस डील्स को मिक्स किया। इसके बाद रणनीतिक भागीदारियों के जरिए डोनाल्ड ट्रंप के इनर सर्किल में पैठ बनाई। आइए एक नजर डालते हैं, पाकिस्तान के इस पूरे खेल पर...
रियल एस्टेट से बना रास्ता
पाकिस्तान के अमेरिकी सर्किल में पैठ बनाने की कहानी, न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी है। इसके मुताबिक पाकिस्तान ने रियल एस्टेट के जरिए ट्रंप प्रशासन के करीब आने का रास्ता बनाया। मामला कुछ यूं हुआ कि वॉशिंगटन में बोर्ड ऑफ पीस बैठक के दौरान ट्रंप के खास स्टीव विटकॉफ ने एक पार्टनरशिप के बारे में बात की। इसके तहत न्यूयॉर्क में पाकिस्तान के मालिकाना हक वाले रूजवेल्ट होटल की मरम्मत होनी थी। यह महज एक कॉमर्शियल एग्रीमेंट नहीं था। बल्कि, इसके जरिए पाकिस्तान को ट्रंप प्रशासन का भरोसा जीतने का मौका मिल गया। इस डील से पाकिस्तान अमेरिका का आर्थिक सहयोगी बना। साथ ही ट्रंप के खास सहयोगियों से उसकी करीबी बनी। इसके अलावा वॉशिंगटन में पाकिस्तान की पूछ-परख शुरू हो गई।
ट्रंप के अंदरूनी सर्किल की चाटुकारिता
पाकिस्तान सिर्फ यहीं नहीं रुका। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद उसने ट्रंप के अंदरूनी सर्किल की चाटुकारिता शुरू कर दी। इसके तहत उसने ट्रंप के नेटवर्क से जुड़े लॉबिस्ट्स को हायर करना शुरू किया। ट्रंप के सहयोगियों के व्यापारिक कंपनियों में एंगेजमेंट बढ़ाया। कुशनर और विटकॉफ जैसे ट्रंप के करीबी लोगों के साथ नजदीकी बढ़ाई। ट्रंप को नोबल शांति पुरस्कारों के लिए नॉमिनेट करना भी इसी चाल का हिस्सा था। इसकी बदौलत पाकिस्तान, ट्रंप प्रशासन के उन लोगों तक पहुंचने में कामयाब रहा, जो फैसले लेते हैं और अमेरिकी विदेश नीति की दिशा और दशा तय करते हैं।
अमेरिका की प्राथमिकताओं को तवज्जो
इसके साथ ही पाकिस्तान ने इस बात पर भी ध्यान दिया अमेरिका की प्राथमिकताएं क्या हैं। उसने खुद को आतंकवाद का विरोधी बताया। इसके लिए उसने एक सीनियर इस्लामिक व्यक्ति को गिरफ्तार किया। एक अहम माइनिंग प्रोजेक्ट में उसने अमेरिका का निवेश हासिल किया। साथ ही अमेरिका के जियो-पॉलिटिकल लक्ष्यों में उसके सहयोगी के तौर पर पेश किया। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, वैसे तो पाकिस्तान हमेशा अमेरिका का करीबी रहने की कोशिश में रहा। लेकिन ट्रंप के कार्यकाल में इसने अहम मोड़ लिया।
मौके की नजाकत
सिर्फ एक साल पहले की बात है, पाकिस्तान वॉशिंगटन में पूरी तरह से दरकिनार हो चुका था। अमेरिका अफगानिस्तान से निकल चुका था और ऐसे में पाकिस्तान उसके लिए रणनीतिक रूप से अहम नहीं रह गया था। लेकिन ट्रंप की वापसी के बाद इस दिशा में नए रास्ते खुले। नई विदेश नीति में संबंधों और डील्स को महत्व मिला। वहीं, साथियों को फिर से एकजुट करने की ट्रंप की रणनीति ने भी पाकिस्तान के लिए रास्ता तैयार किया। पाकिस्तान ने दोनों हाथों से इस मौके को लपका।
बिल्ली के भाग से छींका टूटा
पाकिस्तान की अमेरिका से बढ़ती नजदीकियों के बीच कुछ ऐसा हुआ, जिस पर ‘बिल्ली के भाग से छींका टूटा’ वाली कहावत पूरी तरह से लागू होती है। ईरान के खिलाफ अमेरिका ने युद्ध छेड़ा और पाकिस्तान की अहमियत एक बार फिर से बढ़ गई। पाकिस्तान, ईरान के साथ 565 मील की सीमा से जुड़ा हुआ है। तेहरान में भी उसकी अच्छी बातचीत है। इन सबका फायदा, पाकिस्तान को मिला और वह अमेरिका के लिए अहम हो गया।
अब पाकिस्तान, ईरान में ट्रंप का मैसेज भेज रहा है। शांति वार्ता का प्रस्ताव दे रहा है। बदले में उसके भी कई स्वार्थ पूरे हो रहे हैं। मसलन, पाकिस्तान खुद को आर्थिक तौर मजबूत बना रहा है। रणनीतिक तौर पर खुद को उभार रहा है। इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में भी जुटा हुआ है।
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