तकनीक बनी बड़ी मददगार, लगातार सटीक प्रहार; अमेरिका को कैसे पछाड़ रहा है ईरान
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध 11वें दिन में पहुंच गया है। जहां अमेरिका और इजरायल लगातार हमले कर रहे हैं। वहीं, ईरान भी लगातार पलटवार कर रहा है। इन सबके बीच कहीं से भी इस बात के संकेत नहीं हैं कि ईरान के पास हथियारों की कोई कमी है।

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध 11वें दिन में पहुंच गया है। जहां अमेरिका और इजरायल लगातार हमले कर रहे हैं। वहीं, ईरान भी लगातार पलटवार कर रहा है। इन सबके बीच कहीं से भी इस बात के संकेत नहीं हैं कि ईरान के पास हथियारों की कोई कमी है। आईआरजीसी लगातार मध्य-पूर्व, इजरायल और खाड़ी देशों में अमेरिकन बेस को बिल्कुल सटीक ढंग से निशाना बना रहा है।
अमेरिका को खूब पहुंचाया है नुकसान
कम लागत वाले ड्रोन (करीब 35,000 डॉलर की कीमत) का उपयोग करके, ईरान ने यह सुनिश्चित किया है कि अमेरिका और उसके खाड़ी देश खूब नुकसान उठाएं। इसके अलावा जिस तरह से ईरान पलटवार कर रहा है और पूरे मध्य पूर्व में अमेरिकी बेस पर हमले कर रहा है, दिखाता है कि वह युद्ध के लिए तैयार था। इसके लिए उसने शाहिद 136 ड्रोन के अलावा परंपरागत बैलिस्टिक मिसाइलों का विशाल भंडार तैयार कर रख था। अभी तक के युद्ध में अमेरिका और उसके सहयोगियों को नुकसान तो हो ही रहा है, साथ ही दुनिया के सामने भी ऊर्जा का संकट खड़ा हो गया है। खासतौर पर होर्मुज स्टेट बंद होने से तेल के जहाजों का गुजरना बंद हो चुका है।
अत्याधुनिक तकनीक की बड़ी भूमिका
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के बीच लड़ाई ने युद्ध की अवधारणा को करीब-करीब बदल दिया है। इससे पहले ऑपरेशन सिंदूर भी इसी तर्ज पर लड़ा गया था। इन युद्धों ने आधुनिक तकनीकी हथियारों के साथ लड़ा जाने वाला युद्ध बना दिया है। इसमें लक्ष्य को पहले से ही पहचानकर हमला किया जा रहा है। लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों और एंटी मिसाइल के दम पर चलने वाला यह युद्ध तकनीक के बदलते दौर की कहानी बताने वाला है। एक तरफ यह युद्ध अमेरिका और इजरायल की एडवांस टेक्निक दिखाता है। वहीं, यह एक संकेत भी है कि अन्य महत्वाकांक्षी देश खराब से खराब हालात में भी अन्य देशों पर भरोसा नहीं कर सकते।

भारत के लिए कैसे सबक
यह युद्ध भारतीय रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों और सशस्त्र बलों के लिए भी एक सबक है। ईरान जैसा प्रतिबंधित देश भी चीनी/रूसी मिसाइलों और ड्रोन की रिवर्स इंजीनियरिंग के माध्यम से लंबी दूरी के स्टैंड-ऑफ हथियार विकसित करने में सक्षम रहा है। क्या डीआरडीओ के पास कोई ड्रोन है जो ईरान के कम लागत वाले शहीद 136 कामिकेज़ ड्रोन से मेल खाता हो? ईरान की पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों का भी यही हाल है।
ईरानियों ने न केवल मिसाइल मोटर, मिसाइल ईंधन का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने में कामयाबी हासिल की है, बल्कि सटीक निशाने के लिए जीपीएस के साथ अपने डिलिवरी सिस्टम को लैस करने में भी सक्षम हैं। 11 दिनों तक अमेरिका-इजरायल हमलों को रोकने के बाद भी ईरानी शासन पूरे नियंत्रण में है। वह अभी भी युद्ध की योजना को ध्यान में रखते हुए मिसाइलें दाग रहा है।
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