ओबामा से हर मामले में होड़ करने वाले ट्रंप, ईरान के मुद्दे पर कर बैठे बड़ी चूक? पूरी कहानी
ईरान युद्ध एक बार फिर से जोर पकड़ने की कगार पर है। डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज को दूसरी तरफ से बंद करने का फैसला लिया है। उनके इस फैसले पर ईरान ने अमेरिकी जहाजों को निशाना बनाने की धमकी दी है। पाकिस्तान में हुई शांति वार्ता पहले ही असफल हो चुकी है।

Donald Trump: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों ईरान की जंग में उलझे हुए हैं। 28 फरवरी को ईरान पर हमला करने से पहले ट्रंप और उनकी टीम ने ईरान की सत्ता परिवर्तन को अपना मुख्य उद्देश्य बताया था। लेकिन पांच हफ्तों की जंग में वह ऐसा कर पाने में नाकाम रहे। इन सब के बीच ईरान ने होर्मुज पर प्रतिबंध लगाकर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को परेशानी में डाल दिया, अमेरिका धमकी देता ही रह गया। बाद में, ट्रंप के दो हफ्ते के सीजफायर के दौरान पाकिस्तान शांति वार्ता कराने के लिए आगे आया। लेकिन वार्ता सफल नहीं हो पाई। अब शांति वार्ता के फेल होने के बाद ट्रंप एक बार फिर से होर्मुज को खोलने के लिए ईरान पर दबाव बना रहे हैं। लेकिन ईरान इस पर राजी नहीं है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर क्या ईरान को रोकने का कोई दूसरा रास्ता नहीं था? क्या ईरान पर अमेरिका का हमला करना जरूरी था? इस बात का जवाब ट्रंप के पूर्ववर्ती बराक ओबामा ने अपने कार्यकाल के दौरान दिया था। ओबामा ने ईरान के साथ दशकों पुराने अपने संघर्ष को हल्का करते हुए परमाणु संधि की थी। इस संधि के तहत ईरान ने अपने परमाणु प्रसार को कम कर दिया था। लेकिन इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू उस वक्त ओबामा के इस फैसले से इतने नाराज हुए थे कि उन्होंने अमेरिका की धरती पर आकर ही ओबामा के खिलाफ अपनी बात रखी थी। लेकिन ओबामा ने अपना फैसला नहीं बदला।
ओबामा के साथ ट्रंप की होड़
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ओबामा को लेकर 'घनिष्ठ प्रेम' कुछ नया नहीं है। इन दोनों ही राजनेताओं के बीच में एक कॉल्ड वॉर जैसे हालात बने रहते हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को पिछले दशकों का सबसे सफल अमेरिकी राष्ट्रपति माना जाता है। वह दो बार अमेरिका के राष्ट्रपति रहे, शांति का नोबेल पुरस्कार जीता और ओसामा बिन लादेन को मारने में भी शामिल रहे। इतना ही नहीं ईरान के साथ एक सफल समझौता करके वह पश्चिम एशिया में शांति बढ़ाने का प्रयास करने में भी सफल रहे।
ओबामा की इन सफलताओं को लेकर ट्रंप कई बार हमला करते नजर आते हैं। कई विशेषज्ञों के मुताबिक राष्ट्रपति ट्रंप ओबामा से भी ज्यादा सफल राष्ट्रपति के रूप में खुद को देखना चाहते हैं। वह भी दो बार राष्ट्रपति बन चुके हैं। आईएसआईएस चीफ को मार चुके हैं। इसके अलावा वह लगातार नोबेल की भी मांग कर रहे थे। ओबामा को नोबेल दिए जाने से ट्रंप इतने नाराज थे कि उन्होंने नोबेल समिति पर ही सवाल उठा दिए थे। इसके अलावा ओबामा की ईरान नीति का भी ट्रंप ने खुलकर विरोध किया था और राष्ट्रपति बनने के बाद उसे रद्द ही कर दिया।
ओबामा की ईरान वाली डील पर ट्रंप का हमला
ईरान के मुद्दे पर ट्रंप जब भी बात करते हैं, वह ओबामा द्वारा की गई डील की आलोचना करते हैं। उनका तर्क है कि ओबामा ने न सिर्फ ईरान को परमाणु बम बनाने की खुली छूट दे दी थी, बल्कि ईरान के कुछ एसेट्स को भी डिफ्रीज कर दिया था। इसलिए उन्होंने इसे रद्द कर दिया। हालांकि विशेषज्ञों की इस मुद्दे पर राय अलग है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका और अन्य देशों के साथ ईरान द्वारा साइन की गई डील के बाद तेहरान ने अपने परमाणु बम प्रोग्राम को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। वह प्रतिबंधों के साथ ही अपने काम कर रहा था। क्योंकि इससे उसकी अर्थव्यवस्था बेहतर हो रही थी। लेकिन, वह मध्य-पूर्व में मौजूद अपने प्राक्सी गुटों को मदद देना भी जारी रखे हुए था। इसी वजह से इजरायल इससे परेशान था। नेतन्याहू बार-बार अमेरिका जाकर तमाम वहां के नेताओं से ईरान के ऊपर हमला करने का अनुरोध करते थे।
ट्रंप ने 2018 में डील रद्द की, ईरान ने बढ़ाया प्रोग्राम
रिपोर्ट्स के मुताबिक 2018 में जब ट्रंप ने ईरान के साथ अपनी डील को रद्द कर दिया। हालांकि, ट्रंप प्रशासन और उनके बाद बाइडेन प्रशासन ने भी ईरान के साथ वार्ता को आगे बढ़ाने की कोशिश की लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो सके। अमेरिका की तरफ से डील कैंसिल होने के बाद ईरान ने भी अपने परमाणु प्रोग्राम को आगे बढ़ाने का फैसला लिया। इसके बाद दोनों देशों के बीच में तनाव फिर से बढ़ने लगा।
ट्रंप ने लिया युद्ध का सहारा
दूसरी बार सत्ता में आए राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ बातचीत के बीच में ही तेहरान पर हमला कर दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक इजरायली एजेंसी मोसाद ने ट्रंप और नेतन्याहू को भरोसा दिलाया था कि अगर सुप्रीम लीडर खामेनेई समेत मुख्य लीडरशिप को खत्म कर दिया जाएगा, तो इजरायली जनता सड़कों पर आकर विद्रोह करके सत्ता को पलट देगी, लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ।
युद्ध के सहारे ईरान मुद्दे को हल खोजने निकले डोनाल्ड ट्रंप 5 हफ्तों के अंदर ही एक बार फिर से बातचीत की टेबल तलाशने लगे। पश्चिम एशिया के देश इस मामले में खुद एक पार्टी थे, इसलिए ट्रंप ने पाकिस्तान को अपना मुहरा बनाया। ऐसे आरोप भी लगे कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने सीजफायर को लेकर जो पोस्ट किया वह वाइट हाउस से ही जारी किया गया था। तमाम विवादों के बीच इस्लामाबाद में शांति वार्ता हुई लेकिन वह सफल नहीं हुई और एक बार फिर ट्रंप युद्ध के विकल्प पर आकर रुके हुए हैं।
अब युद्ध में मजबूत है ईरान
अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ओबामा द्वारा किए गए समझौते के बाद ईरान परमाणु कार्यक्रम को ठंडे बस्ते में डाल चुका था, लेकिन ट्रंप द्वारा इससे अलग होने के बाद उन्होंने फिर से इसे शुरू कर दिया। ट्रंप ने इसे नष्ट करने की बहुत कोशिश की लेकिन अब भी यह यूरेनियम ईरान में ही है और कहां है यह ईरानी लीडरशिप के अलावा किसी को नहीं पता।
अमेरिका और इजरायल के साथ पांच हफ्तों का युद्ध लड़ चुके ईरान को इस युद्ध के बाद एक बड़े डर से मुक्ति मिली है। पिछले पांच दशकों से अमेरिका लगातार उसे हमले की धमकी देकर डरा रहा था। लेकिन इस युद्ध ने उसे मजबूत करके सामने लाया है। होर्मुज उसके कंट्रोल में हैं और उसने पूरे समय अपनी सत्ता को बचाए रखा।
अब ओबामा वाली डील से बेहतर डील चाहेगा ईरान
पूर्व सीआईए के निदेशक जनरल डेविड पेट्रायस के मुताबिक, ईरान जिन मुद्दों और शर्तों को लेकर ओबामा के साथ डील करने को राजी हुआ था। अब वह उन शर्तों पर राजी होने के लिए तैयार नहीं होगा। क्योंकि इस युद्ध में वह एक अपर हैंड के साथ आगे बड़ा है। वह होर्मुज पर अपना कब्जा नहीं छोड़ेगा और इसे पूरी तरह से सुरक्षित करना अमेरिका के लिए एक महंगा और खूनी अभियान साबित होगा।
इसके अलावा, अगर ट्रंप ईरान को होर्मुज पर टैक्स लगाने की अनुमति देते हैं, तो दशकों से जो आर्थिक प्रतिबंध उसके ऊपर लगाए हुए थे। वह किसी काम के नहीं रहेंगे। क्योंकि 20 लाख डॉलर प्रति जहाज की दर से तेहरान के पास अपनी सेना और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए पर्याप्त पैसा होगा।
लेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




साइन इन