शिमला रोपवे प्रोजेक्ट: 13 स्टेशनों के साथ बनेगा एशिया का सबसे बड़ा नेटवर्क, मगर बजट ने बढ़ाई सरकार की टेंशन
यह परियोजना शिमला शहर के प्रमुख इलाकों को आपस में जोड़ने के उद्देश्य से तैयार की गई है। प्रस्तावित स्टेशनों में तारा देवी, टूटीकंडी, आईएसबीटी, विक्ट्री टनल, रेलवे स्टेशन, सचिवालय, संजौली और आईजीएमसी जैसे महत्वपूर्ण स्थान शामिल हैं।

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में प्रस्तावित रोपवे और रैपिड ट्रांसपोर्ट सिस्टम परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। शहर में बढ़ते ट्रैफिक दबाव को कम करने के लिए बनाई गई यह योजना अब 13.65 किलोमीटर लंबे नेटवर्क के रूप में आकार लेगी, जिसमें 13 स्टेशन शामिल होंगे।
यह परियोजना पहले करीब 1,556 करोड़ रुपये की थी, लेकिन अब इसकी लागत बढ़कर लगभग 2,980 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। लागत में इस तेज बढ़ोतरी के कारण राज्य सरकार का हिस्सा भी बढ़ गया है। पहले सरकार को 388 करोड़ रुपये देने थे, जो अब बढ़कर करीब 540 करोड़ रुपये हो गए हैं। यही रकम जुटाना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे में अब इसके क्रियान्वयन को लेकर नई चुनौतियां सामने आ गई हैं।
प्रमुख इलाकों को आपस में जोड़ेगा
यह परियोजना शिमला शहर के प्रमुख इलाकों को आपस में जोड़ने के उद्देश्य से तैयार की गई है। प्रस्तावित स्टेशनों में तारा देवी, टूटीकंडी, आईएसबीटी, विक्ट्री टनल, रेलवे स्टेशन, सचिवालय, संजौली और आईजीएमसी जैसे महत्वपूर्ण स्थान शामिल हैं। इसका लक्ष्य शहर में रोजाना होने वाले ट्रैफिक जाम को कम करना और लोगों को तेज, सुगम और वैकल्पिक परिवहन व्यवस्था उपलब्ध कराना है।
हर केबिन में 10 यात्री बैठ सकेंगे
इसे दुनिया के सबसे बड़े शहरी रोपवे सिस्टम में से एक माना जा रहा है। एशिया में यह सबसे बड़ा रोपवे होगा। इसमें 660 केबिन होंगे और हर केबिन में 10 यात्री बैठ सकेंगे। हर दिशा में प्रति घंटे करीब 3,000 यात्रियों को ले जाने की क्षमता होगी। हर 2 से 3 मिनट में एक केबिन उपलब्ध होगा।
परियोजना को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत विकसित किया जा रहा है। इसके तहत 80 प्रतिशत फंडिंग बाहरी स्रोतों से और 20 प्रतिशत राज्य सरकार द्वारा दी जानी है। राज्य सरकार का हिस्सा अब बढ़कर लगभग 540 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। अधिकारियों के अनुसार, लागत में लगातार वृद्धि के कारण वित्तीय प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बन गया है।
लागत बढ़ोतरी और वित्तीय अनिश्चितता
करीब एक दशक से लंबित इस परियोजना को अक्टूबर 2025 में तब गति मिली जब लगभग छह हेक्टेयर भूमि के उपयोग के लिए वन स्वीकृति मिल गई। इसके बाद उम्मीद की जा रही थी कि परियोजना जल्द शुरू हो जाएगी, लेकिन लागत बढ़ोतरी और वित्तीय अनिश्चितता ने प्रक्रिया को धीमा कर दिया।
दरअसल, सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने हिस्से की राशि जुटाने की है। परिवहन विभाग इस प्रस्ताव को कैबिनेट में ले जाने से पहले वित्त विभाग की अनुमति लेने की प्रक्रिया में है। अधिकारियों का कहना है कि परियोजना तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर काफी आगे बढ़ चुकी है, लेकिन वित्तीय मंजूरी अब भी लंबित है।
आर्थिक स्थिति इस समय पूरी तरह मजबूत नहीं
राज्य सरकार का कहना है कि हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति इस समय पूरी तरह मजबूत नहीं है। सरकार का दावा है कि केंद्र सरकार द्वारा राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद किए जाने के बाद राज्य की वित्तीय स्थिति पर प्रतिकूल असर पड़ा है। इसके चलते कई विकास परियोजनाओं और खर्चों पर दबाव बढ़ गया है।
वेतन का कुछ हिस्सा आगामी छह महीनों के लिए स्थगित
इसी वित्तीय दबाव के बीच राज्य सरकार ने एक सख्त कदम उठाते हुए मंत्रियों, विधायकों और उच्च अधिकारियों के वेतन का कुछ हिस्सा आगामी छह महीनों के लिए स्थगित कर दिया है। सरकार के मुताबिक यह निर्णय राज्य की आर्थिक स्थिति को संतुलित करने और आवश्यक विकास कार्यों को प्राथमिकता देने के लिए लिया गया है।
बाहरी फंडिंग जुटाने की कोशिश
ऐसे में मौजूदा वित्तीय स्थिति और बढ़ती लागत के कारण शिमला रोपवे प्रोजेक्ट के समय पर पूरा होने को लेकर सवाल बने हुए हैं। फिलहाल सरकार न्यू डेवलपमेंट बैंक से बाहरी फंडिंग जुटाने की कोशिश कर रही है। लेकिन राज्य के आर्थिक हालात और बढ़ते वित्तीय दायित्वों के बीच परियोजना का भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि वित्तीय व्यवस्था कितनी जल्दी और प्रभावी तरीके से सुनिश्चित की जाती है।
रिपोर्ट : यूके शर्मा
लेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




साइन इन