क्या AI की वजह से बर्बाद हो रहा है हजारों गैलन पानी? सैम आल्टमैन ने दिया जवाब
OpenAI के CEO सैम आल्टमैन ने इस दावे को खारिज कर दिया कि ChatGPT हर सवाल पर 17 गैलन पानी खर्च करता है, और इसे पूरी तरह गलत बताया। हालांकि उन्होंने माना कि रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ना जरूरी है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ही इसके पर्यावरण पर पड़ रहे नकारात्मक असर को लेकर भी सवाल तेज हो गए हैं। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक दावा तेजी से वायरल हुआ कि हर बार जब कोई यूजर ChatGPT से एक सवाल पूछता है, तो करीब 17 गैलन पानी बर्बाद होता है। इसने लोगों के बीच चिंता पैदा कर दी, क्योंकि डाटा सेंटर्स में कूलिंग के लिए पानी की खपत पहले से ही एक बड़ा मुद्दा रही है। हालांकि, OpenAI फाउंडर सैम आल्टमैन ने इस दावे को झूठा बताते हुए इसे 'पूरी तरह पागलपन' बताया है।
OpenAI के CEO सैम ने India AI Impact Summit 2026 के दौरान इस मुद्दे पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि इंटरनेट पर फैल रही यह बात कि 'ChatGPT की हर क्वेरी पर 17 गैलन पानी खर्च होता है', पूरी तरह गलत है और इसका सच्चाई से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने साफ कहा कि पहले डाटा सेंटर्स में इवैपोरेटिव कूलिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता था, जिसमें पानी का इस्तेमाल होता था लेकिन अब कंपनी उस मॉडल पर निर्भर नहीं है।
कूलिंग के लिए खर्च होता है पानी
दरअसल, डाटा सेंटर्स में सर्वर लगातार चलते रहते हैं और उन्हें ठंडा रखना जरूरी होता है। ट्रेडिशनली इसके लिए वाटर-बेस्ड कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसी बारे में Water technology company Xylem और Global Water Intelligence की एक रिपोर्ट में कहा गया कि आने वाले 25 वर्षों में AI कंप्यूटिंग की मांग बढ़ने के कारण कूलिंग के लिए पानी की खपत तीन गुना तक बढ़ सकती है। हालांकि यह रिपोर्ट पूरे AI इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करती है।
सैम ने यह भी माना कि एनर्जी यूजेस एक बड़ी चिंता है लेकिन इसे सही संदर्भ में समझना जरूरी है। उनके मुताबिक, हर क्वेरी पर खर्च होने वाली ऊर्जा के बजाय हमें कुल AI यूजेस से होने वाली ऊर्जा खपत पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि दुनिया तेजी से AI का उपयोग कर रही है, इसलिए हमें जल्द से जल्द रिन्यूएबल एनर्जी जैसे न्यूक्लियर, विंड और सोलर की ओर बढ़ना होगा।
इंसानों से की AI टूल्स की तुलना
प्रोग्राम के दौरान Altman ने AI और इंसानों के एनर्जी कंजम्पशन की तुलना पर भी बात की। उन्होंने कहा कि अक्सर लोग AI मॉडल को ट्रेन करने में लगने वाली एनर्जी की तुलना इंसान के एक सवाल का जवाब देने में लगने वाली एनर्जी से करते हैं, जो सही नहीं है। उनके मुताबिक, एक इंसान को ज्ञान हासिल करने में लगभग 20 साल की जिंदगी, भोजन और रिसोर्स लगते हैं। हालांकि उनके इस बयान की सोशल मीडिया पर आलोचना भी हुई। Zoho के फाउंडर Sridhar Vembu ने इस तुलना पर आपत्ति जताते हुए कहा कि टेक्नोलॉजी को इंसानों के बराबर मानना सही नहीं है।
लेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




साइन इन