US Iran War explainer Cheap Iranian drones Changed fate of War how US pushed to BackFoot in 25 Days ड्रोन युद्ध का गणित ऐसा कि बैकफुट पर आया अमेरिका, खर्चा बढ़ाकर कैसे फंसा रहा है ईरान?, Explainer Hindi News - Hindustan
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ड्रोन युद्ध का गणित ऐसा कि बैकफुट पर आया अमेरिका, खर्चा बढ़ाकर कैसे फंसा रहा है ईरान?

इस पूरी लड़ाई में अटैकर यानी हमला करने वाला सिर्फ 20 हजार डॉलर खर्च कर रहा है, जबकि डिफेंडर हर बार 10 से 20 गुना ज्यादा खर्च कर रहा है। ईरान को जीतने की जरूरत भी नहीं है, उसे सिर्फ लगातार अपने ड्रोन लॉन्च करते रहना है।

Tue, 24 March 2026 02:22 PMJagriti Kumari लाइव हिन्दुस्तान
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ड्रोन युद्ध का गणित ऐसा कि बैकफुट पर आया अमेरिका, खर्चा बढ़ाकर कैसे फंसा रहा है ईरान?

US-Iran War: पश्चिम एशिया में बीते 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर जबरदस्त हमला किया, तब अमेरिका को युद्ध से कई उम्मीदें थीं। अली खामेनेई की हत्या के बाद सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ ईरानी तेल भंडारों पर अमेरिकी हुकूमत के ख्वाब भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने देखे ही होंगे। हालांकि युद्ध शुरू होने के 25 दिन बाद अब अमेरिका ही पीछे हटता हुआ नजर आ रहा है। डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि ईरान उनके साथ समझौता करना चाहता है, लेकिन ईरान के बचे हुए शीर्ष नेता इससे साफ इनकार कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल भी हैं कि क्या अमेरिका बैकफुट पर चला गया है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को घोषणा की है कि 5 दिनों के लिए ईरान के ठिकानों पर हमले रोक दिए जाएंगे। विशेषज्ञों की मानें तो इसकी असली वजह है युद्ध में अमेरिका के बजट का हिलना। जंग का नतीजा क्या होगा, यह अलग बात है, लेकिन इकॉनमी के लिहाज से यह लड़ाई अमेरिका को पहले ही महंगी पड़ रही है। इस युद्ध में ईरान अब तक 3 हजार से ज्यादा ड्रोन दाग चुका है, और सवाल यही है कि अमेरिका की बेहद महंगी डिफेंस इनके सामने कब तक टिक पाएगी।

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शाहेद ड्रोन ने अमेरिका को छकाया

ईरान के शाहेद ड्रोन की कीमत करीब 20 हजार डॉलर बताई जाती है, जबकि इन्हें गिराने के लिए जो मिसाइलें इस्तेमाल हो रही हैं, उनकी कीमत 10 लाख डॉलर से भी ज्यादा है। अगर यही हिसाब हजारों बार दोहराया जाए, तो समझ आता है कि डिफेंस अधिकारियों की चिंता क्यों बढ़ रही है। यूएई का कहना है कि उसने 28 फरवरी के बाद से अब तक 1600 से ज्यादा ड्रोन गिराए हैं। इसके लिए ज्यादातर फाइटर जेट और ऐसे हथियार इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जो असल में दूसरे फाइटर जेट को मारने के लिए बनाए गए थे, ना कि धीमी रफ्तार से उड़ने वाले छोटे ड्रोन के लिए। यह तरीका फिलहाल काम तो कर रहा है, लेकिन लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है।

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खाली हो रहा खजाना

इस पूरी लड़ाई में अटैकर यानी हमला करने वाला सिर्फ 20 हजार डॉलर खर्च कर रहा है, जबकि डिफेंडर यानी बचाव करने वाला हर बार 10 से 20 गुना ज्यादा खर्च कर रहा है। ईरान को जीतने की जरूरत भी नहीं है, उसे सिर्फ लगातार अपने ड्रोन लॉन्च करते रहना है। सेंटर फॉर सिक्योरिटी एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज की एक्सपर्ट लॉरेन कान का कहना है कि यह मॉडल लंबे समय तक किसी भी हालत में टिकाऊ नहीं है। फाइनैंशल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, गल्फ देशों के पास भारी फंड होने के बावजूद यह खर्च चिंता बढ़ाने वाला है।

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खाड़ी देश नहीं थे तैयार

असल समस्या यह भी है कि गल्फ देशों की सेनाएं एक अलग तरह के युद्ध के लिए तैयार थीं। उन्होंने तेज, ऊंचाई पर उड़ने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों से निपटने के लिए भारी निवेश किया, लेकिन हजारों की संख्या में आने वाले छोटे, धीमे और नीचे उड़ने वाले ड्रोन के खतरे को सही तरीके से नहीं समझा। ये ड्रोन रडार की सीमा से नीचे निकल जाते हैं, क्योंकि सिस्टम को इस तरह के खतरे के लिए अपडेट ही नहीं किया गया था। फिलहाल पैट्रियट मिसाइल जैसे सिस्टम अभी रिजर्व में रखे गए हैं, क्योंकि एक इंटरसेप्शन की कीमत करीब 40 लाख डॉलर तक पहुंचती है। इन्हें आखिरी विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।

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