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इतिहास की सबसे अजीब जंग! जब मशीन गन लेकर उतरी सेना, लेकिन पक्षियों ने खदेड़ दिया; हुई 'हार'

क्या आपने कभी सुना है कि कोई देश पक्षियों से युद्ध हार गया? जानिए 1932 के 'ग्रेट एमू वॉर' की पूरी कहानी, जब ऑस्ट्रेलिया की सेना मशीन गन के बावजूद एमू पक्षियों को नहीं हरा पाई। ऐतिहासिक तथ्यों के साथ एक मजेदार कहानी।

Tue, 17 Feb 2026 12:51 PMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, कैनबरा
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इतिहास की सबसे अजीब जंग! जब मशीन गन लेकर उतरी सेना, लेकिन पक्षियों ने खदेड़ दिया; हुई 'हार'

Great Emu War: यह सुनने में किसी कॉमेडी फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा लग सकता है, लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज 'ग्रेट इम्यू वॉर' एक वास्तविक और काफी अजीबोगरीब घटना है। 1932 में ऑस्ट्रेलिया की सेना और उड़ न पाने वाले पक्षी 'एमू' (Emu) के बीच एक जंग हुई थी। इसमें ऑस्ट्रेलियाई आर्मी ने मशीन गनों के साथ बड़े-बड़े एमू पक्षियों पर हमला किया, लेकिन यकीन मानिए जीत पक्षियों की हुई। हां, यह सच है- एक देश की सेना ने पक्षियों से हार मानी। आइए से विस्तार से समझते हैं।

ग्रेट एमू वॉर: जब सेना पक्षियों से हार गई

युद्ध और संकट में किसान: प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के बाद ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने हजारों सैनिकों को किसान बनाकर बसाने का फैसला किया। खासकर पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के गेहूं बेल्ट वाले इलाके में, जहां मिट्टी खराब थी और बारिश का कोई समय तय नहीं था। लगभग 5000 पूर्व सैनिकों को वहां बसा दिया गया, जिन्होंने गेहूं की खेती शुरू की।

एमू ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी बड़े और उड़ने में असमर्थ पक्षी हैं। वे इस इलाके में पहले से ही मौजूद थे। एमू दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा पक्षी है (ऊंचाई 1.5-1.9 मीटर, वजन 30-55 किलो तक)। ये सर्व-भक्षक होते हैं, यानी बीज, फल, कीड़े, छोटे जानवर सब खाते हैं। ये बहुत तेज दौड़ते हैं (50 किमी/घंटा तक) और लंबी दूरी तय करते हैं।

1922 में सरकार ने एमू को संरक्षित प्रजातियों से हटाकर कीट/हानिकारक घोषित कर दिया, क्योंकि वे फसलों को नुकसान पहुंचाते थे। वे बार-बार किसानों की बाड़ तोड़ते, फसल खाते और पैरों से और ज्यादा पौधों को कुचल देते। साथ ही बाड़ में छेद से खरगोश जैसे अन्य कीट भी अंदर आ जाते। 1929 की महामंदी ने पहले ही आर्थिक स्थिति खराब कर दी थी और ऊपर से 1932 में करीब 20000 एमू पक्षियों ने इन खेतों पर हमला बोल दिया।

एमू आमतौर पर प्रजनन के बाद तटीय इलाकों की ओर प्रवास करते हैं। सैनिकों द्वारा तैयार किए गए खेतों में उन्हें भरपूर पानी और पसंदीदा 'गेहूं' मिला। उन्होंने न केवल फसलें बर्बाद कीं, बल्कि बाड़ भी तोड़ दीं, जिससे जंगली खरगोशों को अंदर घुसने का रास्ता मिल गया।

1932: सूखा और एमू का हमला

दरअसल 1932 में भयंकर सूखा पड़ा था। एमू को पानी और भोजन की तलाश में बड़े पैमाने पर माइग्रेट करना पड़ा। करीब 20,000 एमू पक्षी कैंपियन जिले (विशेष रूप से वालगूलन और चांडलर इलाकों) में आ धमके। वे गेहूं की पकी फसलों पर टूट पड़े। किसानों को लाखों डॉलर का नुकसान हुआ।

हताश किसानों ने रक्षा मंत्री सर जॉर्ज पीयर्स से मदद मांगी। चूंकि किसान पूर्व सैनिक थे, उन्होंने मांग की कि एमू के खिलाफ 'मशीन गन' का इस्तेमाल किया जाए। सरकार ने इसे एक अच्छा सैन्य अभ्यास माना और युद्ध की घोषणा कर दी।

कमांडर: मेजर जी.पी.डब्ल्यू. मेरेडिथ

हथियार: दो लुईस मशीन गन और 10,000 राउंड गोलियां।

सेना: रॉयल ऑस्ट्रेलियन आर्टिलरी के दो सैनिक।

युद्ध की रणनीतियां हुईं फेल

मेजर मेरेडिथ को लगा था कि यह एक आसान काम होगा, लेकिन एमू पक्षियों ने अपनी बुद्धिमत्ता से सबको हैरान कर दिया।

पहली झड़प (2 नवंबर): सेना ने एमू के एक झुंड पर हमला किया। एमू छोटे-छोटे समूहों में बंट गए और इतनी तेजी से भागे कि मशीन गन का निशाना चूक गया। केवल कुछ ही पक्षी मारे गए।

घात लगाकर हमला (4 नवंबर): सेना ने एक स्थानीय बांध के पास 1,000 से अधिक एमू का इंतजार किया। जैसे ही वे करीब आए, गन जाम हो गई। पक्षी फिर भाग निकले।

ट्रक पर गन: सेना ने एक ट्रक पर मशीन गन लगाई ताकि वे एमू का पीछा कर सकें। लेकिन ऊबड़-खाबड़ जमीन पर ट्रक इतना हिल रहा था कि गनर एक भी सटीक शॉट नहीं लगा पाया। एमू की रफ्तार (50 किमी/घंटा) ट्रक से कहीं बेहतर थी।

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युद्ध का अंत और हार स्वीकारना

मेजर मेरेडिथ एमू की फुर्ती से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा कि 'अगर हमारे पास इन पक्षियों जैसा रेजिमेंट होता, तो हम दुनिया की किसी भी सेना का सामना कर सकते थे। वे मशीन गन का सामना ऐसे करते हैं जैसे वे टैंक हों।' मीडिया में खबरें छपने लगीं। अखबारों ने लिखा- एमू मशीन गनों का सामना टैंक की तरह कर रहे हैं।

6 हफ्तों के बाद, भारी आलोचना और बेहद कम सफलता (सिर्फ कुछ सौ पक्षी मारे गए और हजारों गोलियां बर्बाद हुईं) के कारण सरकार ने सेना वापस बुला ली। एमू आधिकारिक तौर पर यह 'युद्ध' जीत चुके थे।

अंततः सरकार ने एमू से निपटने के लिए 'इनाम प्रणाली' अपनाई, जहां किसानों को खुद शिकार करने के लिए पैसे दिए गए। यह तरीका ज्यादा प्रभावी साबित हुआ। आज यह घटना ऑस्ट्रेलिया के इतिहास में एक लोककथा की तरह याद की जाती है- एक ऐसी जंग जहां तकनीक और बारूद, प्रकृति की फुर्ती के सामने फेल हो गए।

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