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बस 4 साल और फिर धरती पर आ जाएगा स्पेस स्टेशन, केवल चीन का होगा दबदबा; भारत क्या कर रहा?

तीन दशकों का गौरवशाली इतिहास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का प्रतीक ‘इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन’ 2030 में रिटायर हो जाएगा। जानें कैसे स्पेसएक्स की मदद से इसे प्रशांत महासागर में विसर्जित किया जाएगा और इसके बाद अंतरिक्ष अनुसंधान का भविष्य कैसा होगा।

Sat, 7 Feb 2026 12:26 PMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान
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बस 4 साल और फिर धरती पर आ जाएगा स्पेस स्टेशन, केवल चीन का होगा दबदबा; भारत क्या कर रहा?

वर्ष 2030 में जब अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) अपनी अंतिम यात्रा पूरी कर पृथ्वी पर वापस लौटेगा, तो यह न केवल तीन दशकों के शांतिपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सहयोग का अंत होगा, बल्कि उस युग का भी समापन होगा जिसने अंतरिक्ष को हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बना दिया।

नवंबर 2000 से लेकर अब तक, फुटबॉल के मैदान के आकार की इस वैज्ञानिक प्रयोगशाला में हमेशा कोई न कोई इंसान मौजूद रहे हैं। यह स्टेशन आठ किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। अगले सप्ताह अंतरिक्ष स्टेशन के लिए रवाना होने वाले नए चालक दल की तैयारियों के बीच, जमीन पर इस मिशन को सफल बनाने वाले विशेषज्ञ इसके आगामी अंत को लेकर भावुक और उदासीन हैं।

मानवीय सहयोग का 'कैथेड्रल'

नासा (NASA) के साइंस एंड मिशन सिस्टम ऑफिस के पूर्व प्रबंधक जॉन होरैक ने इसे सीमाओं, भाषाओं और संस्कृतियों के पार मानवीय सहयोग का एक भव्य मंदिर (कैथेड्रल) बताया है। वे कहते हैं- 25 से अधिक वर्षों से हमारे पास साल के 365 दिन और चौबीसो घंटे अंतरिक्ष में लोग मौजूद हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि जब हम एक-दूसरे के साथ जुड़ना चाहते हैं, तो हम 'लड़ने' के बजाय समस्याओं का 'हल निकालना' जानते हैं।

ISS का प्रस्ताव शीत युद्ध के बाद रखा गया था, जो पूर्व प्रतिद्वंद्वियों- रूस और अमेरिका के बीच सहयोग की एक नई भावना का प्रतीक था। यूक्रेन युद्ध के कारण रूस और पश्चिम के बीच कई रिश्ते टूट चुके हैं, लेकिन अंतरिक्ष स्टेशन पर यह सहयोग आज भी कायम है।

वापसी की योजना: पॉइंट नेमो पर अंत

समय के साथ ISS पुराना हो रहा है और इसके उपकरण पुराने पड़ चुके हैं। पिछले साल नासा ने घोषणा की थी कि उसने एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स को एक ऐसा वाहन बनाने के लिए चुना है जो 2030 में स्टेशन को वापस पृथ्वी के वायुमंडल में धकेल देगा।

सटीक री-एंट्री: एक बड़ा रॉकेट इंजन ISS की गति को धीमा कर देगा, जिससे यह प्रशांत महासागर के एक ऐसे क्षेत्र में गिरेगा जहां कोई इंसान नहीं रहता है।

पॉइंट नेमो: यह समुद्र का वह हिस्सा है जो जमीन और इंसानों से सबसे दूर है। इससे पहले रूस के 'मीर' (Mir) स्टेशन सहित कई अंतरिक्ष मलबे यहीं विसर्जित किए गए हैं।

भविष्य: निजी स्टेशन और चीनी प्रभुत्व

2030 के बाद, पृथ्वी की कक्षा में एकमात्र सक्रिय स्टेशन चीन का 'तियांगोंग' होगा। भविष्य की योजनाओं को लेकर अमेरिका अब निजी कंपनियों द्वारा संचालित स्टेशनों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

व्यावसायिक युग: अंतरिक्ष स्टेशन अब उसी व्यावसायिक मॉडल पर चलेंगे जैसे आज रॉकेट और सैटेलाइट चलते हैं।

प्रमुख खिलाड़ी: जेफ बेजोस की 'ब्लू ओरिजिन' और 'एक्सिओम स्पेस' जैसी कंपनियां पहले से ही निजी स्टेशन बनाने पर काम कर रही हैं।

सरकारी भागीदारी: फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसी CNES के लियोनेल सुचेट का मानना है कि व्यापारिक मॉडल के बावजूद, सरकारें हमेशा अपने अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने में रुचि रखेंगी।

एक नए युग की शुरुआत

भले ही ISS का अंत भावुक करने वाला हो, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक नए अध्याय का द्वार खोलेगा। अब ध्यान चंद्रमा पर आधार शिविर (Lunar Bases) बनाने की ओर है, जिसमें अमेरिका और चीन दोनों ही दौड़ में हैं। जॉन होरैक ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के पूर्व प्रमुख जीन-जैक्स डॉर्डन के शब्दों को दोहराते हुए कहा- अगर आप तेज चलना चाहते हैं, तो अकेले चलें। लेकिन अगर आप दूर तक जाना चाहते हैं, तो साथ मिलकर चलें।

भारत की होगी एंट्री?

भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन बनाने का सपना अब एक ठोस योजना का रूप ले चुका है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) इस पर तेजी से काम कर रहा है। भारत ने 2035 तक अपना खुद का अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। यह भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में खड़ा कर देगा जिनके पास अपना निजी स्पेस स्टेशन है।

इसरो का लक्ष्य है कि 2028 तक स्टेशन का पहला मॉड्यूल (BAS-1) लॉन्च कर दिया जाए। यह एक प्रयोगात्मक मॉड्यूल होगा जिसका उपयोग तकनीकी परीक्षण के लिए किया जाएगा। शुरुआत में यह ISS से छोटा होगा (लगभग 20-25 टन का)। इसमें 2 से 4 अंतरिक्ष यात्री एक साथ रह सकेंगे और 15-20 दिनों तक अनुसंधान कर सकेंगे। इसे पृथ्वी की निचली कक्षा में लगभग 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया जाएगा।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत को सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण से जुड़े प्रयोगों के लिए किसी दूसरे देश या अंतरराष्ट्रीय स्टेशन पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। गगनयान मिशन (भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन) इस स्टेशन की नींव है। जो तकनीक गगनयान के लिए विकसित की जा रही है, वही आगे चलकर स्टेशन बनाने और अंतरिक्ष यात्रियों को वहां पहुंचाने में काम आएगी।

यह स्टेशन भविष्य के 'मून मिशन' (2040 तक चंद्रमा पर भारतीय को भेजना) के लिए एक बेस कैंप या प्रशिक्षण केंद्र की तरह काम करेगा। इसरो ने 'स्पेस डॉकिंग' तकनीक पर काम शुरू कर दिया है, जिसमें दो अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष में एक-दूसरे से जुड़ते हैं। यह स्टेशन के निर्माण के लिए सबसे महत्वपूर्ण तकनीक है। भारत के इस स्टेशन की सबसे खास बात यह होगी कि यह पूरी तरह से 'स्वदेशी' होगा और इसे भारत के सबसे शक्तिशाली रॉकेट LVM3 के उन्नत संस्करण से लॉन्च किया जाएगा।

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