इस देश के लोगों ने अपने ही प्रधानमंत्री को मारकर खा लिया, आज भी म्यूजियम में रखी है जीभ और उंगली
जानिए 1672 की वह खौफनाक ऐतिहासिक घटना जब नीदरलैंड्स की उग्र भीड़ ने अपने ही प्रधानमंत्री जोहान डी विट और उनके भाई की हत्या कर उनके अंगों को खा लिया था। राजनीति और बर्बरता की एक अनसुनी दास्तान।

इतिहास कई बार इतना विचलित कर देने वाला होता है कि वह किसी हॉरर कहानी से कम नहीं लगता। दुनिया के देशों की सूची में नीदरलैंड्स का नाम आधुनिक लोकतंत्र, उदारता और मानवाधिकारों के लिए जाना जाता है। लेकिन इसी देश के इतिहास में एक ऐसा अध्याय भी दर्ज है, जब गुस्साई भीड़ ने अपने ही शासक को बेरहमी से मार डाला और इतिहासकारों के अनुसार उसके शरीर के हिस्सों को खा भी लिया। यह इतिहास की उन दुर्लभ और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाओं में से एक है, जहां राजनीति शास्त्र की किताबें और 'क्राइम थ्रिलर' के बीच की रेखा धुंधली पड़ जाती है। साल 1672 में नीदरलैंड्स में जो हुआ, उसने मानवता और सभ्यता के दावों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया था। यह कहानी है सन् 1672 की, जिसे डच इतिहास में Rampjaar यानी आपदा का साल कहा जाता है। आइए, जोहान डी विट और उनके भाई की उस खौफनाक दास्तान को विस्तार से समझते हैं।
नीदरलैंड्स का 'स्वर्ण युग' और जोहान डी विट का उदय
17वीं शताब्दी के मध्य में नीदरलैंड्स (जिसे तब 'डच रिपब्लिक' कहा जाता था) दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और समुद्री शक्ति था। जोहान डी विट 1653 से इस गणराज्य के 'ग्रैंड पेंशनरी' थे। यह आज के प्रधानमंत्री के बराबर का पद है।
राजनीतिक विचारधारा: डी विट एक कट्टर रिपब्लिकन थे। वे राजाओं के शासन के खिलाफ थे और चाहते थे कि सत्ता व्यापारियों और कुलीनों के हाथ में रहे।
सफलता: उन्होंने डच नौसेना को मजबूत किया और व्यापार को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।
'आपदा का वर्ष' 1672
1672 को डच इतिहास में 'रैम्पजार' यानी 'आपदा का वर्ष' कहा जाता है। नीदरलैंड्स पर एक साथ चार मोर्चों से हमला हुआ: फ्रांस, इंग्लैंड, और दो जर्मन रियासतें (मुन्स्टर और कोलोन)।
जनता का गुस्सा: डच सेना जमीन पर कमजोर साबित हुई। जनता को लगा कि जोहान डी विट ने केवल नौसेना पर ध्यान दिया और थल सेना को नजरअंदाज किया।
दो गुटों की जंग: देश दो हिस्सों में बंट गया। एक गुट 'स्टेटिस्ट्स' (डी विट के समर्थक) और दूसरा 'ऑरेंजाइस्ट्स' (जो 'विलियम III ऑफ ऑरेंज' को राजा बनाना चाहते थे)।
उस खौफनाक दिन की शुरुआत: 20 अगस्त 1672
अगस्त तक आते-आते जोहान डी विट अपनी लोकप्रियता खो चुके थे। उनके भाई, कॉर्नेलियस डी विट पर राजद्रोह और विलियम III की हत्या की साजिश का झूठा आरोप लगाकर जेल में डाल दिया गया।
20 अगस्त को, जोहान अपने भाई से मिलने 'द हेग' की जेल पहुंचे। यही वह समय था जब बाहर एक उग्र भीड़ जमा हो गई। इस भीड़ को ऑरेंजाइस्ट्स और कुछ स्थानीय मिलिशिया ने उकसाया था।
हत्या और वह 'शर्मनाक' कृत्य
भीड़ ने जेल का दरवाजा तोड़ दिया और दोनों भाइयों को घसीटते हुए बाहर ले आए। जो हुआ वह किसी भी सभ्य समाज के लिए अकल्पनीय था।
हत्या: दोनों भाइयों को गोली मारी गई और फिर चाकुओं से गोद दिया गया।
अंग-भंग: भीड़ का गुस्सा शांत नहीं हुआ। उन्होंने दोनों के कपड़े फाड़ दिए और उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
नरभक्षण: ऐतिहासिक दस्तावेजों और उस समय के गवाहों के अनुसार, भीड़ के कुछ उन्मादी लोगों ने उनके शरीर के अंगों (जैसे उंगलियां और अन्य हिस्से) को काट लिया और उन्हें पकाकर या कच्चा ही खा लिया। कुछ ने तो अंगों को यादगार के तौर पर बाजारों में बेच भी दिया।
आज भी 'द हेग' के एक म्यूजियम (Haags Historisch Museum) में जोहान डी विट की जीभ और उनके भाई की एक उंगली को संरक्षित करके रखा गया है, जो उस दिन की बर्बरता की गवाही देते हैं।
अंजाम और विरासत
इस हत्याकांड के बाद विलियम III सत्ता में आए। हालांकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से इस कृत्य की निंदा की, लेकिन उन्होंने हत्यारों को कभी सजा नहीं दी। बल्कि, कई संदिग्धों को इनाम और पदोन्नति दी गई, जिससे यह संदेह गहरा गया कि इस पूरी घटना के पीछे कहीं न कहीं राजनीतिक शह थी।
जोहान डी विट एक कुशल रणनीतिकार थे, लेकिन वे जनता की नब्ज और युद्ध की बदलती परिस्थितियों को भांपने में असफल रहे। उनकी मौत ने दिखाया कि जब डर और राजनीति का मेल होता है, तो भीड़ 'भेड़' से 'भेड़िया' बनने में देर नहीं लगाती।
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