EXPLAINER: अभी तक ईरान युद्ध क्यों नहीं 'जीत' पाए ट्रंप? 10 प्वाइंट्स में समझिए पूरी कहानी
पश्चिम एशिया के इस युद्ध में भले ही अमेरिका ने तेहरान को लगभग बर्बाद कर दिया हो, लेकिन अमेरिकी सेना को भी नुकसान उठाना पड़ा है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इस युद्ध में अभी तक अमेरिका के चार विमान नष्ट हो चुके हैं। इसके साथ ही 7 सैनिक भी मारे जा चुके हैं।

Explainer Iran US Israel War: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरूआत से ही इरादे साफ कर दिए थे। वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को उठाने के बाद ट्रंप ने लीडरशिप खत्म करने वाली तकनीक का इस्तेमाल ईरान में भी करने की कोशिश की। परमाणु बातचीत के बीच 28 फरवरी को तेहरान पर बोले गए हमले ने ईरान और शिया समुदाय के सुप्रीम लीडर खामेनेई को मार दिया। एक से दो हफ्ते के बीच ईरान में सत्ता परिवर्तन करके जीत हासिल करने का दावा करने वाला ट्रंप अब एक थकाने वाले युद्ध में फंसते नजर आ रहे हैं। होर्मुज के बंद होने और ईरान की नाकेबंदी के बीच परमिट सिस्टम ने अमेरिका और उसके साथियों के लिए और भी ज्यादा परेशानी खड़ी कर दी है। अब सवाल यही है कि आखिर जिस युद्ध को ट्रंप कुछ दिनों में खत्म करने का दावा कर रहे थे, वह अब लंबा क्यों खिंचता जा रहा है?
अमेरिकी विशषज्ञों की मानें तो ट्रंप के 'अहसास' के आधार पर शुरू हुए इस युद्ध का ताजा परिणाम यह दिखाता है कि ट्रंप प्रशासन ने जल्दबाजी में यह फैसला लिया है। अमेरिकी अधिकारी इस स्थिति को दशकों से समझने की कोशिश करते रहे हैं कि अगर ईरान पर हमला किया जाता है, तो वह कैसे प्रतिक्रिया देगा, लेकिन ट्रंप ने इन सभी को दरकिनार कर हमला बोलना उचित समझा। ईरान की तरफ से किए गए हमले न केवल अमेरिका की युद्ध लागत को बढ़ा रहे हैं, बल्कि उसके सहयोगियों पर हमला करके और होर्मुज को बंद करके उनके लिए भी इस युद्ध को महंगा कर रहा है। ट्रंप कह चुके हैं कि वह ईरान को रोके बिना नहीं मानेंगे, चाहे इसमें पैसा खर्च हो या कुछ अमेरिकियों की जान ही क्यों न चली जाए। लेकिन सवाल यही है कि आखिर ट्रंप ऐसी नीति कब तक जारी रख सकते हैं, और आखिर क्यों अब तक अपेक्षाकृत छोटे से ईरान को ट्रंप हरा नहीं पाए। तो आइए समझते हैं, पूरी कहानी...
होर्मुज स्ट्रेट का संकट
अमेरिका की तरफ से जब हमला किया गया था, तो उसके पहले वह भारत के ऊपर दबाव डाल रहे थे कि वह रूस से तेल आयात को रोक दे। यूक्रेन की मदद के वाशिंगटन को यह सही भी लगा, तो उसने ट्रेड डील के आधार पर भारत को ऐसा करने के लिए मना लिया। अब ईरान युद्ध शुरू होने के लगभग एक हफ्ते बाद ही जब वैश्विक ऊर्जा का संकट शुरू हो गया, तो अमेरिका ने न सिर्फ भारत को रूसी तेल खरीदने में छूट दी, बल्कि अस्थायी तौर पर रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों को भी हटा दिया।
एक महीने में वाशिंगटन द्वारा बदले गए यह फैसले इस बात का संकेत देते हैं कि या तो ईरान पर हमला किसी जल्दबाजी में किया गया है या फिर अमेरिका को अंदाजा ही नहीं था कि ईरान पर हमले की स्थिति में होर्मुज बंद भी हो सकता है। अमेरिका के लिए होर्मुज खोलना आसान भी नहीं है। क्योंकि ईरान और उसके सहयोगी दलों के सस्ते ड्रोन और मिसाइलों के आगे तेल के जहाजों को एस्कॉर्ट करना एक महंगा सौदा साबित हो सकता है। अगर ट्रंप के इशारे पर नौसेना इसको करने की कोशिश भी करती है, तो वह इसका भारी नुकसान उठाएगी।
इजरायल की लीडरशिप खात्मे की नीति
वेनेजुएला में अभियान की स्थिति में अमेरिका ने मादुरो की हत्या नहीं की। बल्कि उन्हें उठाकर अपने देश ले आए। 2002 में जब सद्दाम हुसैन के खिलाफ भी अमेरिका ने अभियान चलाया था, तो उसकी हत्या न करते हुए पकड़कर केस चलाया गया था। लेकिन ईरान के सुप्रीम लीडर को लेकर अमेरिकी और इजरायली मिसाइलों परिवार सहित उनका खात्मा कर दिया। यह नीति अमेरिका की कम और इजरायल की ज्यादा लगती है। हमास के साथ युद्ध लड़ रहे इजरायल की नीति हमेशा से ही संगठन के नेता को खत्म करके पूरे संगठन को कमजोर करने की रही है। हमास हो या हिज्बुल्लाह हो इजरायल ने हमेशा से ही उनके लीडरशिप को निशाना बनाया और खत्म कर दिया। हानियेह से लेकर नसरल्लाह तक, जो भी हमास या हिज्बुलल्लाह की गद्दी पर बैठा उसे खत्म कर दिया। लेकिन ईरान अलग है। ईरान कोई संगठन नहीं बल्कि एक देश है। खामेनेई की हत्या के बाद ईरान टूटा नहीं, बल्कि नए तौर पर उभरकर सामने आया।
ईरान की लंबे युद्ध की तैयारी
1979 में ईरान की इस्लामिक क्रांति के बाद से ही अमेरिका और तेहरान के बीच में तनाव शुरू हो गया था। ईरान तभी से अपने हथियारों को और अपने प्रॉक्सी समूहों को तैयार करता आ रहा है। समय के साथ बढ़ती टेक्नोलॉजी ने उसे और भी ज्यादा मजबूत कर दिया। खामेनेई लगातार अपनी सेना को मजबूत करने में लगे रहे। इजरायल और अमेरिका ने ईरान के वैज्ञानिकों, सैन्य कमांडरों को निशाना बनाकर पीछे धकेलेने की कोशिश की, लेकिन ईरान लगातार आगे बढ़ता रहा। इस मामले में असली खेल उस वक्त शुरू हुआ, जब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच में पिछले साल 12 दिनों का युद्ध हुआ। इस युद्ध में ईरान को समझ आ गया अमेरिका की हवाई क्षमता का सामना नहीं किया जा सकता। पहले से तैयार उसके अंडरग्राउंड मिसाइल शहरों में शाहेद ड्रोन की प्रोडक्शन को बढ़ दिया गया और आज हालत यह है कि यह सस्ते ड्रोन्स अमेरिका की नाक में दम किए हुए हैं। ईरान के पास यह हजारों की संख्या में मौजूद हैं।
ईरान के सर्वोच्च नेता की समस्या
1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में खुमैनी की सत्ता आई। ईरान के सुप्रीम लीडर का पद दुनिया भर के शिया समुदाय के लिए सुप्रीम लीडर के रूप में स्थापित हो गया। भारत में भी करोड़ों की संख्या में शिया मुसलमान खामेनेई को अपने नेता के रूप में देखते हैं। ऐसे में जब अमेरिका ने खामेनेई की हत्या की, तो यह केवल ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या नहीं थी, बल्कि दुनिया भर के शिया समुदाय के लीडर की हत्या थी। इसका विरोध दुनियाभर में हुआ।
इस हमले में खामेनेई के मारे जाने के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को सुप्रीम लीडर चुना गया। जानकारों की मानें, तो एक लगभग 90 साल के नेता की तुलना में मोजतबा ज्यादा कट्टर लीडर साबित होंगे। अब ईरान की गद्दी पर एक ऐसा नेता बैठा है, जिसके पिता, पत्नी, बेटे या बेटी, बहन और बहनोई को मिसाइल हमले में मार दिया गया। शिया समुदाय में बदले और शहीद की भावना प्रबल होती है। ऐसे में ईरान की तरफ से अब किसी भी शांति की पेशकश को सामने रखना आसान नहीं है और अगर रखा भी जाता है, तो अमेरिका इन्हें स्वीकार करने की स्थिति में नहीं होगा।
इजरायल के लड़ाई रोकने पर संशय
अमेरिकी अखबार सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक अगर ट्रंप किसी भी कारण से युद्ध रोकने की घोषणा भी कर देते हैं, तो यह साफ नहीं है कि इजरायल भी उनके साथ युद्ध रोक देगा। क्योंकि इस स्थिति में ईरान लंबे युद्ध लड़ने का आदी रहा है। तेहरान के तेल ढांचे पर जब इजरायली फाइटर जेट्स ने अमेरिका को बिना बताए हमला किया था, तो उस वक्त साफ हो गया था कि दोनों देशों के उद्देश्य थोड़े अलग हैं।
ट्रंप ने रविवार को मीडिया से बात करते हुए कहा कि यह युद्ध कब खत्म होगा, यह उनका और नेतन्याहू का साझा निर्णय होगा। नेतन्याहू और ईरान की दुश्मनी पुरानी और ज्यादा कड़वी है, ऐसे में संभव है कि नेतन्याहू ईरान पर युद्ध खत्म करने की कोशिश ही न करें।
अमेरिका की तरफ से युद्ध के स्पष्ट उद्देश्य का अभाव
राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ से शुरुआत में कहा गया था कि इस युद्ध का उद्देश्य ईरान की सत्ता परिवर्तन और परमाणु हथियार को रोकना है। लेकिन निकट भविष्य में ऐसा संभव नहीं लग रहा है। अब हाल में ट्रंप के बयानों को देखें, तो वह सत्ता परिवर्तन की बात करते नजर नहीं आते हैं। ट्रंप और उनकी टीम के बयान इस मामले में थोड़े विरोधाभासी नजर आते हैं। होर्मुज के बंद होने में अमेरिका और उसके सहयोगियों की स्थिति को बिगाड़ दिया है।
परमाणु का सवाल
पिछले साल जब ट्रंप ने अपने बमबर्षक विमान के माध्यम से ईरान की परमाणु ठिकानों पर हमला किया था, तो उन्होंने दावा किया था कि इसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया है। हालांकि, अब जब फिर हमला किया गया है, तो साफ है कि वह मिशन पूरा नहीं हुआ था। लेकिन ईरान ने इससे सबक लिया। निश्चित तौर पर अब उसने अपने परमाणु कार्यक्रम को और भी ज्यादा तेज कर दिया है।
क्या सेना उतारने के लिए तैयार हैं ट्रंप?
आईएईए के मुताबिक ईरान के पास अभी भी करीब 200 किलोग्राम अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम मौजूद है। सैद्धांतिक रूप से अगर देखें, तो यह धरती के बहुत गहराई में रखा हुआ है। अमेरिका का सबसे बड़ा बमवर्षक विमान भी उसे ध्वस्त करने में नाकामयाब रहा। ऐसे में इसे जमीन पर किसी योजना के माध्यम से या सैनिकों को उतार कर ही खत्म किया जा सकता है। क्योंकि इन भंडारों को खत्म किए बिना वॉशिंगटन कभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो सकता कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। वहीं, दूसरी तरफ विदेशी धरती पर अमेरिकी सैनिकों को भेजने के खिलाफ रहने वाले ट्रंप क्या ईरान के परमाणु हथियारों को नष्ट करने के लिए सैनिक भेजेंगे, यह बड़ा सवाल है।
ईरान की जनता ने दिया ट्रंप को धोखा?
इस हमले के शुरू होने के पहले ईरान में खामेनेई के खिलाफ जमकर प्रदर्शन हो रहे थे। ट्रंप और इजरायल को इस बात की उम्मीद थी कि हमले के बाद ईरान की जनता उनके साथ आकर सत्ता को उखाड़ फेंकेगी। ट्रंप और नेतन्याहू बार-बार आकर जनता को उठ खड़े होने और आजादी लेने के लिए प्रेरित करते नजर आए। लेकिन ईरान में कोई ज्यादा बड़ा आंदोलन नहीं खड़ा हुआ है। कई विश्लेषकों का मानना है कि अधिक संभावित स्थिति यह है कि जब बमबारी रुकेगी तो सरकार और अधिक कठोर दमन करेगी।
अमेरिका की घरेलू राजनीति
दूसरी बार राष्ट्रपति पद बैठे ट्रंप ने अपने अभियानों के दौरान दूसरे देशों के युद्ध में अमेरिकियों को झोंकने का कड़ा विरोध किया था। अब जबकि वह यही कर रहे हैं, तो उन्हें अपने समर्थकों को संभालने में परेशानी हो सकती है। उनके अधिकारी अमेरिकियों को आश्वस्त कर रहे हैं कि युद्ध के कारण बढ़ी तेल कीमतें अस्थायी हैं और दीर्घकालिक लाभ के लिए अल्पकालिक दर्द जरूरी है।लेकिन ईरान के संभावित परमाणु हथियार का खतरा, जो युद्ध शुरू होने पर मौजूद भी नहीं था। अमेरिकी मतदाताओं के लिए उतना बड़ा मुद्दा नहीं है जितना इजरायल के लिए, जहाँ इसे अस्तित्वगत खतरे के रूप में देखा जाता है। जैसे-जैसे अमेरिकी सैनिकों की मौत पर शोक बढ़ेगा और पेट्रोल की कीमतें तथा रोजमर्रा की लागत बढ़ेगी, अमेरिकी जनता ट्रंप की जीत के दावों से सहमत नहीं होगी।
लेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




साइन इन