चाचा की छाया और अपनी पहचान की ललक; कैसी रही अजित पवार की 35 साल की राजनीति
Ajit Pawar life story: अजित पवार का बीते सालों में कद ऐसा बढ़ा कि जब वह चाचा शरद पवार से अलग हुए तो भी कमजोर नहीं हुए। विधानसभा चुनाव में 40 से ज्यादा सीटें हासिल करके दिखा दिया कि उनके पास कितना दमखम है। 1991 में उन्होंने पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा था।

अजित पवार के प्लेन क्रैश में निधन के चलते महाराष्ट्र के राजनीतिक जगत को बड़ा सदमा लगा है। वह एक कुशल प्रशासक माने जाते थे तो वही उनकी मित्रता दलीय सीमा से हमेशा ही परे रही। देवेंद्र फडणवीस भले ही भाजपा के नेता हैं, लेकिन उनके साथ अजित पवार की जुगलबंदी ऐसी थी कि समान विचारधारा वाले एकनाथ शिंदे भी असहज हो जाते थे। यहां तक कि अजित पवार का कद ऐसा बढ़ा कि जब वह चाचा शरद पवार से अलग हुए तो भी कमजोर नहीं हुए। विधानसभा चुनाव में 40 से ज्यादा सीटें हासिल करके दिखा दिया कि उनके पास कितना दमखम है। 1991 में उन्होंने पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा था।
तब से अब तक 35 साल के राजनीतिक करियर में अजित पवार का यह संघर्ष चाचा की छाया और अपनी खुद की पहचान बनाने की ललक के बीच रस्साकशी का रहा है। 1959 में जन्मे अजित पवार के पिता अनंतराव पवार थे, जो शरद पवार के बड़े भाई थे। उन्हें पहली बार चुनाव लड़ने का मौका बारामती लोकसभा सीट से ही मिला था। हालांकि बाद में शरद पवार के लिए उन्होंने सीट छोड़ दी थी ताकि चाचा जीतकर नरसिम्हा राव सरकार का हिस्सा बन सकें। उनका विधानसभा करियर 1995 में बारामती विधानसभा सीट से ही शुरू हुआ था। इसके बाद वह 1999, 2004, 2009, 2014 और 2019 में भी जीते थे।
उनकी पहचान लगातार जीत के चलते पश्चिम महाराष्ट्र के शीर्ष नेता के तौर पर बनी थी। यही कारण रहा कि शरद पवार से भी ज्यादा पावरफुल वह महाराष्ट्र की राजनीति में हो गए थे। लेकिन कहा जाता है कि शरद पवार इसी पक्ष में थे कि राजनीतिक विरासत भतीजे की बजाय बेटी सुप्रिया सुले को ही दी जाए। यही बात दोनों के अलगाव का कारण बनी। इसके अलावा अजित पवार सत्ता में रहने के पक्ष में थे और उन्होंने भाजपा के साथ जाने का फैसला लिया। यह चीज उनके पक्ष में रही और वह डिप्टी सीएम रहे। 1999 में जब शरद पवार ने कांग्रेस तोड़कर एनसीपी बनाई थी तो अजित पवार उनके साथ रहे और लंबे समय तक काम करने के चलते लोग उन्हें उत्तराधिकारी के तौर पर देखने लगे थे।
40 साल की उम्र में ही बने कैबिनेट मिनिस्टर, कहलाने लगे दादा
वह पहली बार 40 साल की उम्र में ही कैबिनेट मिनिस्टर बन गए थे। इसके बाद उनके पास सिंचाई, ग्राम विकास, जल संसाधन और वित्त जैसे अहम मंत्रालय रहे। इसके अलावा वह एक कुशल संगठनकर्ता भी माने गए। इसी के चलते एनसीपी पर उनकी गहरी पकड़ रही। पार्टी और प्रशासन पर पकड़ रखने वाले अजित पवार का सम्मान बीते कुछ सालों में ऐसा हो गया था कि लोग उन्हें अजित दादा ही कहते थे। हालांकि उनके उभार ने परिवार में ही असहजता पैदा की और अंत में अलगाव भी हुआ। कहा जाता है कि बीते कुछ समय से वह दोबारा एकता के लिए राह बना रहे थे, लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी।
2009 में ऐसा क्या हुआ, जिससे छिड़ी पवार परिवार में सत्ता की जंग
दरअसल पवार परिवार में उत्तराधिकार का संघर्ष 2009 में शुरू हुआ, जब सुप्रिया सुले ने लोकसभा का चुनाव लड़ा। फिर रोहित पवार के आने के बाद तो यह और तेज हो गया। लेकिन इस संघर्ष में अजित पवार की बढ़त यह रही कि वह चाचा से परे भी अपनी एक अलग छवि बना चुके थे। सुप्रिया सुले की राजनीति संसद तक ही सीमित रही, जबकि अजित पवार ने जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ को मजबूत किया। 2023 में वह एनसीपी से अलग हुए थे, लेकिन यह परिवार में विवाद का पहला मौका नहीं था। 2004 में भी तनाव पैदा हुआ था, जब एनसीपी ने सीएम का पद कांग्रेस को दे दिया था, जबकि एनसीपी सबसे बड़ा दल बनी थी।
2012 और 2019 में दिए थे अजित पवार ने इस्तीफे
इसके बाद 2012 में उन्होंने डिप्टी सीएम पद से इस्तीफा दे दिया था। ऐसा तब हुआ, जब उन पर सिंचाई परियोजनाओं में घोटाले के आरोप लगे थे। इसके बाद 2019 में भी उन्होंने विधायकी छोड़ी, जब उनके खिलाफ ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग केस में इस्तीफा दिया था। इसके बाद 2019 में भी तनाव की स्थिति बनी, जब तड़के ही देवेंद्र फडणवीस के साथ अजित पवार ने डिप्टी सीएम की शपथ ले ली। यह विवाद हालांकि शाम तक ही थम गया, जब अजित पवार जरूरी विधायकों की संख्या नहीं जुटा सके। यह सरकार 80 घंटे से ज्यादा नहीं चल पाई थी।
2023 में आया वह मोड़, जब चाचा की छांव से निकले अजित पवार
दिलचस्प बात है कि इसी को लेकर एकनाथ शिंदे ने एक बार उन पर तंज कसा था कि अजित दादा को सुबह और शाम दोनों समय शपथ लेने का अनुभव है। हालांकि बीते कई सालों से वह एनडीए की महाराष्ट्र में धुरी बनकर रहे। 2023 में एनसीपी से अजित पवार के अलगाव ने पार्टी को ही तोड़ दिया और चाचा शरद पवार के सामने तो अस्तित्व का संकट आ गया। इस तरह अजित पवार की सियासी जिंदगी चाचा की छांव से लेकर निज पहचान बनाने के संघर्ष की कहानी रही।
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