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साउथ की कोर्टरूम ड्रामा फिल्म, 8.3 है इसकी IMDb रेटिंग, नेटफ्लिक्स पर देख सकते हैं आप

Courtroom Drama Movie: आज हम आपको साउथ की एक ऐसी कोर्टरूम ड्रामा फिल्म के बारे में बताएंगे जाे पहले तो क्राइम थ्रिलर जैसी लगती है, लेकिन बाद में लीगल थ्रिलर बन जाती है।

Fri, 30 Jan 2026 05:07 PMVartika Tolani लाइव हिन्दुस्तान
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साउथ की कोर्टरूम ड्रामा फिल्म, 8.3 है इसकी IMDb रेटिंग, नेटफ्लिक्स पर देख सकते हैं आप

Good South Film on Netflix: ‘सालार’ में प्रभास के दोस्त का किरदार निभाने वाले पृथ्वीराज सुकुमारन याद हैं? नेटफ्लिक्स पर उनकी एक कोर्टरूम ड्रामा फिल्म स्ट्रीम कर रही है। इस फिल्म की आईएमडीबी रेटिंग 8.3 है। इस फिल्म की खास बात ये है कि इसमें क्राइम थ्रिलर और कोटरूम ड्रामा दोनों का तड़का लगा हुआ है। शुरुआत में आपको ये क्राइम थ्रिलर लगेगी, लेकिन बाद में कहानी कोर्टरूम ड्रामा में बदल जाएगी।

फिल्म का नाम और कहानी

फिल्म का नाम ‘जन गण मन’ है। इसकी शुरुआत एक कॉलेज प्रोफेसर की हत्या के बाद होने वाले विरोध प्रदर्शनों से होती है। जनता न्याय की मांग कर रही होती है और दबाव में आकर पुलिस ऑफिसर (सूरज वेंजारामूडु) आरोपियों का 'एनकाउंटर' कर देता है। पूरी दुनिया उसे एक हीरो की तरह देखती है, लेकिन कहानी में असली मोड़ तब आता है जब कोर्टरूम में वकील अरविंद स्वामी (पृथ्वीराज सुकुमारन) की एंट्री होती है, जो इस एनकाउंटर और सिस्टम की परतों को उधेड़ कर रख देता है।

फिल्म का पोस्टर

यह फिल्म क्यों देखनी चाहिए?

1.फिल्म का फर्स्ट पार्ट आपको इमोशनल करता है, जबकि दूसरा पार्ट आपको सोचने पर मजबूर कर देता है। यह फिल्म आपको सिखाती है कि ‘जो दिखता है, वह हमेशा सच नहीं होता।’

2.फिल्म जातिवाद, मीडिया ट्रायल, चुनाव की राजनीति और 'इंस्टेंट जस्टिस' (तुरंत न्याय) की भूख पर तीखा प्रहार करती है।

3.कोर्टरूम में पृथ्वीराज के डायलॉग्स और उनकी डिलीवरी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। उनकी परफॉरमेंस फिल्म की जान है।

फिल्म में क्या खास है?

इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका 'परसेप्शन' (नजरिया) बदलना है। फिल्म के बीच में आप जिस चीज के लिए ताली बजा रहे होते हैं, फिल्म के खत्म होने तक निर्देशक आपको उसी चीज पर शर्मिंदा होने के लिए मजबूर कर देता है। यह फिल्म दर्शकों को एक 'भीड़' से 'सोचने वाले नागरिक' में बदलने का दम रखती है।

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क्या कमी है?

फिल्म की थोड़ी लंबी है। कहीं-कहीं लगता है कि कुछ सीन्स को जबरदस्ती लंबा खींचा गया है। कुछ जगहों पर कोर्टरूम ड्रामा थोड़ा फिल्मी या लाउड लग सकता है, जो शायद हर किसी को पसंद न आए।

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