कैसे तय होती है IMDb रेटिंग; सब क्यों करते हैं इस पर भरोसा, कैसे फिल्टर होते हैं फर्जी वोट्स, जानें सब कुछ
कोई फिल्म अच्छी है या नहीं हम ये चेक करने के लिए आईएमडीबी रेटिंग चेक करते हैं। क्या आपके दिमाग में कभी ये सवाल आया कि आईएमडीबी रेटिंग को इतना भरोसमंद क्यों माना जाता है, क्या यहां फर्जीवाड़ा नहीं हो सकता?

क्या आप भी फिल्म देखने से पहले उसकी आईएमडीबी रेटिंग चेक करते हैं? कभी सोचा कि इस रेटिंग पर लोग इतना भरोसा क्यों करते हैं और यह तय कैसे होती है? इंट्रेस्टिंग बात ये है कि भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में आईएमडीबी रेटिंग को भरोसेमंद माना जाता है। 1 से 10 तक की रेटिंग को पारदर्शी रखने के लिए काफी दिमाग लगाया गया है ताकि कोई फर्जीवाड़ा ना हो सके। अगर आपको भी सारे दांव-पेंच जानने का इंट्रेस्ट जाग गया है तो यहां पूरा गणित समझ सकते हैं।
क्या होती है फिल्मों की आईएमडीबी रेटिंग?
कोई फिल्म अच्छी है या नहीं यह जानने के लिए ज्यादातर सिनेप्रेमी पहले इसकी आईएमडीबी रेटिंग चेक करते हैं। आप गूगल पर फिल्म के नाम के साथ आईएमडीबी (IMDb) डालेंगे तो एक पेज खुलकर आएगा जिसमें फिल्म से जुड़ी अहम जानकारी के साथ राइट साइड में ऊपर रेटिंग दिखती है। यह रेटिंग केवल सिंपल ऐवरेज नहीं होती बल्कि इसके पीछे एक ट्रिकी फॉर्म्युला काम करता है ताकि रेटिंग के साथ कोई छेड़छाड़ न कर सके। यह रेटिंग फिल्मों तक ही सीमित नहीं बल्कि, वेब सीरीज और टीवी सीरीज को भी दी जाती है। जिसे जितनी ज्यादा रेटिंग उसे उतना ही देखने लायक माना जाता है।
वेटेड ऐवरेज सिस्टम
आईएमडीबी दुनिया का सबसे बड़ा डेटाबेस है जहां करोड़ों यूजर्स फिल्मों को रेटिंग देते हैं। पर शायद कम लोग जानते हैं कि ये रेटिंग केवल वोटर्स के नंबर्स को जोड़कर नहीं बनाई जाती। इसके पीछे कंपनी एक खास वेटेड ऐवरेज सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है।
नहीं की जा सकती चालाकी
ज्यादातर लोगों को लगता है कि अगर 100 लोगों ने किसी फिल्म को रेटिंग दी तो उनका औसत ही फाइनल स्कोर होगा। आईएमडीबी ऐसा नहीं करता। यहां वेटेड एवरेज फॉर्मूला का यूज करते हैं। इसका मतलब है कि हर यूजर के वोट की वैल्यू एक समान नहीं होती। आईएमडीबी अपने सिस्टम में रेगुलर वोटर्स को ज्यादा महत्व देता है। जो लोग लगातार रेटिंग देते हैं और जिनका प्रोफाइल पुराना है, उनके वोट का वेटेज उन लोगों से ज्यादा होता है जो केवल एक फिल्म को प्रमोट करने के लिए नया अकाउंट बनाते हैं। मतलब अगर कोई चाहे कि अचानक किसी खास फिल्म को अच्छा दिखाने के लिए ज्यादा फर्जी वोट्स पड़वा दे तो उसकी चालाकी यहां काम नहीं आएगी।
फर्जी रेटिंग और स्पैम को रोकने का तरीका
अक्सर देखा जाता है कि किसी बड़ी फिल्म के रिलीज होते ही उसे जानबूझकर खराब रेटिंग दी जाती है या उसे जबरदस्ती 10 में 10 रेटिंग देकर हिट बनाने की कोशिश होती है। आईएमडीबी का सिस्टम इन आउटलेयर्स को पहचान लेता है। अगर सिस्टम को लगता है कि कोई रेटिंग केवल फिल्म को नुकसान पहुंचाने या फायदा देने के लिए दी गई है, तो उस वोट का असर फाइनल रेटिंग पर बहुत कम पड़ता है। इससे रेटिंग ऐक्युरेट होने का चांस बढ़ जाता है।
कैसे बनती है टॉप 250 फिल्मों की लिस्ट?
आईएमडीबी की टॉप 250 लिस्ट के लिए एक अलग और सीक्रेट फॉर्मूला इस्तेमाल किया जाता है जिसे बेयसियन एस्टीमेट कहा जाता है। इसमें केवल उन लोगों के वोट गिने जाते हैं जो रेग्युलर वोटर्स की कैटिगरी में आते हैं। इसके अलावा, एक मिनिमम वोट लिमिट भी तय की जाती है। यही कारण है कि हजारों वोट मिलने के बाद भी कई बार किसी फिल्म की रेटिंग अचानक बदल जाती है या वह लिस्ट से बाहर हो जाती है।
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