किसानों के खाते में 3, 8 और 21 रुपये मुआवजा! सांसद राजीव शुक्ला ने उठाए पीएम फसल बीमा योजना पर सवाल
किसी के खाते में 3 रुपये, किसी के खाते में 8 तो किसी के हिस्से में आए 21 रुपये। ये रकम मुआवजा राशि के नाम पर किसानों के खाते में सरकार की तरफ से भेजी गई है। ये जानकारी छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के राज्यसभा सांसद राजीव शुक्ला ने सदन में रखी।

किसी के खाते में 3 रुपये, किसी के खाते में 8 तो किसी के हिस्से में आए 21 रुपये। ये रकम मुआवजा राशि के नाम पर किसानों के खाते में सरकार की तरफ से भेजी गई है। ये जानकारी छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के राज्यसभा सांसद राजीव शुक्ला ने सदन में रखी। कांग्रेस सांसद ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में मौजूद अनियमितताओं का जिक्र करते हुए सदन में सरकार को घेरते हुए योजना में मौजूद कमियों को गिनाया।
किसानों के खातों में 3, 8 और 21 रुपये आए
राजीव शुक्ला ने बताया- महाराष्ट्र में किसान की फसल खराब हुई। मुआवजा आया- किसी किसान के खाते में 21 रुपये आए, किसी के खाते में 8 रुपये आए, तो किसी के खाते में केवल 3 रुपये आए। अध्यक्ष महोदय किसान इस रुपये का क्या करेंगे?
यूपी का भी हाल-बेहाल, खाते में आए 3-3 रुपये
महाराष्ट्र के बाद देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य यूपी का जिक्र करते हुए कहा- उत्तर प्रदेश की हालत भी ऐसी ही है। बरेली में इस साल बाढ़ आई और धान की फसल डूब गई। किसानों ने मुआवजे का दावा किया, तो किसी के खाते में 3 रुपये 76 पैसे, तो किसी के खाते में 3 रुपये 72 पैसे आए। मध्य प्रदेश के विदिशा समेत अन्य इलाकों में भी यही हाल है।
सांसद ने सरकार से पूछे तीखे सवाल
आंकड़ों को रखने के बाद सांसद ने सरकार से तीखे सवाल पूछते हुए कहा- मैं सरकार से पूछना चाहता हूं क्या किसान 5 रुपये में नई फसल उगा पाएगा? क्या 3 रुपये में डीजल आ पाएगा? क्या पौन 3 रुपये में कीटनाशक आएगा? या फिर किसान उन रुपयों को फ्रेम करके टांग ले कि ये देखो मेरी बीमा सुरक्ष कवच है।
फिजिकल वैरीफिकेशन में भी समस्या
मुआवजा रकम मिलने के अलावा भी कई समस्याएँ मौजूद। सांसद ने बताया- समस्या केवल रकम की नहीं है। कई जगह फसल का फिजिकल वेरीफिकेशन भी ठीक से नहीं होता है। अधिकारी तब पहुंचते हैं। जब फसल पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी होती है और दोबारा बुआई का वक्त आ चुका होता है। इस समय तक नुकसान का नामोनिशान मिट चुका होता है और पोर्टल भी बंद हो जाते हैं या फिर सर्वर डाउन हो जाता है।
जितना मुआवजा मिलता, उतने की तो चप्पल घिस देता
बेचारा किसान उतने की तो चप्पल घिस देता है, जितने का उसे मुआवजा मिलता है। ऊपर से एरिया अप्रोच के नाम पर औसत निकाल दिया जाता है। मतलब पूरे इलाके का औसत ठीक बता दिया जाता है, तो जिस किसान की पूरी फसल चौपट हुई, उसे भी कह दिया जाता है कि आपके इलाके में तो सबकुछ सामान्य है। और ये कहकर मुआवजा देने से इंकार कर दिया जाता है।
बीमा कंपनियां हो रहीं मालामाल
किसान 2-3 प्रतिशत का प्रीमियम देता है, बाकी का पैसा सरकार देती है। यानी जनता का पैसा। सरकार बीमा कंपनियों को पैसे देती है। इन प्राइवेट बीमा कंपनियों को हजारों करोड़ का प्रीमियम मिलता है। जब साल सामान्य होता है, तो दावे कम आते हैं और कंपनियों का लाभ बढ़ता रहता है। लेकिन, जब किसान की बारी आती है, तो उसके हिस्से में 3 रुपये 5 रुपये आते हैं।
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