क्या है छत्तीसगढ़ का 'आवा पानी झोकी' आंदोलन, जिसके जरिए जल क्रांति ला रहे प्रदेश के किसान
इस आंदोलन से प्रेरित होकर प्रधानमंत्री आवास योजना के 500 से अधिक लाभार्थियों ने भी अपने घरों के पास जल संरक्षण के गड्ढे बनवाए, जिससे जल संरक्षण एक सरकारी पहल से एक साझा सामुदायिक जिम्मेदारी में बदल गया है।

छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण करने के लिए किसानों ने एक बेहद खास और अनोखी पहल शुरू की है और इसके जरिए किसान अपनी जमीन का 5 प्रतिशत हिस्सा बारिश का पानी जमा करने के लिए अलग रख रहे हैं। इस पहल को उन्होंने 'आवा पानी झोकी' आंदोलन नाम दिया है, और इसका मकसद जल संरक्षण करते हुए जल क्रांति लाना है। प्रदेश में यह आंदोलन तेजी से फैल रहा है।
जल शक्ति मंत्रालय की सूचना के अनुसार 'आवा पानी झोकी'आंदोलन के तहत किसान स्वेच्छा से अपनी कृषि भूमि का पांच प्रतिशत हिस्सा छोटे रिचार्जिंग (पुनर्भरण) तालाबों और सीढ़ीदार गड्ढों के निर्माण के लिए अलग रखते हैं, और इनमें बारिश का पानी एकत्रित होता है। ये संरचनाएं खेतों के भीतर ही वर्षा जल को एकत्रित करती हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि मॉनसून की हर बूंद को संरक्षित, अवशोषित और पुन: उपयोग किया जा सके।
अभियान का इलाके में दिखने लगा असर
मंत्रालय ने इस प्रयोग को उल्लेखनीय उपलब्धि बताया और कहा कि इसके तहत जो बारिश का पानी पहले बह जाता था, अब वह मिट्टी और जलभंडारों का पुनर्भरण करता है। इससे मिट्टी के अपवरदन या कटाव में काफी कमी आई है और सूखे के दौरान फसलों में नमी का स्तर बेहतर हुआ है इसका सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि भूजल पुनर्भरण स्थिर और निरंतर हो गया है। जल संरक्षण के लिए मॉडल को अत्यंत उपयोगी बताते हुए कहा गया है कि यह सफलता सिद्ध करती है कि सतत जल प्रबंधन के लिए व्यापक स्तर पर विस्थापन या भारी पूंजी निवेश की नहीं बल्कि सामूहिक इच्छाशक्ति की ज्यादा आवश्यकता है।
महिलाएं बनीं 'नीर नायिका', युवक कहला रहे 'जल दूत'
अभियान को व्यापक सामुदायिक भागीदारी से मजबूती मिलने का दावा करते हुए मंत्रालय का कहना है कि महिलाएं 'नीर नायिका' बनकर उभरीं है, जिन्होंने घरों का मार्गदर्शन किया और जल संरक्षण के लिए गड्ढे बनवाने में अग्रणी भूमिका निभाते हुए पारंपरिक लोकगीतों के माध्यम से जागरूकता फैलाई। वहीं इस काम में लगे युवाओं को 'जल दूत' कहा जा रहा है जो नालियों का मानचित्रण करके, नहरों से गाद निकालकर, नुक्कड़ नाटक के आयोजन और भित्ति चित्रों के माध्यम से जल संरक्षण को बढ़ावा देने के आंदेालन को ऊर्जा प्रदान कर रहे हैं।
अबतक 440 से ज्यादा तालाबों का किया गया पुनरुद्धार
इस आंदोलन के दौरान सामूहिक श्रमदान से 440 से अधिक पारंपरिक तालाबों का पुनरुद्धार किया गया और वे प्राकृतिक जल पुनर्भरण के स्रोत बन गए है। इस आंदोलन से प्रेरित होकर, प्रधानमंत्री आवास योजना के 500 से अधिक लाभार्थियों ने भी अपने घरों के पास जल संरक्षण के गड्ढे बनवाए, जिससे जल संरक्षण एक सरकारी पहल से एक साझा सामुदायिक जिम्मेदारी में बदल गया है।
मंत्रालय ने इस सफलता को सहभागिता से स्वाभाविक तक का नाम दिया है और कहा है कि पांच प्रतिशत मॉडल की सफलता केवल बुनियादी ढांचे में ही नहीं, बल्कि स्वामित्व में भी निहित है। इसमें 1,260 से अधिक किसानों ने अपनी भूमि पर 5 प्रतिशत जल पुनर्भरण प्रणाली को अपनाया और पूरे कोरिया जिले में 2,000 से अधिक सोख गड्ढे बनाए गए।
ग्रामीण आवास योजनाओं के लाभार्थियों ने स्वेच्छा से अपने घरों के पास सोख गड्ढे बनवाए, जिससे जल पुनर्भरण दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बन गया। इस ऐतिहासिक पहल में, समुदायों ने केवल तीन घंटों के भीतर 660 सोखने वाले गड्ढों का निर्माण किया, जो समन्वित सार्वजनिक भागीदारी की शक्ति का प्रतीक हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार 1,260 से ज़्यादा किसानों ने अपनी खेती की 5 प्रतिशत जमीन रिचार्ज तालाब बनाने के लिए रखी और पूरे जिले में 2 हजार से ज़्यादा सोक पिट बनाए गए। एक मामले में लोगों ने तीन घंटे के अंदर 660 सोक पिट बनाए। जिसके बाद मंत्रालय ने इलाके में इसका असर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने का दावा किया है। मंत्रालय के अनुसार इससे कई गांवों में भूजल स्तर 3 से 4 मीटर तक बढ़ गया है और 17 दूरस्थ जनजातीय बस्तियों में झरने फिर से भर गए हैं। मिट्टी में नमी बनाए रखने की क्षमता बेहतर होने के कारण कृषि उत्पादकता में सुधार हुआ है और आजीविका स्थिर होने के कारण मौसमी प्रवास में अनुमानित 25 प्रतिशत की कमी आई है।
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