‘पेनिट्रेशन के बिना इजैक्युलेशन करना रेप नहीं’; छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की टिप्पणी, घटा दी सजा
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2004 के दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि महिला के प्राइवेट पार्ट में पेनिट्रेशन के बिना ही अगर इजैक्युलेशन हो जाए तो ऐसे अपराध को दुष्कर्म नहीं बल्कि ‘दुष्कर्म का प्रयास’ माना जाएगा।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2004 के दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि महिला के प्राइवेट पार्ट में पेनिट्रेशन के बिना ही अगर इजैक्युलेशन हो जाए तो ऐसे अपराध को दुष्कर्म नहीं बल्कि ‘दुष्कर्म का प्रयास’ माना जाएगा। इसी के साथ हाईकोर्ट ने आरोपी को दुष्कर्म के बजाय दुष्कर्म के प्रयास का दोषी ठहराया और उसे निचली अदालत द्वारा दी गई सात साल की सजा को कम कर दिया। हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसकी सजा घटाकर 3 वर्ष 6 माह का कठोर कारावास करने के साथ ही 200 रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की बेंच ने एक अपील पर 16 फरवरी को सुनाए अपने आदेश में कहा, "रेप साबित करने के लिए पेनिट्रेशन का सबूत जरूरी है, भले ही थोड़ा-बहुत हो। इस मामले में जो सबूत हैं, वे पूरा रेप साबित नहीं करते, लेकिन यह साबित करते हैं कि आरोपी ने रेप की कोशिश की थी।''
निचली अदालत ने सुनाई थी सात साल की सजा
एडिशनल सेशंस जज, धमतरी (कैंप-रायपुर) ने 6 अप्रैल 2005 को आरोपी वासुदेव गोंड को आईपीसी की धारा 376(1) के तहत दोषी ठहराया था और उसे 7 साल की सजा सुनाई थी। उसे आईपीसी के सेक्शन 342 के तहत भी छह महीने की सजा सुनाई गई थी। दोनों सजांएं एक साथ चलनी थीं। आरोपी ने इस सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पीड़िता ने पेनिट्रेशन के बारे में विरोधाभासी बयान दिए
वासुदेव गोंड पर आरोप था कि 21 मई, 2004 को वह धमतरी जिले की रहने वाली पीड़िता को किसी बहाने से अपने घर ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। उसने उसे एक कमरे में बंद कर दिया और उसके हाथ-पैर बांध दिए। इस संबंध में अर्जुनी पुलिस स्टेशन में मुकदमा दर्ज कराया गया था। केस की सुनवाई के दौरान प्रॉसिक्यूशन ने 19 गवाहों से पूछताछ की थी। पीड़िता ने अपने बयान में आरोपी द्वारा जबरदस्ती सेक्स करने का दावा किया था। हालांकि, क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान, उसने पेनिट्रेशन के बारे में विरोधाभासी बयान दिए।
मेडिकल जांच में हाइमन सही सलामत मिली
मेडिकल जांच में पता चला कि उसका हाइमन सही सलामत था, लेकिन थोड़ा पेनिट्रेशन होने की संभावना जताई गई। हालांकि, फोरेंसिक साइल लैब (एफएसएल) की रिपोर्ट में कुछ सैंपल में ह्यूमन स्पर्म भी मिला।
फैसले के अनुसार हाईकोर्ट ने पूरे मामले में साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए पाया कि पीड़िता के बयान में पेनिट्रेशन को लेकर स्पष्टता नहीं थी। मेडिकल सबूत भी पूरा पेनिट्रेशन साबित करने में नाकाम रहे। सिंगल जज की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि रेप साबित करने के लिए पेनिट्रेशन का सबूत, भले ही थोड़ा-बहुत हो, जरूरी है।
हाईकोर्ट ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों से दुष्कर्म सिद्ध नहीं होता, लेकिन आरोपी द्वारा दुष्कर्म के प्रयास किया जाना जरूर सिद्ध होता है, क्योंकि आरोपी ने थोड़ा पेनिट्रेशन किया है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
हाईकोर्ट ने कहा, “इस प्रकार, आरोपी द्वारा पीड़िता को जबरदस्ती कमरे के अंदर ले जाना, और सेक्स के इरादे से दरवाजा बंद करना, अपराध की 'तैयारी' का आखिरी कदम था। इसके बाद उसने पीड़िता और खुद को नंगा किया और अपने प्राइवेट पार्ट को विक्टिम के प्राइवेट पार्ट से रगड़ा और थोड़ा पेनिट्रेशन किया, जो असल में सेक्सुअल इंटरकोर्स करने की कोशिश थी।”
फैसले में कहा गया कि आरोपी ने जानबूझकर अपराध करने के इरादे से काम किया था और अपराध पूरा होने के काफी करीब था।
आरोपी का अपराध आईपीसी की धारा 375 और 511 के दायरे में आता है : कोर्ट
हाईकोर्ट ने कहा, “क्योंकि आरोपी का काम तैयारी से अधिक था और असल में थोड़ा पेनिट्रेशन हुआ था, लेकिन इजैक्युलेशन नहीं हुआ था, इसलिए वह रेप करने की कोशिश करने का दोषी है, जो कि आईपीसी की धारा 375 और 511 के दायरे में आता है, जो घटना के समय लागू था।”
हाईकोर्ट ने आरोपी वासुदेव गोंड को आईपीसी की धारा 376 के बजाय धारा 376 (1) और 511 के तहत दोषी ठहराया और उसे तीन साल और छह महीने की सजा सुनाई। धारा 342 के तहत छह महीने की सजा को बरकरार रखा गया। दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी। बेंच ने आदेश दिया कि आरोपी द्वारा पूर्व में काटी गई सजा का समायोजन किया जाएगा।
हाईकोर्ट ने आरोपी की बेल कैंसिल कर दी और उसे दो महीने के अंदर ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया, ऐसा नहीं करने पर उसकी गिरफ्तारी की कार्रवाई शुरू की जाएगी।
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