सिर्फ विवाह को धर्मांतरण नहीं माना जाएगा, उम्रकैद तक की सजा; BJP शासित इस राज्य में विधेयक पेश
भाजपा शासित एक राज्य में धर्मांतरण को लेकर विधेयक पेश किया गया है। इसमें कहा गया है कि केवल विवाह को ही धर्मांतरण के लिए पर्याप्त नहीं माना जाएगा। विधेयक का उद्देश्य जबरदस्ती, दबाव, अनुचित प्रभाव, प्रलोभन, गलत बयानी, धोखाधड़ी या विवाह के माध्यम से किए गए धर्मांतरण पर रोक लगाना है।

भाजपा शासित एक राज्य में धर्मांतरण को लेकर विधेयक पेश किया गया है। इसमें कहा गया है कि केवल विवाह को ही धर्मांतरण के लिए पर्याप्त नहीं माना जाएगा। विधेयक का उद्देश्य जबरदस्ती, दबाव, अनुचित प्रभाव, प्रलोभन, गलत बयानी, धोखाधड़ी या विवाह के माध्यम से किए गए धर्मांतरण पर रोक लगाना है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने गुरुवार को विधानसभा में एक विधेयक पेश किया। छत्तीसगढ़ के गृह मंत्रालय के प्रभारी उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा द्वारा सदन में पेश किए गए छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 में कड़े प्रावधान किए गए हैं। उन मामलों में 20 साल तक की कैद का प्रावधान भी है जिनमें नाबालिग, महिलाएं, मानसिक रूप से विकलांग व्यक्ति या अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्य धर्मांतरण से पीड़ित हैं। विधेयक में कहा गया है कि सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे। हालांकि, विधेयक में कहा गया है कि अपने पैतृक धर्म में पुनः धर्मांतरण को कानून के तहत धर्मांतरण नहीं माना जाएगा।
मौजूदा अधिनियम के प्रावधान अपर्याप्त
यह विधेयक छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 1968 का स्थान लेगा, जिसे मध्य प्रदेश से 2000 में राज्य के गठन के समय अपनाया गया था। उस अधिनियम में केवल यह प्रावधान है कि धर्मांतरण के बाद जिला मजिस्ट्रेट को सूचित किया जाए। छत्तीसगढ़ की भौगोलिक स्थिति, सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां और समय के साथ-साथ समाज में टेक्नोलॉजी और संचार के क्षेत्र में हुई प्रगति को देखते हुए मौजूदा धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के प्रावधान अपर्याप्त हो गए हैं।
नए विधेयक के उद्देश्य
नए विधेयक का उद्देश्य बल, दबाव, अनुचित प्रभाव, प्रलोभन, गलत बयानी, धोखाधड़ी या विवाह के माध्यम से किए गए धर्मांतरण पर रोक लगाना है। इसमें सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक संचार जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से किए गए धर्मांतरण भी शामिल हैं।
इसमें प्रलोभन को पैसा, उपहार, रोजगार, मुफ्त शिक्षा या चिकित्सा सुविधाएं, बेहतर जीवनशैली के वादे या विवाह के रूप में परिभाषित किया गया है। जबकि दबाव में मनोवैज्ञानिक दबाव, शारीरिक बल या धमकियां शामिल हैं, जिनमें सामाजिक बहिष्कार भी शामिल है।
विधेयक में सामूहिक धर्मांतरण को एक ही घटना में दो या दो से अधिक व्यक्तियों के धर्मांतरण के रूप में परिभाषित किया गया है। विधेयक ऐसे कार्यों पर रोक लगाता है जो धर्मांतरण के उद्देश्य से किसी व्यक्ति के जीवन या संपत्ति को खतरे में डालते हैं या नाबालिगों या महिलाओं की तस्करी में शामिल होते हैं।
घोषणा पत्र देना होगा
प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, धर्म परिवर्तन करने के इच्छुक व्यक्तियों को सक्षम प्राधिकारी को एक घोषणा पत्र पेश करना होगा और धर्म परिवर्तन कराने वाले धार्मिक पदाधिकारियों को भी पूर्व सूचना देनी होगी। सक्षम पदाधिकारी का मतलब जिला मजिस्ट्रेट या अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट से कम रैंक के किसी विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी से है।
निर्धारित प्रारूप में घोषणा पत्र प्राप्त होने के 7 दिनों के भीतर सक्षम प्राधिकारी इस अधिनियम के अंतर्गत संचालित अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर प्रस्तावित धर्मांतरण का विवरण प्रकाशित करेगा। वह तहसीलदार, ग्राम पंचायत और स्थानीय थाना के कार्यालयों में भी प्रस्तावित धर्मांतरण संबंधी सूचना प्रदर्शित करेगा। सूचना में आवेदक का नाम, उनका वर्तमान धर्म या आस्था तथा प्रस्तावित धर्म का उल्लेख होगा।
90 दिनों में धर्मांतरण न होने पर आवेदन रद्द
इस कानून के तहत जारी किए गए धर्मांतरण प्रमाण पत्र नागरिकता या पहचान के प्रमाण के रूप में मान्य नहीं होंगे। अनुमोदन के 90 दिनों के भीतर धर्मांतरण न होने पर आवेदन रद्द हो जाएंगे। विधेयक में आगे यह प्रावधान है कि केवल विवाह के उद्देश्य से किया गया धर्मांतरण या धर्मांतरण के लिए किया गया विवाह, उचित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना अमान्य माना जाएगा। केवल विवाह को ही धर्मांतरण के लिए पर्याप्त नहीं माना जाएगा।
यह अधिनियम अधिकारियों को धर्मांतरण की प्रामाणिकता सत्यापित करने, शिकायतों की जांच करने और रिकॉर्ड मंगवाने का अधिकार देता है। साथ ही अधिनियम का उल्लंघन करने के उद्देश्य से की जाने वाली गतिविधियों के लिए विदेशी या घरेलू धन की स्वीकृति पर भी रोक लगाता है।
20 साल की कैद और 10 लाख तक जुर्माना
इसमें कठोर दंडात्मक प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें उल्लंघन के लिए कम से कम 7 साल की कैद, जिसे 10 साल तक बढ़ाया जा सकता है और कम से कम 5 लाख रुपये का जुर्माना शामिल है। नाबालिगों, महिलाओं, मानसिक रूप से विकलांगों या अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों से जुड़े मामलों में 10-20 साल की कैद और कम से कम 10 लाख रुपये का जुर्माना जैसी कठोर सजा का प्रावधान है। न्यायालय अपने निर्णय में दर्ज किए जाने वाले किसी भी पर्याप्त या विशेष कारण से कारावास की अवधि कम कर सकता है।
सामूहिक धर्मांतरण के लिए कम से कम 10 साल का कारावास, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है और 25 लाख रुपये या उससे अधिक का जुर्माना लगाया जा सकता है। बार-बार यह अपराध करने वालों को आजीवन कारावास का सामना करना पड़ सकता है।
10 लाख रुपये तक के मुआवजे का प्रावधान
यदि कोई लोक सेवक अपराध करता है तो उसे कम से कम 10 साल के कारावास जिसे 20 साल तक बढ़ाया जा सकता है और कम से कम 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है। विधेयक में अन्य दंडों के अतिरिक्त अवैध धर्मांतरण के पीड़ितों को 10 लाख रुपये तक के मुआवजे का प्रावधान है।
विधेयक में कहा गया है कि मामलों से संबंधित सुनवाई अंतिम रिपोर्ट पेश होने की तिथि से छह महीने की अवधि के भीतर पूरी की जानी चाहिए। जब तक ऐसे न्यायालय नामित नहीं हो जाते सत्र न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र रहेगा।
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